Opposition Alliance: अंतर्विरोधों से भरा है विपक्षी एकता का नारा

Opposition Alliance: पटना में विपक्षी नेताओं के जुटान के ठीक अगले ही दिन जिस तरह की बयानबाजी हुई है, उससे साफ है कि मोदी विरोधी गठबंधन में अंतर्विरोध भरे पड़े हैं। इन अंतर्विरोधों पर पार पाना नीतीश कुमार के लिए बड़ी चुनौती होगी। पटना की बैठक के अगले ही दिन आम आदमी पार्टी ने साफ कर दिया कि दिल्ली की सरकार के अधिकारों को सीमित करने वाले केंद्र सरकार के अध्यादेश के खिलाफ कांग्रेस को जल्द ही अपना रूख साफ करना होगा। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो विपक्ष की अगली जुटान में आम आदमी पार्टी के लिए शामिल हो पाना संभव नहीं होगा।

इसी तरह का बयान कांग्रेस के लोकसभा में नेता अधीर रंजन चौधरी का भी आया। चौधरी पश्चिम बंगाल से आते हैं और उन्होंने अपने राज्य को लेकर बड़ी बात कह दी। चौधरी ने कहा कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अगला चुनाव मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर ना सिर्फ लड़ेगी, बल्कि ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा भी खोलेगी। जिस समय पटना में सीताराम येचुरी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से हाथ मिला रहे थे, कुछ उसी वक्त येचुरी की केरल की पिनराई विजयन की सरकार केरल प्रांत के कांग्रेस अध्यक्ष सुधाकरन को धोखाधड़ी के केस में गिरफ्तार कर रही थी।

big challenge for Nitish Kumar to Overcoming contradictions in opposition unity

पटना के जुटान के बाद अव्वल तो विपक्षी एकता को और मजबूत होना चाहिए था। माना जा रहा था कि पटना का जुटान ऐसा गोंद साबित होगा, जो विपक्षी दलों को ऐसा चिपका देगा कि कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक विपक्ष को बिखरने नहीं देगा। लेकिन विपक्षी खेमे में जो हो रहा है, उससे साबित होता है कि विपक्ष की एकता की जो हांडी मोदी विरोधी आंच पर चढ़ तो गई है, लेकिन वह कहीं काठ की ना साबित हो जाए! भाजपा चाहेगी कि ऐसा ही हो। अगर ऐसा हो गया तो भाजपा के लिए राहत की बात होगी, क्योंकि ऐसा होना दरअसल भरोसे का दरकना होगा। दरार से भरे रिश्तों के साथ अपने प्रतिद्वंद्वी को चुनौती नहीं दी जा सकती।

हालांकि अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि इस बार किसकी पालकी सजेगी, जिसे वामपंथी दल भी ढोएंगे। चूंकि नीतीश कुमार की पहल पर पटना में यह जुटान हुआ है, इसलिए माना जा रहा है कि 2024 के दूल्हा वही हैं, जबकि बाकी दल बाराती हैं। वैसे बिहार विधानसभा के 2005 के चुनावों को छोड़ दें तो नीतीश की हैसियत भले ही बाराती बनने की ही रही, लेकिन चाहे भाजपा का साथ हो या राष्ट्रीय जनता दल का, दोनों ने हर बार उन्हें दूल्हा ही बनाया।

एक तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि अतीत में कांग्रेस के सहयोग से जब भी सरकारें बनीं हैं, अगर उसकी स्थिति अपना दूल्हा देने की रही और उसे बाराती बनना पड़ा तो वह सरकार एक साल भी टिक नहीं पाई। चौधरी चरण सिंह हों या चंद्रशेखर या फिर देवेगौड़ा या गुजराल, कोई भी कांग्रेस समर्थित प्रधानमंत्री एक वर्ष का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाया। चौधरी साहब तो प्रधानमंत्री रहते लोकसभा का मुंह तक नहीं देख पाए। हां, जब 2004 से 2014 तक कांग्रेस का दूल्हा रहा तो बारात पूरे दो कार्यकाल चलती रही।

पटना के जुटान में लालू यादव ने राहुल गांधी को दूल्हा बनने का सुझाव भी दे दिया है। भले ही कांग्रेस के रणनीतिकार इसे जाहिर ना कर रहे हों, लेकिन तय है कि वे राहुल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए हर मुमकिन घोड़े खोलने की कोशिश करेंगे। वैसे लालू के बयान के संकेतों को भी पढ़ा जाना चाहिए। बेशक, उनका दल नीतीश की दूल्हापरस्ती में बिहार में अपनी बारात सजाए हुए हो, लेकिन वह भी अंदरखाने में नहीं चाहेगा कि नीतीश दूल्हा बनें। लालू के बयानों से नहीं लगता कि लालू और उनका परिवार नीतीश से मिले अतीत के घावों को भूल पाया है। सत्ता के लालच और मौजूदा परिस्थितियों में भले ही वह नीतीश के साथ हो, लेकिन यह भी तय है कि लालू परिवार मौका मिलते ही नीतीश को धोने की कोशिश कर सकता है। आखिर उन्हें पलटू की उपाधि लालू परिवार ने ही दी है। लालू तो अतीत में कहते ही रहे हैं कि नीतीश के पेट में दांत है। राबड़ी तो उन्हें खुलेआम गालियां दे चुकी हैं।

सत्तावादी गठजोड़ की अपनी सीमाएं होती हैं। बेशक आज की पूरी राजनीति का मकसद सत्ता प्राप्ति हो गया है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता प्राप्ति के इस खेल में भी न्यूनतम नैतिकता दिखाने और बचाने की राजनीतिक कोशिश होती है। नीतीश की अगुआई में पाटलिपुत्र की धरती पर हुए जुटान में नैतिकता का आवरण भी नहीं दिखा। अतीत के जितने भी गठबंधन हुए हैं, उन्हें कम से कम नैतिक आवरण पहनाने की कोशिश जरूर हुई। उनका वैचारिक आधार भी बनाया गया। लेकिन इस जुटान का एक मात्र मकसद नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाना है।

यानी भावी गठबंधन का मतलब व्यक्ति विरोध है, सिद्धांत या वैचारिक विरोध नहीं। हालांकि इस विरोधी खेमे में कम से कम तीन दल ऐसे हैं, जो अपने को व्यक्ति विरोध के इस खेल से अलग दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, डीएमके और नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला कम से कम अपने दल को व्यक्ति विरोध की सीमा से दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं।

कहा जा रहा है कि पटना जुटान के बाद अगर कोई गठबंधन बना तो उसका नाम पीडीए यानी पैट्रियोटिक डेमोक्रेटिक एलाएंस होगा। हिंदी में समझें तो प्रस्तावित गठबंधन देशभक्त लोकतांत्रिक गठबंधन कहा जाएगा। अगर यह नाम स्वीकृत होता है तो भाजपा इस बहाने अपने को आगे बताने की कोशिश कर सकती है। नेशन फर्स्ट यानी राष्ट्र प्रथम की अवधारणा पर राजनीति भाजपा ही करती है, लेकिन अल्पसंख्यक तुष्टिकरण वाले राजनीतिक दलों के एजेंडा से राष्ट्र प्रथम की अवधारणा गायब रही है। हाल तक इन दलों को भाजपा इस आधार पर भी घेरती रही है। इस संदर्भ में अगर प्रस्तावित एलाएंस देशभक्त के तौर पर खुद को स्थापित करने या दिखाने की कोशिश करता है तो भाजपा इसे अपनी जीत बता सकती है। अगर ऐसा हुआ तो वह प्रस्तावित गठबंधन को प्रकारांतर से अपना पिछलग्गू भी बता सकती है।

गठबंधन का स्वरूप चाहे जो भी हो, लेकिन दिल्ली, पंजाब, केरल में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतर्विरोधों को पाट पाना आसान नहीं होगा। अरविंद केजरीवाल अभी भी हाहाकारी राजनीति के प्रतीक हैं, वे अपना रूप बदल सकते हैं, लेकिन अंदरखाने में उनका रूख नहीं बदलने वाला। नेशन फर्स्ट की अवधारणा की तरह उनकी अपनी अवधारणा है, केजरीवाल फर्स्ट। इससे पीछे वे वक्त की नजाकत और मजबूरी में जाते हैं। अन्यथा वह सामने वाले को डूबोने की राजनीति ही करते हैं। उनकी यह राजनीति कम से दिल्ली और पंजाब की कांग्रेस पार्टी को सहज नहीं रखती। माकपा और कांग्रेस की केरल, बंगाल और त्रिपुरा की इकाइयों की अपनी सीमाएं हैं। ममता के बरक्स बंगाल में कांग्रेस और माकपा एक हैं तो केरल में आमने-सामने। इसके उपजने वाले अंतरविरोधों को पाट पाना ना तो कांग्रेस के लिए संभव होगा ना ही माकपा के लिए। केजरीवाल के सामने तो कांग्रेस भी हथियार डालने से रही। पटना की बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे और केजरीवाल के बीच हुई तुर्शातुर्शी से यही जाहिर होता है।

इस तरह देखें तो विपक्षी जुटान मेंढक तौलने जैसा सियासी खेल है। मेंढक एक बार तराजू के पल्ले पर बैठ भी जाएँ, कुछ पल के लिए उन्हें तौला भी जा सकता है। लेकिन उनके कूदने और उछलने पर देर तक पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। राजनीति में ऐसी उछलकूद ना सिर्फ सरकारों की स्थिरता पर असर डालती है, बल्कि जनता के लिए भी कठिनाई पैदा करती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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