यूपी विधानसभा चुनाव 2017: समाजवादी पार्टी के इस गढ़ में सेंध के लिए बीजेपी ने चला ये दांव

गुन्नौर विधानसभा सीट बदायूं लोकसभा क्षेत्र में आती है, जहां 1996 के बाद से लगातार समाजवादी पार्टी की जीत होती रही है। अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव इस सीट से सांसद हैं।

बदायूं। उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में कई ऐसे इलाके हैं जहां समाजवादी पार्टी का अच्छा दबदबा देखने को मिलता रहा है। ऐसी ही सीट है संभल जिले की गुन्नौर विधानसभा सीट, जहां इस बार दो प्रतिद्वंद्वी अलग-अलग पार्टियों से आमने-सामने हैं। गुन्नौर विधानसभा सीट पर 1993 के बाद से समाजवादी पार्टी का ही ज्यादातर कब्ज देखा गया लेकिन इस बार भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा दांव चलते हुए सपा के पुराने विरोधी को चुनाव मैदान में उतारा है। केवल दो विधानसभा चुनाव ऐसे रहे जब गुन्नौर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी को जीत नहीं मिली।

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संभल की गुन्नौर सीट का गुणा-गणित, किसका दावा है मजबूत

पहली बार 1996 में जब समाजवादी पार्टी ने अपने सहयोगी जनता दल के उम्मीदवार को इस सीट पर उतारा और दूसरी बार साल 2002 में सपा को इस सीट से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि दूसरी बार ज्यादा दिनों तक ये सीट सपा से दूर नहीं रही और 2004 में मुलायम सिंह यादव ने यहां से रिकॉर्ड 1.9 लाख वोटों से जीत हासिल की थी। गुन्नौर विधानसभा सीट बदायूं लोकसभा क्षेत्र में आती है, जहां 1996 के बाद से लगातार समाजवादी पार्टी की जीत होती रही है। अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव इस सीट से सांसद हैं और 2009 से लगातार दावेदारी कर रहे हैं।

इस बार बीजेपी ने अजीत कुमार को इस सीट से उम्मीदवार बनाया है, उन्हें राजू यादव के नाम से भी जाना जाता है। माना जा रहा है कि वही एक नेता हैं जिन्होंने 24 साल के इतिहास में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को हराया। उस समय अजीत कुमार जेडीयू में थे। 2012 में अजीत कुमार को समाजवादी पार्टी के रामखिलाड़ी सिंह यादव ने हराया था, इस बार भी सपा ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है। रामखिलाड़ी सिंह यादव 1991 में पहली बार गुन्नौर सीट से जीत हासिल की थी। गुन्नौर के लोगों की मानें तो यहां 60 फीसदी यादव हैं। माना जा रहा है कि इस बार यादव मतदाताओं के वोट बंट सकते हैं। बीजेपी को नॉन यादव हिंदू वोट से उम्मीदें हैं। बीएसपी ने मोहम्मद इस्लाम खान को उम्मीदवार बनाया है। यहां बहुत कम मुस्लिम आबादी है जो ज्यादातर समाजवादी पार्टी को वोट देती रही है। हालांकि इस बार संभावना है कि ये किसी और पार्टी या उम्मीदवार को टिकट देने की तैयारी कर सकते हैं।

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