भारत की स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस में ध्वज को लेकर मंथन

वीर सावरकर की प्रेरणा से मैडम कामा ने जो तिरंगा जर्मनी में फहराया, उसे कांग्रेस के किसी भी अधिवेशन में अधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया। इसी कारण से भारत में राष्ट्रव्यापी चर्चा शुरू हो गयी कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज का स्वरुप अब कैसा होना चाहिए?

भारत की स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस में ध्वज को लेकर मंथन

इस क्रम में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 1916 में मिलता है। इस वर्ष मसूलीपट्टम राष्ट्रीय महाविद्यालय के पिंगली वैंकय्या ने 'A National Flag for India' शीर्षक से पुस्तक लिखी, जिसमें ध्वज के कई प्रकार के नमूने प्रस्तावित किये थे।
इस कालखंड में ध्वज का प्रचलन तेजी से बढ़ गया और अन्य राष्ट्रों के झंडों का वर्णन सहित भारत के राष्ट्रीय झंडे के कुछ नमूने प्रस्तुत किये जाने लगे। उधर, कांग्रेस के हर अधिवेशन में पिंगली वैंकय्या राष्ट्रीय ध्वज का प्रश्न उठाते रहते थे। आमतौर पर महात्मा गाँधी को उनके सुझाए झंडे आकर्षित नहीं लगते थे।

यंग इंडिया के 13 अप्रैल 1921 को प्रकाशित अंक में वे लिखते है, "वे (पिंगली) पिछले चार सालों से कांग्रेस के हर अधिवेशन में राष्ट्रीय झंडे का प्रश्न निरंतर उठाते रहे है तथापि मेरे हृदय में उनके विचारों के प्रति कोई उत्साह जागृत नहीं हो सका; और उन्होंने जो नमूने पेश किये उनमें मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखाई पड़ा जो राष्ट्र की भावनाओं को जगा सके।"
कुछ समय बाद, जालंधर के लाला हंसराज ने महात्मा गाँधी को सुझाव दिया कि ध्वज में चरखे को शामिल किया जा सकता है। महात्मा गाँधी को यह विकल्प ठीक लगा। उन्होंने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया और पिंगली को एक ऐसा नमूना बनाने को कहा, जिसमें लाल (हिन्दुओं का), तथा हरे (मुसलमान का) रंग की पृष्ठभूमि पर चरखा हो।

तीन घंटों के अंतराल के बाद पिंगली ने एक झंडा बनाया लेकिन वह अखिल भारतीय कांग्रेस की कार्यसमिति के समक्ष पेश न हो सका। अब एक बार फिर महात्मा गाँधी ने उस झंडे पर विचार किया और उन्हें महसूस हुआ कि इसमें हिन्दू और मुसलमानों के साथ-साथ अन्य धर्मों का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसलिए अन्य धर्मों की भागीदारी के प्रतीक स्वरुप में उन्होंने सफेद रंग भी जोड़ने का निर्देश दिया।

वर्ष 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में पेश किये गए ध्वज को खास आकर्षण नहीं मिला। अतः एक बार फिर ध्वज की संरचना पर चर्चा शुरू हो गयी। पिंगली ने महात्मा गाँधी के तीन रंगों - लाल, हरा और सफेद सहित चरखे के निशान को लेकर कई प्रयोग किये। उनके द्वारा प्रस्तावित ध्वज की जिस बनावट को सबसे ज्यादा सराहा गया उसमें सबसे ऊपर सफेद पट्टी, बीच में हरे रंग की पट्टी और अंत में लाल रंग सहित एक बड़ा चरखा ध्वज पर अंकित किया गया था। वैसे यह एक प्रकार से सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी और वीर सावरकर के झंडों की भांति ही तीन रंगों वाली पट्टियों जैसा ही था।

महात्मा गाँधी ने इस ध्वज को 'स्वराज' नाम दिया था। जल्दी ही, इसका प्रयोग देश के अलग-अलग स्थानों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ होने लगा। वर्ष 1923 के नागपुर झंडा सत्याग्रह में इस ध्वज को व्यापक लोकप्रियता मिली। मई 1923 में नागपुर और जबलपुर में ब्रिटिश औपनिवेशवाद के खिलाफ एक झंडा यात्रा निकाली गयी। सरकार ने लोगों की भीड़ एकत्र न हो इसलिए वहां धारा 144 लगा दी।

पट्टाभि सितारामैय्या, 'संक्षिप्त कांग्रेस का इतिहास 1884 से 1947' में सत्याग्रह के सन्दर्भ में लिखते है, "बस, गिरफ्तारियां और सजाएँ आरम्भ हो गयी। बात-की-बात में इस घटना ने आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। महासमिति ने आन्दोलन को सफल बनाने के लिए उसकी सहायता करने का निश्चय किया और साथ ही देश को आह्वान किया कि आगामी 18 तारीख (मई महीना) को गाँधी दिवस मनाये जाने के बदले इसे झंडा दिवस कहकर मनाया जाए। प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों को आज्ञा हुई कि उस दिन जुलुस निकालकर जनता द्वारा झंडा फहराए।"

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने से पहले 1922 तक मध्य भारत कांग्रेस के चर्चित एवं लोकप्रिय नाम बन गए थे। मध्य भारत प्रांतीय कांग्रेस के सहमंत्री के नाते उन्हें स्थानीय इकाइयों के चुनाव एवं सदस्यता की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। इसलिए 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह के दौरान डॉ. हेडगेवार ने सत्याग्रह के लिए स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करने का कार्य किया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने संस्मरण में सत्याग्रह नेतृत्व पर लिखते है, "सेठ जमनालाल उसका (सत्याग्रह का) नेतृत्व कर रहे थे। झंडे को लेकर जुलूस प्रतिदिन निकलता और सरकार द्वारा सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया जाता था। कुछ दिनों बाद जमनालाल भी गिरफ्तार कर लिए गए। तब सरदार बल्लभभाई पटेल नागपुर आये और मोर्चा संभाला। उधर मैंने भी बिहार से स्वयंसेवकों को भेजना शुरू कर दिया। इस सत्याग्रह में विनोभा भावे और सी राजगोपालाचारी भी शामिल हुए थे।"

वर्ष 1923 में दिल्ली में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में झंडा सत्याग्रह की सफलता पर एक प्रस्ताव पारित कर कहा गया, "यह कांग्रेस नागपुर के झंडा सत्याग्रह आन्दोलन के संचालकों को हृदय से बधाई देती है, जिन्होंने अपने वीरोचित त्याग और दुःख से लड़ाई को अंत तक सफलतापूर्वक लड़कर देश का सम्मान बढाया है।" अगले साल इस ध्वज को कांग्रेस के बेलगाँव अधिवेशन में भी फहराया गया। इस प्रकार एक ध्वज को आधिकारिक रूप से स्वीकार करना, कांग्रेस के अभी तक के इतिहास में पहली घटना थी।

कांग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी था जोकि महात्मा गाँधी की ध्वज पर सांप्रदायिक व्याख्या को पसंद नहीं करता था। इस बात से स्वयं महात्मा गाँधी भी अंजान नहीं थे। इसलिए उन्होंने ध्वज की आलोचना को स्वीकार कर उसका जवाब इस प्रकार दिया, "राष्ट्रीय झंडे का महत्व जैसे-जैसे बढ़ता जा रहा है, उसके रंग, आकार-प्रकार और चरखे चिह्न के सम्बन्ध में नए-नए और सूक्ष्म सवाल उठाये जा रहे है। हमें यह स्मरण होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडा केवल परंपरा के कारण राष्ट्रीय बन गया है, कांग्रेस के किसी प्रस्ताव द्वारा नही। एकता की बढती भावना के कारण अब कांग्रेसजन राष्ट्रीय झंडे के रंगों के उस जातीय अर्थ को नापसंद करने लगे है।"

बावजूद इसके, वर्ष 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने अध्यक्ष होने के नाते जो झंडा फहराया उसमें चरखा हटा दिया गया था। वर्ष 1929 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने जवाहरलाल नेहरू ने न सिर्फ महात्मा गाँधी द्वारा प्रस्तावित ध्वज को अपनाया बल्कि भारत की पूर्ण स्वाधीनता का भी संकल्प लिया।

कांग्रेस की इसी कशमकश के बीच सिक्खों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें कांग्रेस के ध्वज में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। उधर, वर्ष 1929 में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रामानंद चटर्जी ने एक केसरिया ध्वज फहराया, जिसे महासभा के 1936 के लाहौर अधिवेशन में स्वीकार कर लिया गया।

वही वीर सावरकर ने भी एक ध्वज की रुपरेखा रखी जिसमें ॐ और कृपाण के साथ कुण्डलिनी को रखा गया था। कुण्डलिनी को भारतीय योग परंपरा को ध्यान में रखते हुए स्थान दिया गया था। बाद में हिन्दू महासभा ने इसमें स्वस्तिक का निशान भी जोड़ दिया।

1 से 2 अप्रैल 1931 को कांग्रेस ने अपनी भूल-सुधार के लिए करांची में आयोजित कार्यसमिति की एक बैठक में सात सदस्यों की समिति का गठन कर दिया। समिति के संयोजक पट्टाभि सीतारमैया सहित सदस्यों में सरदार पटेल, मौलाना आजाद, मास्टर तारा सिंह, जवाहरलाल नेहरू, डीबी कालेलकर, और एनएस हर्डीकर शामिल थे। इसका उद्देश्य मौजूदा ध्वज में आपत्तियों की जाँच सहित कांग्रेस की स्वीकृति के लिए एक ध्वज की सिफारिश करना था।

31 जुलाई 1931 तक दी गयी समयसीमा से पहले ही समिति ने अपनी सिफारिशें 2 अगस्त 1931 को कांग्रेस कार्यसमिति को सौंप दी थी। समिति का सुझाव था कि भारत का राष्ट्रीय ध्वज केसरिया रंग का होना चाहिए जिसमें ऊपर बायीं ओर नीले रंग का चरखा अंकित किया जा सकता है।

महात्मा गाँधी ध्वज में तीन रंगों के इस्तेमाल पर एकदम अड़ गए थे। बम्बई में अगस्त 1931 में बुलाई गयी कांग्रेस कार्यसमिति में झंडा समिति के सुझावों पर विचार किया गया। अंततः तय किया गया कि ध्वज में तीन रंग ही रहेंगे लेकिन लाल रंग की जगह केसरिया लेगा। रंगों के क्रम में भी परिवर्तन किया गया और अब केसरिया सबसे पहले, फिर सफेद और अंत में हरे रंग को रखा गया। साथ ही चरखे का रंग नीला किया गया जिसके अन्दर सफेद रंग की धारियाँ थी।

इसके अलावा ध्वज की कोई सांप्रदायिक परिभाषा से भी परहेज किया गया। अब ध्वज की व्याख्या इस प्रकार की गयी कि साहस एवं बलिदान का प्रतिनिधित्व केसरिया, शांति एवं सच्चाई का प्रतिनिधित्व सफेद, विश्वास एवं शिष्टता का प्रतिनिधित्व हरा, और नागरिकों की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व चरखा करेगा।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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