Pesticides Risks: सबके लिए काल बन गये हैं कीटनाशक
Pesticides Risks: फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि यह सबके लिए काल बनता जा रहा है। धरती, पानी, पशु पक्षी सब पर इन कीटनाशकों का घातक असर हो रहा है।
धरती के केंचुआ जैसे अनेक मित्र जीव तो मर ही रहे हैं, अनाज खाने वाली चिड़ियों पर भी काफी नुकसानदेह असर हो रहा है। उस अनाज को खाने से मनुष्य पर होने वाले दीर्घकालीन प्रभाव के साथ साथ कीटनाशकों का छिड़काव करने वाले किसानों की रोगग्रस्त होकर मृत्यु हो जाने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।

मेरठ के खरखौदा प्रखंड में हुए शोध में पता चला है कि धरती जहरीली हो गई है। ब्लड कैंसर जैसे रोगों की बढती संख्या को देखकर लखनऊ के केजीएमयू की टीम ने इलाके के छह हजार से ज्यादा मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री की जांच की। दो सौ से अधिक मरीजों के रक्त व पेसाब में खतरनाक रसायनों के अंश मिले।
बाद में कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल करने वाले मेरठ और कम इस्तेमाल करने वाले झांसी के लोगों के नमूनों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। मेरठ में कीटनाशकों का इस्तेमाल मानक से दो सौ गुना अधिक तक पाया गया है। इंडियन मेडिकल रिसर्च काउंसिल के प्रोजेक्ट के अंतर्गत केजीएमयू की प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर डॉ मोनिका अग्रवाल 15 हजार लोगों के नमूने पर कीटनाशकों के असर का अध्ययन कर रही हैं।
प्रथम चरण में छह हजार मरीजों की जांच हुई और उनकी बीमारियों की बड़ी वजह कीटनाशकों को माना गया। खरखौदा क्षेत्र में ब्लड कैंसर, हड्डियों का कैंसर, स्मृति लोप, हड्डियों के रोग, एनीमिया, मिचली, पेट व किडनी से संबंधित मरीज बड़ी संख्या में मिले। टीम 20 गांवों में जाकर जांच कर चुकी है। कई मरीजों में लाल रक्त कोशिकाएं और श्वेत रक्त कोशिकाओं की मात्रा मानक से भिन्न मिली जो रक्त कैंसर का लक्षण है। कीटनाशकों से एप्लास्टिक एनिमिया भी हो सकता है।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं को एक अन्य शोध में पता चला है कि कीटनाशक के प्रभाव वाले अनाज खाने की वजह से चिड़ियों के प्रजनन पर असर पड़ रहा है। उनके अंडे कमजोर होने लगे हैं जो समय के पहले फट जाते हैं और चूजों की मौत हो जाती है। इससे चिड़ियों की संतति पर खतरा बढ़ रहा है। पक्षी अक्सर खेतों में गिरे अनाज के दाने खाते हैं। जिनमें कीटनाशकों की मात्रा अधिक रहती है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो गौरैया और कौए भी गायब हो जाएंगे। गिध्द और नीलकंठ जैसे पक्षी तो पहले ही लगभग गायब हो गए हैं।
बीएचयू में जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर सीएम चतुर्वेदी की देखरेख में शोधछात्रा रिचा सोनी ने चिड़ियों के प्रजनन की स्थिति पर शोध किया है। इस शोध में कीटनाशकों के घातक प्रभाव का पता चला है। उनका शोधपत्र वर्ष 2019 में अमेरीका की प्रतिष्ठित पत्रिका कम्पिटेटिव बायोकेमिस्ट्री एंड फिजियोलॉजी में प्रकाशित हुई है। शोधपत्र में कहा गया है कि रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों वाले अनाज खाने से पक्षियों का प्रजनन तंत्र कमजोर हो गया है।
गंगाघाटी के इलाके में रसायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के घातक प्रभाव की बात थोड़ी नई है। पंजाब और महाराष्ट्र में इनके घातक प्रभाव की चर्चा अब कुछ पुरानी हो गई है। पंजाब में कीटनाशकों के प्रभाव से कैंसर इतने बड़े पैमाने पर फैला है कि भटिंडा से चलने वाली एक ट्रेन को लोग कैंसर एक्सप्रेस के नाम से पुकारते हैं। यह ट्रेन भटिंडा से बीकानेर के बीच चलती है जिसमें पंजाब के कैंसर रोगी बीकानेर के आचार्य तुलसी कैंसर अस्पताल में कैंसर का इलाज कराने जाते हैं।
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महाराष्ट्र में छिड़काव के समय कीटनाशकों के घातक प्रभाव में आने से कई किसानों की मौत हो चुकी है। महाराष्ट्र के विदर्भ में कीटनाशकों को छिडकाव करते वक्त अनजाने में कीटनाशक निगल जाने से किसानों की मौत हो जाने के मामले सामने आए हैं। विदर्भ का क्षेत्र पहले से किसानों की आत्महत्या के लिए बदनाम रहा है। मरने वालों की संख्या यवतमाल जिले में सबसे ज्यादा है। कीटनाशकों से मौत को देखते हुए राज्य सरकार ने विशेष जांच दल का गठन किया। जांच दल की रिपोर्ट तो अभी नहीं आई, पर द एलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) ने तथ्य जांच रिपोर्ट में मौतों के जिम्मेवार कीटनाशकों की सूची जारी की।
सरकार ने यवतमाल, अकोला, अमरावती, पड़ोसी जिले बुलढाना व वाशिम में पांच कीटनाशकों को प्रतिबंधित कर दिया। कीटनाशकों का शिकार होकर बीमार होने और मृत्यु हो जाने की घटना नई नहीं है और यह किसी इलाके की स्थानीय घटना भी नहीं है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2015 में देशभर में कीटनाशकों की वजह से हुई दुर्घटनाओं में करीब 7060 लोगों की मौत हो गई।
2002 में टॉक्सिक लिंक्स, सर्वोदय यूथ ऑर्गनाइजेशन, द सेंटर फॉर रिसोर्स एजुकेशन और कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर ने तेलांगना के वारंगल जिले में कीटनाशकों के छिड़काव के बाद किसानों की मौत का मामला उठाया था। सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरमेंट, दिल्ली ने 2005 में पंजाब के किसानों पर एक अध्ययन कराया था जिसमें किसानों के रक्त में विभिन्न कीटनाशकों के अंश पाए गए थे।
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने 2013 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व प्रोफेसर अनुपम वर्मा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति को 66 कीटनाशकों की जांच करनी थी जो कई देशों में प्रतिबंधित हैं, पर भारत में उनका इस्तेमाल हो रहा है।
समिति की सिफारिशों के आधार पर 2018 में श्रेणी-1 के तीन कीटनाशकों और 2021 में अन्य चार कीटनाशकों को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव दिया था। भारत में हर साल कीटनाशक विषाक्तता के करीब 10 हजार मामले आते हैं। खतरनाक कीटनाशकों का इस्तेमाल जारी रहने के लिए केंन्द्र व राज्य सरकार के कृषि विभागों का चलताऊ रवैया पूरी तरह जिम्मेवार है।
नियमों की खामियों को दूर करके कीटनाशकों से होने वाली मौतों और बीमारियों से बचा जा सकता है। काफी प्रयास के बाद यवतमाल जिले में किसानों के बीच सुरक्षात्मक दस्ताने, जूते और एप्रन का वितरण किया गया, पर असुविधाजनक होने की वजह से किसान इन इंतजामों का कम ही इस्तेमाल करते हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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