आखिर क्या है प्रियंका और मायावती की गुपचुप मुलाकात का राज, 2024 में फिर साथ आएंगे सपा-बसपा?

Mayawati in india alliance: 2024 के लोकसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का वक्त बचा है, और चाहे विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' हो या फिर एनडीए...दोनों तरफ से इस चुनावी महासंग्राम के लिए खेमेबंदी शुरू हो गई है।

लेकिन, इस बीच एक सवाल ऐसा भी है, जो लगातार उलझता ही जा रहा है और जिसका जवाब 2024 के लोकसभा चुनाव पर एक बहुत बड़ा असर डाल सकता है। सवाल ये है कि क्या बसपा सुप्रीमो मायावती और विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' साथ-साथ आएंगे? या फिर मायावती अपने कहे मुताबिक अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेंगी।

bsp chief mayawati

देश के मौजूदा सियासी माहौल को देखें तो मायावती और विपक्षी गठबंधन इंडिया के पास साथ आने के लिए अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरी हैं। इस बात को समझने के लिए बीएसपी की पूरी रणनीति को एक बार जानना होगा। बहुजन समाज पार्टी शायद एकमात्र ऐसी पार्टी है, जो लोकसभा चुनाव से करीब एक साल पहले ही लोकसभा के प्रभारी नियुक्त करती रही है और अगर कुछ सीटों को छोड़ दें तो उस लोकसभा सीट से उम्मीदवार भी उसी सीट के प्रभारी को बनाया जाता था।

गठबंधन की अहमियत को भांप रहीं मायावती
फिर, इस बार ऐसा क्यों है कि लोकसभा का चुनाव जब महज 7 महीने दूर है, और बीएसपी की तरफ से अभी तक एक भी प्रभारी या टिकट का ऐलान नहीं किया गया है। आखिर मायावती की इस खामोशी की वजह क्या है? वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम बताते हैं कि मायावती के पास अपना एक ऐसा पुख्ता वोट बैंक हैं, जो ना केवल उनका वोटर है बल्कि कट्टर समर्थक भी है। यूपी के पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो बीएसपी के खाते में 12.9 फीसदी वोट शेयर गया। लेकिन, बीएसपी के नेता और मायावती का कैडर दबी जुबान में चाहता है कि पार्टी विपक्षी गठबंधन के साथ मिलकर ही चुनाव लड़े। और, मायावती बखूबी इस बात को समझ भी रही हैं। मायावती इस बात को भी समझती हैं कि बिना गठबंधन के उनका वोटर बिना किसी उत्साह के वोट डालेगा।

अखिलेश के लिए क्यों चुनौती है वेस्ट यूपी?
अब, बात करते हैं विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की। फिलहाल यूपी में इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी सपा को 2022 के विधानसभा चुनाव में 32.1 फीसदी वोट शेयर मिला। हाल ही में हुए घोसी उपचुनाव में भाजपा को हराने के बाद अखिलेश यादव यूपी में इस गठबंधन में ड्राइविंग सीट पर हैं। लेकिन, सैयद कासिम बताते हैं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश का जातीय गणित देखें तो शाहजहांपुर के बाद सहारनपुर तक किसी भी लोकसभा में यादव वोट इतना नहीं है कि समाजवादी पार्टी को सीट जिता सके और यहां पार्टी की आस दलितों और मुसलमानों पर टिकी हैं। ऐसे में एक बार फिर विपक्षी गठबंधन की निगाहें मायावती पर आकर ठहरती हैं।

कैसे साथ आएंगे सपा और बसपा?
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद बेहद कड़वाहट के साथ एक दूसरे से अलग हुए सपा-बसपा क्या फिर इस 'गठबंधन के झंडे' के नीचे साथ खड़े हो पाएंगे। लेकिन, इसका जवाब भी मीडिया में आ रही खबरों से मिल रहा है, जिनमें कहा जा रहा है कि विपक्षी गठबंधन में मायावती को शामिल करने की कोशिश खुद गांधी परिवार की तरफ से की जा रही है। सूत्रों की मानें तो मायावती और गांधी परिवार के बीच लगातार बातचीत जारी है और पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद मायावती विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला ले सकती हैं।

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