डॉलर की मजबूती के क्या फायदे और नुकसान

बीते एक साल से डॉलर की कीमत बढ़ती जा रही है

नई दिल्ली, 20 सितंबर। यूरो और जापानी येन समेत दुनिया की छह बड़ी मुद्राओं से जुड़े सूचकांक में शुक्रवार की बढ़ोत्तरी के साथ डॉलर बीते दो दशकों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है. बहुत से पेशेवर निवेशकों को इसके जल्दी नीचे जाने के आसार नहीं दिख रहे हैं.

जो लोग कभी अमेरिका की सीमा से बाहर नहीं गये उन पर भी डॉलर की कीमत के बढ़ने का असर होगा. आखिर डॉलर की कीमत इतनी ज्यादा क्यों बढ़ रही है और इसका निवेशकों और आम लोगों पर क्या असर होगा?

डॉलर की मजबूती का क्या मतलब है?

एक डॉलर से पहले की तुलना में अब दूसरी मुद्राएं ज्यादा खरीदी जा सकती हैं. जापान के येन को ही लीजिये. एक साल पहले एक डॉलर के बदले 110 येन से थोड़ा कम मिलता था वह आज 143 येन मिल रहा है यानी 30 फीसदी से ज्यादा. अमेरिकी डॉलर की मजबूती का सबसे ज्यादा असर यहीं दिख रहा है.

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विदेशी मुद्रा का भाव एक दूसरे की तुलना में लगातार बदलता रहता है क्योंकि बैंक, कारोबार और व्यापारी उन्हें पूरी दुनिया में टाइमजोन के हिसाब से खरीदते और बेचते रहते हैं. यूएस डॉलर इंडेक्स यूरो, येन और दूसरी प्रमुख मुद्राओं की तुलना में डॉलर की कीमत आंकता है. यह सूचकांक इस साल 14 फीसदी से ज्यादा बड़ गया. निवेश के दूसरे माध्यमों की तुलना में यह ज्यादा आकर्षक दिख रहा है क्योंकि बाकियों के लिये तो यह साल अच्छा नहीं रहा. अमेरिकी शेयर बाजार 19 फीसदी नीचे है, बिटकॉइन ने अपनी आधी कीमत खो दी है और सोना 7 फीसदी नीचे गया है.

दुनिया की ज्यादातर मुद्राओं की तुलना में डॉलर की कीमत बढ़ रही है

डॉलर मजबूत क्यों हो रहा है?

अमेरिकी अर्थव्यवस्था दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अच्छा प्रदर्शन कर रही है और यही डॉलर की मजबूती का कारण है. महंगाई की दर ऊंची है, रोजगार की स्थिति मजबूत है और सेवा क्षेत्र जैसे अर्थव्यवस्था के दूसरे सेक्टरों का भी हाल अच्छा है. इन सब ने धीमे पड़ते निर्माण क्षेत्र और कम ब्याज दर में अच्छा करने वाले सेक्टरों से उपजी चिंताएं दूर की हैं. इसके नतीजे में व्यापारी उम्मीद कर रहे हैं कि फेडरल रिजर्व ब्याज बढ़ाते रहने का अपना वादा निभाता रहेगा और कुछ समय के लिये यह व्यवस्था लागू रहेगी. इसके सहारे ऊंची महंगाई दर का सामना करने की तैयारी है जो 40 सालों में फिलहाल सबसे ऊंचे स्तर पर है.

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इन सब उम्मीदों ने सरकार के 10 सालों के सरकारी प्रतिभूतियों के राजस्व में एक साल पहले के 1.33 फीसदी की तुलना में 3.44 फीसदी की बढ़ोत्तरी की है.

सरकारी प्रतिभूतियों की चिंता किसे?

जो निवेशक अपने पैसे से ज्यादा कमाई करना चाहते हैं उनका ध्यान लुभावने अमेरिकी बॉन्ड की तरफ गया है. दुनिया भर के निवेशक उनकी ओर जा रहे हैं. फेडरल बैंक की तुलना में दूसरे देशों के केंद्रीय बैंक इस समय निवेश आकर्षित करने में ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाओं का हाल अच्छा नहीं है. यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने अपने प्रमुख दर में अब तक की सबसे ज्यादा 0.75 फीसदी की बढ़ोत्तरी की है. दूसरी तरफ फेडरल रिजर्व अपनी दर इस साल इसी मात्रा में दो बार बढ़ा चुका है और अगले हफ्ते इसे एक बार और बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है. कुछ लोगों को तो उम्मीद है कि मंगलवार को महंगाई के बारे में जो रिपोर्ट आई है उसे देखने के बाद पूरे एक प्रतिशत की भी बढ़ोत्तरी हो सकती है.

यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में 10 सालों के सरकारी प्रतिभूतियों पर अमेरिका की तुलना में कम राजस्व हासिल हुआ है. मसल जर्मनी में 1.75 फीसदी तो जापान में केवल 0.25 फीसदी.

यूरो और डॉलर की कीमत अब बराबर हो गई है

मजबूत मुद्रा से अमेरिकी सैलानियों को फायदा

टोक्यो में रात के खाने पर आज अगर कोई अमेरिकी सैलानी 10,000 येन खर्च करता है तो वह उसी खाने के लिये एक साल पहले की तुलना में 23 फीसदी कम डॉलर दे रहा है. मिस्र के पाउंड से लेकर अर्जेंटीना के पेसो और दक्षिण कोरिया के वॉन तक के मुकाबले इस साल डॉलर की कीमत जिस तेजी से बढ़ रही है वह कई और देशों में अमेरिकी सैलानियों का फायदा करायेगी.

तो क्या मजबूत डॉलर से सिर्फ उन अमीर अमेरिकी लोगों का ही फायदा होगा जो दूसरे देशों की सैर करने जाते हैं? नहीं ऐसा नहीं है मजबूत डॉलर अमेरिका के आम लोगों को भी फायदा पहुंचायेगा क्योंकि इससे आयात की जाने वाली चीजों की कीमतें घटेंगी और महंगाई की दर नीचे जायेगी. उदाहरण के लिये जब यूरो के मुकाबले डॉलर की कीमत बढ़ती है तो यूरोपीय कंपनियों को हर डॉलर की बिक्री से ज्यादा यूरो मिलते हैं. ऐसे में वो अपने सामान की डॉलर में कीमत घटा कर भी उसी मात्रा में यूरो हासिल कर सकते हैं. वो चाहें तो डॉलर में कीमत वही रख कर ज्यादा यूरो अपनी जेब में डाल सकते हैं या फिर वो इन दोनों के बीच में एक संतुलन बनाने की भी कोशिश कर सकते हैं.

अमेरिका में आयात की कीमतें एक महीने पहले की तुलना में अगस्त में 1 फीसदी कम हो गईं. इसी तरह जुलाई में यह उसके पिछले महीने की तुलना में 1.5 फीसदी कम हुई इससे देशवासियों को महंगाई से थोड़ी राहत मिली. आयात किये जाने वाले फल, मेवे और इसी तरह की कुछ और चीजों की कीमतें 8.7 फीसदी कम हुई हैं. एक साल पहले की तुलना में यह अंतर करीब 3 फीसदी का है.

मजबूत डॉलर आमतौर पर कई सामानों की कीमत पर असर डाल सकता है. इसकी वजह यह है कि तेल, सोना और दूसरी कई चीजें दुनिया भर में अमेरिकी डॉलर में खरीदी और बेची जाती हैं. जब डॉलर की मुद्रा येन के मुकाबले बढ़ती है तो जापानी खरीदार को उसी मात्रा में येन के बदले कम तेल मिलता है.

तो क्या मजबूत डॉलर से सिर्फ फायदा ही फायदा है?

बिल्कुल नहीं. अमेरिकी कंपनियां जो दूसरे देशों को बेचती हैं उनका मुनाफा घटता है. मैकडॉनल्ड की कमाई एक साल पहले की गर्मियों की तुलना में इस बार 3 फीसदी घट गई. अगर डॉलर की कीमत दूसरी मुद्राओं की तुलना में वही रहती तो उसकी कमाई 3 फीसदी बढ़ी होती. इसी तरह विदेशी मुद्रा की कीमतों में बदलाव के कारण माइक्रोसॉफ्ट के पिछली तिमाही के राजस्व में में 59.5 करोड़ डॉलर की कमी आई.

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कई कंपनियों के राजस्व को लेकर इस तरह की चेतावनियां दी जा रही हैं. डॉलर की कीमत बढ़ने का असर उनके मुनाफे पर और ज्यादा दबाव बनायेगा. एसएंडपी 500 इंडेक्स में शामिल कंपनियां मोटे तौर पर 40 फीसदी से ज्यादा कमाई अमेरिका के बाहर के देशों में करती हैं.

बहुत सी कंपनियां और उभरती अर्थव्यवस्था वाली सरकारें अपनी मुद्रा की बजाय अमेरिकी डॉलर के रूप में कर्ज लेती हैं. जब उनकी अपनी मुद्रा से कम डॉलर मिल रहे हों तो फिर उन पर दबाव बढ़ जाता है.

कब तक मजबूत रहेगा डॉलर

आने वाले दिनों में डॉलर की कीमत में बड़ा बदलाव आ सकता है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ समय तक डॉलर मजबूत स्थिति में बना रहेगा. मंगलवार को अमेरिकी महंगाई के बारे में आई रिपोर्ट ने बाजार को कड़ा झटका दिया है और इस बात के प्रबल संकेत हैं कि यह अभी इतनी जल्दी नीचे नहीं जायेगा. व्यापारी फेडरल रिजर्व से ब्याज दर बढ़ाने की उम्मीद कर रहे हैं जो अगले साल तक जारी रह सकता है. फेडरल रिजर्व के अधिकारियों का भी कहना है कि वो ब्याज दर बढ़ाते रहेंगे जब तक कि महंगाई पर लगाम नहीं लगती, भले ही इसके कारण आर्थिक विकास प्रभावित हो. जाहिर है कि फेडरल रिजर्व का यह रुख डॉलर की मजबूती को फायदा पहुंचाता रहेगा.

एनआर/आरपी (एपी)

Source: DW

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