उत्तराखंड के लोकसभा चुनावों में सियासी विरासत को आगे बढ़ाने में असफल रहे ये दिग्गज, क्या इस बार टूटेगा मिथक
उत्तराखंड की पांच लोकसभा सीटों पर प्रचार तेज हो गया है। हर कोई अपनी जीत के दावे कर रहा है। लेकिन सबसे ज्यादा अगर किसी सीट पर लोगों की नजर है तो वह है हरिद्वार सीट। यहां हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत चुनावी मैदान में। इस सीट पर क्या हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत जीतकर प्रदेश का एक ऐसा मिथक तोड़ पाएंगे।

जो अब तक किसी भी बड़े नेता या उनके परिवार के कोई उत्तराधिकारी न तोड़ पाएं हो। उत्तराखंड में कई बार बड़े नेताओं के बेटे या परिवार के लोग चुनाव में उतरे लेकिन अब तक किसी को जीत हासिल नहीं हुई है। इस लिस्ट में कई दिग्गज नाम शामिल हैं। लेकिन उनके परिवार को उत्तराधिकारी के तौर पर जीत नहीं मिली।
सबसे पहले बात टिहरी के राज परिवार की। मानवेंद्र शाह टिहरी सीट से आठ बार सांसद रहे। लेकिन उनके निधन के बाद उनके बेटे मनुजेंद्र 2007 में हुए उपचुनाव में चुनाव हार गए। इसी तरह टिहरी सीट पर बहुगुणा परिवार के साथ हुआ। पिता विजय बहुगुणा सांसद रहे और मुख्यमंत्री भी बने, लेकिन बेटे साकेत बहुगुणा को पिता के सीट छोड़ने के बाद भी हार का सामना करना पड़ा।
साकेत दो बार चुनाव लड़े लेकिन हार गए। टिहरी सीट पर एक और बड़ा नाम है ब्रह्रमदत्त का। ब्रह्रमदत्त ने दो बार टिहरी सीट का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन बेटे नवप्रभात विधायक और मंत्री तो बने लेकिन सांसद नहीं बन पाए। नवप्रभात दो बार चुनाव लड़े और दोनों बार चुनाव हार गए।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और गढ़वाल सीट से सांसद और केंद्र में मंत्री रहे बीसी खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी ने पिता की विचारधारा से अलग होकर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन मनीष खंडूरी चुनाव हार गए। इस चुनाव में बीसी खंडूरी के राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत ने उनके बेटे को चुनाव हराया।
अब हरिद्वार सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद रहे हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत चुनावी मैदान में है। ये उनकी राजनीति में लांचिंग है। लेकिन जिस तरह से उत्तराखंड का इतिहास है, क्या वे इस मिथक को तोड़ पाएंगे।












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