Gyanvapi: पहली बार 139 साल पहले हुआ इसका जिक्र, 86 साल पहले अदालत का पहला फैसला, 10 अहम बातें जानिए
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बनी Gyanvapi Masjid सर्वे के अदालती फैसले के कारण फिर चर्चा में है। जानना रोचक है कि पहली बार ज्ञानवापी नाम का जिक 139 साल पहले हुआ था। 86 साल पहले भी ये केस अदालत की दहलीज पर खड़ा हुआ था।
ज्ञानवापी से जुड़े दस्तावेजी साक्षय के मामले में 1883-84 काफी अहम वर्ष है। 139 साल पहले के राजस्व दस्तावेज में पहली बार ज्ञानवापी नाम का जिक मिलता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटिश इंडिया के रेवेन्यू रिकॉर्ड में इसका जिक्र जामा मस्जिद ज्ञानवापी के रूप में मिलता है।

ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग, मुस्लिमों को वुजू का अधिकार, महिलाओं को श्रृंगार गौरी की पूजा का अधिकार जैसे कई जटिल सवाल हैं, जिस पर अदालत को फैसला करना है, लेकिन पहली बार ये मामला कोर्ट के सामने 86 साल पहले पहुंचा था।
1936 में दायर मुकदमे पर अगले साल यानी 1937 में अदालत ने पहला फैसला सुनाया था। पहली बार के फैसले में अदालत ने इसे मस्जिद के रूप में मान्यता दी थी। मस्जिद को अदालत ने अपने फैसले में वक्फ की संपत्ति करार दिया था।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम पक्ष का दावा है कि इस मस्जिद का जिक्र भारत की आजादी से सैकड़ों साल पहले भी हुआ। दावे के अनुसार, 1669 में मस्जिद तामीर कराई गई, उस समय से लगातार नमाज पढ़ी जा रही है।
ज्ञानवापी के बारे में दावों के अनुसार, मस्जिद के पश्चिमी दिशा में दो कब्रें हैं। सालाना उर्स होता है। उर्स की इजाजत अदालत के फैसले में भी दी गई थी। कब्र किस साल की है, इस बारे में कोई दस्तावेज नहीं है।
इतिहास की किताबों में मस्जिद से जुड़ी कई कहानियां मिलती हैं। एक किस्से के अनुसार काशी से औरंगजेब के गुजरते समय कच्छ के राजा की एक रानी मंदिर के तहखाने में बरामद हुईं। उनके बदन पर कपड़े और आभूषण नहीं थे।
इतिहासकार के अनुसार, औरंगजेब को जब कांड का पता लगा तो उसने मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया और कहा, जिस परिसर में डकैती और दुष्कर्म हों, वह मंदिर या ईश्वर का घर नहीं हो सकता।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इतिहासकारों का मानना है कि कच्छ की पीड़िता रानी की अपील पर औरंगजेब ने परिसर में मंदिर तो नहीं बनवाया लेकिन धार्मिक स्थल के नाम पर मस्जिद तामीर कराई गई।
इससे साफ है कि मंदिर को ढहाने का कारण धार्मिक द्वेष नहीं, कच्छ की रानी के साथ मंदिर परिसर में पुजारियों का दुर्व्यवहार था। प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी के अनुसार, मंदिर गिराने का फरमान औरंगजेब का था, लेकिन निगरानी कच्छ के राजा जयसिंह ने की।
1991 से पहले भी कोर्ट पहुंचा ज्ञानवापी केस
अप्रैल, 2023 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग को वाराणसी की कोर्ट ने सर्वे का आदेश दिया। 32 साल पहले दायर मुकदमे पर कोर्ट का आदेश सामने आया।
दिलचस्प है कि 1991 में संसद में बने कानून का सहारा लेकर मुस्लिम पक्ष ज्ञानवापी पर दावा करता है। इस कानून के अनुसार, 15 अगस्त, 1947 से पहले बने किसी भी धर्मस्थल को दूसरे धर्म के परिसर के रूप में नहीं बदला जाएगा। ऐसा करने पर जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
86 साल पहले अदालत के फैसले में मस्जिद का कुल एरिया, एक बीघा, नौ बिस्वा और छह धूर तय किया गया। 1991 में मस्जिद की बाउंड्री बनी, लेकिन एरिया कम यानी केवल निर्माण क्षेत्र को लिया गया।
1991 में तीन लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और सर्वे की अपील की। हरिहर पांडेय, सोमनाथ व्यास और प्रोफेसर रामरंग पांडेय ने याचिका दायर की थी। दो लोगों की मौत हो चुकी है। अभी केवल हरिहर पांडेय जीवित हैं।
1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्टे ऑर्डर के आधार पर यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया गया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई।
देश की सबसे बड़ी अदालत के फरमान के बाद वाराणसी की अदालत में ज्ञानवापी मामले की सुनवाई शुरू हुई और अदालत ने सर्वेक्षण का आदेश दिया। इसी निर्देश के आधार पर जुलाई, 2023 में अदालत ने सशर्त ASI सर्वेक्षण का आदेश दिया।












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