मदरसों को अब तक हुई फंडिंग की जांच हो, कांग्रेस के विरोध को उसकी तुष्टिकरण नीति का हिस्सा: महेंद्र भट्ट
भाजपा ने अवैध मदरसों पर जारी कार्रवाई का पुरजोर समर्थन करते हुए कांग्रेस के विरोध को उसकी तुष्टिकरण नीति का हिस्सा बताया है। प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कहा कि सरकार को बंद कराए सभी मदरसों को अब तक हुई फंडिंग की जांच भी करानी चाहिए।
वहीं इनको संरक्षण देने वाले तत्वों की पहचान भी जरूरी बताई। उन्होंने कहा कि देवभूमि जैसे शांत और सभ्य प्रदेश में नियम विरुद्ध और बगैर अनुमति के मदरसों का संचालन किया जाना चिंताजनक है। लिहाजा यदि ऐसे संस्थानों को चिन्हित कर संवैधानिक प्रक्रिया से उनपर कार्रवाई की जा रही है तो किसी को तकलीफ क्यों हो रही है।

कहा कि भाजपा का इस मुद्दे पर रुख स्पष्ट है कि बिना किसी सरकारी मदद के प्रदेश में ये मदरसे कैसे अब तक फल फूल रहे थे? कौन लोग और कौन सी ऐसी संस्थाएं हैं जो इनको फंडिंग करती हैं और कहीं उनके तार विदेश तो नहीं जुड़े हैं? साथ उनको इस अवैध रास्ते पर आगे बढ़ने में किस किस ने मदद की हैं, उनके नाम भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
उन्होंने पूर्व सीएम हरीश रावत के विरोध को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि उनका मुस्लिम तुष्टिकरण से प्रेम तो जगजाहिर है। पहले भी वे बंद कमरों में मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वादे और जुम्मे की नमाज पर छुट्टी के निर्णयों से चर्चा में रहे और जब हार गए तो इन मुद्दों से पलट गए। आज फिर अवैध मदरसों पर कार्रवाई का स्वागत और समर्थन करने के बजाय वे अपने असली तुष्टिकरण के रंग में नजर आ रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि जो बिना अनुमति और नियम विरुद्ध मदरसे संचालित हो रहे हैं, क्या उनका हरदा समर्थन करते हैं? वहां यदि नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं होगा, क्या किया वे इसकी गारंटी देंगे? वहां सरकारी पैटर्न से अलग धर्म विशेष की कट्टरपंती शिक्षा से प्रदेश का माहौल खराब हो, क्या कांग्रेस इसके पक्ष में है?
उन्होंने निशाना साधा कि कांग्रेस नेताओं और उनके पूर्व सीएम को ऐसे तमाम सवालों के जवाब देने चाहिए। अन्यथा देवभूमि के स्वरूप, उसकी छवि और माहौल को शांत और पवित्र बनाए रखने के लिए सरकार के सहयोग के लिए आगे आना चाहिए। साथ ही चुनौती देते हुए कहा कि अब सही समय है कांग्रेस नेताओं द्वारा उत्तराखंड के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन का है चाहे इसके लिए उन्हें अपने आलाकमान के खिलाफ क्यों न जाना पड़े।












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