चीड़ व देवदार के छिल्लों से बने भैलो के करतब, ढ़ोल की थाप पर रासों, तांदी नृत्य, खास है सीमांत गांव का ये उत्सव
गंगोत्री और मुखबा गांव में सेल्कू पर्व धूमधाम से मनाया गया
देहरादून, 17 सितंबर। विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री धाम और गंगा मां के शीतकालीन प्रवास मुखबा गांव में सेल्कू पर्व धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान स्थानीय लोगों ने बग्वाल की तर्ज पर चीड़ व देवदार के छिल्लों से बने भैलो खेले और रातभर रासों, तांदी नृत्य किया। इस उत्सव में ग्रामीण पारंपरिक पकवान द्यूड़ा, स्वाले, पकौड़े बनाकर मेहमानों को परोसा जाता है।
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गंगोत्री और मां गंगा के शीतकालीन प्रवास मुखबा गांव में सेल्कू पर्व की धूम
उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध चारधाम में से एक गंगोत्री धाम और मां गंगा के शीतकालीन प्रवास मुखबा गांव में सेल्कू पर्व की धूम रही। मुखबा गांव सीमांत गांव हैं। 6 माह मां गंगा की डोली यहीं विराजमान होती है। शुक्रवार रात यहां दीवाली स्थानीय लोगों की भाषा में बग्वाल जैसा माहौल नजर आया। इसी पंरपरा को पुरोहितों नें गंगोत्री धाम में भी आयोजन किया। इसकी तैयारी ग्रामीण कई महिनों से करते हैं। सबसे पहले अपनी बेटियों और रिश्तेदारों को इस उत्सव का निमंत्रण दिया जाता है।

चीड़ व देवदार की लकड़ी के छिल्लों से बने भैलो जलाया जाता
इसके बाद सबके घरों में मक्की के आटे व गुड़ से द्यूड़े तैयार किए जाते हैं। जो कि घी और आलू के झोल के साथ परोसे जाते हैं। इस दौरान कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं। रात में सभी लोग मंदिर परिसर में एकत्र होकर चीड़ व देवदार की लकड़ी के छिल्लों से बने भैलो बनाते हैं और पूजा कर उन्हें जलाया जाता है। इस दौरान वाद्य यंत्र की धुन के साथ जमकर रासों, नृत्य किया जाता है। इस बीच ब्रह्मकमल, जययाण, केदार पत्ती व गंगा तुलसी से सोमेश्वर देवता की पूजा होती है। जिसमें डोली को नृत्य भी होता है। इस दौरान सभी को ये पुष्प प्रसाद स्वरूप दिए जाते हैं।

उत्सव पीढि़यों से मनाया जा रहा
ग्रामीणों का कहना है कि यह उत्सव पीढि़यों से मनाया जा रहा है। कोशिश यही है कि आने वाली पीढ़ी भी इस उल्लास के साथ मनाते रहे। जो कि युवाओं में नजर भी आता है। ये उत्सव दो दिन तक मनाया जाता है। दूसरे दिन सोमेश्वर देवता की पूजा के बाद ग्रामीण दिन में रासों, तांदी नृत्य करते हैं। इस दौरान डोली के साथ ग्रामीण जमकर नृत्य करते हैं। दूसरे दिन सबसे आकर्षक होता है, सोमेश्वर देवता का आसन। जो कि गांव के एक व्यक्ति पर अवतरित होते हैं। इसके बाद वे ग्रामीणों को देवभाषा में आशीर्वाद भी देते हैं। साथ ही नंगे पांव धारदार फरसे जिसे स्थानीय लोग डांगरी कहते हैं के ऊपर काफी दूर तक नृत्य और चलकर जाते हैं।

परंपरा संस्कृति और भावनाओं का एक अनोखा मिलन
इस उत्सव को मनाने के पीछे कई मान्यताएं हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस समय खेतो में कोई कार्य न होने के कारण और फसल आ जाती या आने वाली होती है,इसलिए भी इस मेले का आयोजन किया जाता है। सेलकू मेले में परंपरा संस्कृति और भावनाओं का एक अनोखा मिलन होता है। लोक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है इस दिन इलाके के लोगो ने तिब्बत के आक्रमणकारियों को हराया था और उसी के जश्न में इस त्यौहार मनाया जाता है।

त्यौहार के पीछे एक इतिहासिक घटना
स्थानीय लोग इस त्यौहार के पीछे एक इतिहासिक घटना से जोड़ते है। यहां तिब्बत का शासन हुआ करता था। जब भी स्थानीय सेना तिब्बत आक्रमणकारियों से युद्ध करती तो हार जाती। ऐसी बीच नेपाल के सेनापति अमर सिंह थापा से भी यही गुहार लगाई गई लेकिन वे भी तिब्बत आक्रमणकारियों को हरा नही पाए। अंत में आठ गांव के नौजवान युवाओ ने तिब्बत जाकर उन्हें हरा दिया। जीत के जश्न के उपलक्ष्य में यह त्यौहार स्थानीय लोग मानते है।

उत्सव को लोग धूमधाम से मनाते
इसके अलावा एक और घटना है। एक अंग्रेज विल्सन ने सोमेश्वर देवता को चुनौती दे दी कि जिन लोहे के डांगर में उनका पश्वा चलता है वै पैनी नही है। सोमेश्वर देवता ने चुनौती स्वीकार की और विल्सन की पैनी तलवारों पर एक एक कर सोमेश्वर भगवान ने जब चार कदम चल दिए तो विल्सन ने अपनी हार स्वीकार कर ली। तब से इस उत्सव को लोग धूमधाम से मनाते हैं।












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