Iqbal on Israel: इजरायल - हमास की लड़ाई में अल्लामा इक़बाल की चर्चा

कोई सोच भी नहीं सकता है कि मौजूदा इजरायल-हमास की लड़ाई से मशहूर उर्दू शायर अल्लामा इक़बाल का भी कुछ लेना देना होगा। क्योंकि उनकी मृत्यु तो 1938 में ही हो चुकी थी। पर पाकिस्तान इस शायर को ग़ाज़ा पट्टी तक खींच लाया है। 30 अक्टूबर 2023 को पाकिस्तान के मुख्य अख़बार डॉन ने मौजूदा इजरायल - फिलिस्तीन संघर्ष में अल्लामा इक़बाल को उद्धृत करते हुए एक बड़ा लेख छापा है, जिसमें कहा गया है कि इकबाल फिलिस्तीनियों के हक़ के प्रति इतने आग्रही थे कि उन्होंने यहां तक कहा था कि यदि यहूदियों का हक़ फिलिस्तीन की जमीन पर है तो फिर अरबों का भी हक़ स्पेन पर होना चाहिए क्योंकि वे वहीं से आए थे।

डॉन में यह लेख रऊफ पारेख ने लिखा है। पारेख एक उर्दू कोशकार, भाषाविद् और अखबार के स्तंभकार हैं। वह लिखते हैं कि अल्लामा इक़बाल फ़िलिस्तीनी मुद्दे के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने तब यहूदी राष्ट्र इजरायल के बनने का विरोध किया था जब फ़िलिस्तीन के एक हिस्से को यहूदियों को देने का अंग्रेज़ों ने इरादा जताया था।

Allama Iqbal discussed in Israel-Hamas fight

रऊफ पारेख ने दावा किया है कि ज़र्ब-ए-कलीम में शामिल अपनी कविता शाम-ओ-फलस्तीन में, अल्लामा इक़बाल कहते हैं:- "है ख़ाक-ए-फ़लस्तीन पे यहूदी का अगर हक, हिस्पानिया पे हक नहीं क्यों अहल-ए-अरब का?" यानी यदि यहूदियों का फ़िलिस्तीन की धरती पर अधिकार है, तो अरबों का स्पेन पर अधिकार क्यों नहीं है? इस शेर को समझाते हुए पाकिस्तानी लेखक यह कहता है कि इकबाल की नज़र में फ़िलिस्तीन सिर्फ अरबों का है, और यदि कोई इस आधार पर फ़िलिस्तीन की भूमि पर यहूदियों के अधिकारों की वकालत करता है कि फ़िलिस्तीन से उन्हें बाहर निकाल दिया गया था, तो अरबों को भी स्पेन से निर्वासित कर दिया गया था, फिर उनका हक़ स्पेन पर क्यों ना हो।

रउफ पारेख कहते हैं कि इक़बाल को फ़िलिस्तीन के मुसलमानों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, क्योंकि उनका मानना था कि इस्लाम सभी नस्लों, क्षेत्रों और सीमाओं से परे है। हालांकि इकबाल की मृत्यु इजरायल बनने से पहले 1938 में ही हो गई थी, लेकिन यहूदी राष्ट्र इजरायल बनाने की मांग उनके जीवन काल में ही उठने लगी थी। लेखक का दावा है कि इकबाल मध्य पूर्व के घटनाक्रम पर करीब से नज़र रख रहे थे। पश्चिमी देश बातचीत के दौरान किए गए सभी वादों को कुचलते हुए फिलिस्तीन में यहूदियों को जमीन देने पर आमादा थे।

एक और पाकिस्तानी शायर बशीर अहमद डार ने अपनी पुस्तक अनवर-ए-इकबाल में लिखा है कि 30 दिसंबर, 1919 को लाहौर के प्रसिद्ध मोची गेट के बाहर एक सार्वजनिक रैली आयोजित की गई थी। इस रैली में इकबाल ने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें मांग की गई कि ब्रिटिश सरकार ने मध्य पूर्व में उनके क्षेत्रों के संबंध में जो मुसलमानों से वादे किए थे, पहले उनको पूरा किया जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी मुस्लिम भूमि का कोई भी हिस्सा किसी अन्य पक्ष को नहीं सौंपा जाना चाहिए।

रउफ पारेख आगे लिखते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद मुसलमानों को जो कुछ दिया गया, उससे इकबाल पूरी तरह निराश थे। उन्होंने लीग ऑफ नेशंस को 'कफन दुजदे चांद' या कब्रों से कफन चुराने वाले लोगों के रूप में सम्बोधित किया था। उन्होंने तब कहा था कि कब्रें बांटने के लिए एक लीग बनाई गई है। इकबाल के अनुसार अपने शासन के दौरान ओटोमन तुर्कों ने यहूदियों के प्रति बहुत उदार और सहिष्णु रवैया दिखाया था। उन्होंने यहूदियों को पश्चिमी दीवार के सामने प्रार्थना करने की अनुमति दी, जो यरूशलेम में डोम ऑफ रॉक के निकट स्थित एक प्राचीन दीवार थी और मुसलमानों के बीच बुराक दीवार के रूप में जानी जाती थी।

इकबाल ने सितंबर 1929 में अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई यहूदी समर्थक नीतियों की आलोचना करते हुए एक भाषण दिया था। जिसके अंश को मुहम्मद रफीक अफजल ने अपनी पुस्तक गुफ्तार-ए-इकबाल में उद्धृत किया है। इक़बाल के अनुसार "तुर्क यहूदियों के प्रति असाधारण सहिष्णु रवैया दिखा रहे हैं। इस्लामिक शरिया के अनुसार अल-अक्सा मस्जिद का पूरा कोर्ट क्षेत्र 'वक्फ' (या बंदोबस्ती) है। यहूदी इसके नियंत्रण और उपयोग का दावा करते हैं लेकिन कानूनी और ऐतिहासिक रूप से उनका इस पर कोई अधिकार नहीं है"।

राष्ट्र संघ का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में था और अंग्रेज यहूदियों का समर्थन कर रहे थे। तो इक़बाल ने अपनी कविता ज़र्ब-ए-कलीम में तंज करते हुए लिखा - "तेरी दावा न जिनेवा में है न लंदन में, फरंग की राग-ए-जान पंजा-ए-यहूद में है।" इस शेर में इकबाल फिलीस्तीनी अरबों को संबोधित करते हुए कहते हैं, "आपका हिमायती न तो जिनेवा में हैं और न ही लंदन में क्योंकि पश्चिम के गले की नस यहूदियों के चंगुल में है।"

डॉन में छपे लेख के अनुसार एक और कलमनिगार मुहम्मद हमजा फारूकी ने अपने एक लेख में उल्लेख किया है कि अल्लामा इकबाल 1931 के आखिरी कुछ महीनों के दौरान लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में अधिक स्वशासन के सुधारों पर चर्चा करने गए थे। उन्हीं दिनों, विश्व मुस्लिम कांग्रेस द्वारा ज़ायोनिस्ट खतरे पर चर्चा करने के लिए एक सम्मेलन का आयोजन येरुशलम में भी हो रहा था। इक़बाल लंदन का सम्मेलन छोड़कर येरुशलम सम्मेलन में भाग लेने के लिए चले गये थे। अल्लामा इक़बाल ने 7 अक्टूबर,1937 को मुहम्मद अली जिन्ना को पत्र लिखकर इजरायल को लेकर पूरी चिंता जाहिर की थी। उन्होंने पत्र में लिखा था कि फिलिस्तीन का प्रश्न मुसलमानों के दिमाग को बहुत परेशान कर रहा है।

इक़बाल वे शायर थे जिन्होंने एक तरफ तो लिखा था 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' और वहीं दूसरी तरफ उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना को अलग पाकिस्तान बनाने के लिए उकसाया था। अल्लामा इक़बाल ने ही भारत के मुसलमानों की एक अलग पहचान और उस पहचान की रक्षा के लिए एक अलग मातृभूमि की स्थापना की मांग को सबसे पहले उठाया था। 28 मार्च 1909 को एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी की स्थापना के विचार को अस्वीकार करते हुए कहा था - "अब मैंने यह मानना ​​शुरू कर दिया है कि मुसलमानों और हिंदुओं के लिए अलग राष्ट्रीय पहचान उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक है।"

1930 में, इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के वार्षिक सत्र में इकबाल ने कहा था - "भारत अलग-अलग नस्लों से संबंधित, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले और अलग-अलग धर्मों को मानने वाले मानव समूहों का एक महाद्वीप है। उनका व्यवहार किसी भी तरह से सामान्य नस्ल चेतना से निर्धारित नहीं होता है। इसलिए, मैं उनके सर्वोत्तम हित में एक समेकित मुस्लिम राज्य के गठन की मांग करता हूं।"

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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