उपराष्ट्रपति चुनाव में NDA के उम्मदीवार जगदीप धनखड़ के समर्थन में क्यों उतरीं मायावती, जानिए इसकी वजहें

लखनऊ, 03 अगस्त : उत्तर प्रदेश की पूर्व सीएम और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने राष्ट्रपति चुनाव के बाद अब उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ को समर्थन देने का ऐलान किया है। दरअसल राजनितिक विश्लेषकों की माने तो मायावती के भीतर अब सड़क पर आकर जनहित के मुद्दों को उठाने का माद्दा नहीं बचा है। दूसरी ओर बंगाल ओर महाराष्ट्र में जिस तरह से केंद्रीय जांच एजेंसियां विपक्ष के नेताओं पर हल्ला बोले हुए हैं उसका भी एक संदेश अन्य राज्यों में भी जा रहा है जिससे इस तरह के फैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

मायावती की जनता और अपने नेताओं से दूरी

मायावती की जनता और अपने नेताओं से दूरी

यूपी में पिछले चार अहम चुनावों पर नजर डालें तो मायावती को हर बड़े चुनाव में हार का सामना करना पड़ रहा है। अंतिम बार यूपी में बसपा को 2007 में ही चुनाव में शानदार सफलता मिली थी उसके बाद यूपी में बसपा का ग्राफ लगातार गिरता चला गया। इससे बसपा कमजोर हुई जिससे धीरे धीरे कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। मायावती के कभी खास रहे स्वामी प्रसाद मौर्य चाहें योगी की सरकार में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक हों ये कभी मायावती के सबसे खास हुआ करते थे। लेकिन मायावती की जनता और नेताओं से दूरी आज उनपर भारी पड़ रही है।

मायावती को अपने नेताओं पर भरोसा नहीं

मायावती को अपने नेताओं पर भरोसा नहीं

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो मायावती की सबसे बड़ी कमजोरी ये है कि उन्होंने अपनी पार्टी में कभी सेंकेंड लाइन तैयार नहीं होने दिया। मायावती के साथ जो बड़े नेता थे वो सभी छोड़कर चले गए। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि मायावती को अपने नेताओं पर भरोसा नहीं रह गया है। वह अपने अलावा किसी को लाइमलाइट में नहीं आने देना चाहती हैं। उनकी इसी रवैयै की वजह से लालजी वर्मा, रामअचल राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य और नसीमुद्दीन सिद्दिकी जैसे नेता बसपा छोड़कर चले गए।

बहनजी में सड़क पर उतरकर लड़ने का माद्दा खत्म

बहनजी में सड़क पर उतरकर लड़ने का माद्दा खत्म

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मनीष हिन्दवी कहते हैं कि बहनजी की एक कमजोरी हमेशा से रही है कि वह सड़क पर उतरकर जनता से जुड़े मुद्दों पर संघर्ष नहीं करती हैं। जब आप जनता से जुड़े मुद्दे नहीं उठाएंगे तो जनता से आपसे कटती चली जाएगी। नेताओं की ताकत जनता में ही निहित होती है। जनता के बल पर ही नेता अपनी लड़ाई लड़ते रहे हैं। अगर आप जनता के नायक हैं तो किसी को भी आपके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने में दस बार सोचना पड़ेगा लेकिन अब आज आपमें लड़ने का माद्दा ही नहीं रहेगा तो फिर अपने सिद्धातों से समझौता तो करना ही पड़ेगा।

मायावती को सता रही अपना साम्राज्य बचाने की चिंता

मायावती को सता रही अपना साम्राज्य बचाने की चिंता

पहले राष्ट्रपति के चुनाव में और अब उपराष्ट्रपति के चुनाव में मायावती ने बीजेपी के उम्मीदवार को समर्थन देने का ऐलान किया है। राजनतिक विष्लेषक इसके पीछे कई वजहें मानते हैं उनमें एक वजह ये भी है कि मायावती को अपने साम्राज्य की भी चिंता सता रही है। कुछ समय पहले मायावती ने जब बीजेपी के खिलाफ मुखर होना शुरू किया था उसी समय उनके भतीजे आकाश और भाई आनंद कुमार केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आ गए थे। गर्दन फंसती देख वहां मायावती को समझौता करना पड़ा। तब जाकर परिवार को राहत मिल पाई। मायावती को भी लगता है कि इस समय अपने परिवार और साम्राज्य की चिंता ज्यादा अहम है।

महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में केंद्रीए एजेंसियों के निशाने पर विपक्ष

महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में केंद्रीए एजेंसियों के निशाने पर विपक्ष

मनीष हिन्दवी कहते हैं कि, महाराष्ट्र में शिवसेना के नेता संजय राउत हो या फिर बंगाल हो सभी जगह केंद्रीय एजेंसियों के राडार पर विपक्ष के नेता हैं। चूंकि जब नेता ही बेदाग नहीं हैं तो उसका फायदा सत्ता पक्ष भी उठाता है और नेताओं क कमजोर नस को दबाकर अपना हित साधा जाता है। इस तरह केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई भी विपक्ष के नेताओं में एक डर पैदा कर रहा है। यदि जांच एजेंसियों के प्रेशर को झेलने का माद्दा किसी नेता में है तो ही वह सत्ता पक्ष से लड़ पाएगा अन्यथा आपको अपना रुख बदलना ही पड़ेगा जैसा कि आज देखने को मिल रहा है।

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