Mulayam Singh Yadav: यादव राजनीति की त्रिमूर्ति- शरद और लालू से बिछड़े मुलायम
Mulayam Singh Yadav: मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और लालू यादव। भारत की यादव राजनीति की त्रिमूर्ति। इस तिकड़ी के सबसे वरिष्ठ सदस्य मुलायम सिंह यादव अब इस दुनिया में नहीं रहे। वे समाजवादी राजनीति के पुरोधा थे। उन्होने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि भारतीय राजनीति में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। भारत की राजनीति जब समाजवादी छतरी की छांव में नयी मंजिलें तय कर रही थी तब मुलायम सिंह, शरद यादव और लालू यादव के लिए मजबूत संबल बने थे। वे पक्ष और विपक्ष, सबके प्रिय नेता थे।


शरद यादव से करीबी
शरद यादव 1974 में जबलपुर लोकसभा उपचुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंचे थे। तब वे एक छात्र नेता थे। 1977 का चुनाव भी शरद यादव ने जबलपुर से ही जीता। लेकिन 1980 को लोकसभा चुनाव वे हार गये। यह संयोग है कि लालू यादव भी 1980 का लोकसभा चुनाव हार गये थे। 1980 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह की भी हार हुई थी। उन्हें कांग्रेस के बलराम सिंह यादव ने हरा दिया था। लेकिन चौधरी चरण सिंह ने उन्हें विधान परिषद में भेज दिया था जिसकी वजह से वे नेता प्रतिपक्ष बने थे। जून1980 में संजय गांधी के असामयिक निधन के कारण अमेठी लोकसभा सीट खाली हो गयी थी। 1981 में यहां उपचुनाव होना था। राजीव गांधी कांग्रेस के उम्मीदवार थे। तब चौधरी चरण सिंह ने शरद यादव को विपक्ष का साझा उम्मीदवार बनाने का एलान किया। लेकिन शरद यादव चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। उन्हें हार की आशंका थी। उस समय मुलायम सिंह यादव विरोधी दल के नेता थे। उन्होंने शरद यादव को हौसला दिया। हालांकि शरद यादव की हार हुई लेकिन इसके बाद वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में जम गये। आखिरकार उत्तर प्रदेश के बदायूं से शरद यादव तीसरी बार लोकसभा में पहुंचे।

लालू यादव के बने थे संबंल
मुलायम सिंह 1967 में पहली बार विधायक बने थे। इस लिहाज से वे शरद यादव और लालू यादव से वरिष्ठ थे। मुख्यमंत्री बनने के मामले में भी मुलायम सिंह, लालू यादव से सीनियर थे। मुलायम सिंह दिसम्बर 1989 में मुख्यमंत्री बने थे जब कि लालू यादव मार्च 1990 में मुख्यमंत्री बने थे। लालू यादव के मुख्यमंत्री बनने में शरद यादव और मुलायम सिंह यादव की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1990 में सरकार बनने से पहले विधायक दल के नेता चुनने पर विवाद हो गया था। लालू यादव के अलावा अनूप लाल यादव, रामसुंदर दास व अन्य नेता मुख्यमंत्री पद की होड़ में थे। तब इस विवाद को सुलझाने के लिए जनता दल के छह पर्यवेक्षक पटना भेजे गये थे। शरद यादव, जॉर्ज फर्नांडीस, अजीत सिंह, मुलायम सिंह यादव, रामपूजन पटेल और चिमनभाई पटेल को पर्यवेक्षक बनाया गया था। 122 विधायकों और पांच विधान पार्षदों को नेता चुनने के लिए मतदान करना था। मतदान कराने के लिए बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता मुलायम सिंह यादव ने की थी। उनके सामने एक बक्सा रखा हुआ था जिसमें विधायक अपनी पसंद के नेता के नाम की पर्ची डाल रहे थे। चूंकि काफी मनाने के बाद भी रघुनाथ झा चुनाव से नहीं हटे थे। इसलिए अजीत सिंह और जॉर्ज फर्नांडीस नाराज हो कर बैठक से बाहर चले गये थे। बक्सा खोला गया। पर्ची की गिनती हुई तो लालू यादव जीत गये। इस तरह वे बिहार के मुख्यमंत्री बने थे।

समाजवादी राजनीति का उदारवादी चेहरा
मुलायम सिंह यादव पर परिवारवाद और जातीय राजनीति का आरोप जरूर लगा। लेकिन उनकी सोच उदारवादी थी। उन्होंने कभी बदले की राजनीति नहीं की। यहां तक कि शरद यादव और लालू यादव ने कई मौकों पर उनका विरोध किया। लेकिन मुलायम सिंह ने कभी इनसे प्रतिशोध लेने की बात नहीं सोची। 1991 के लोकसभा चुनाव में जब शरद यादव बदायूं से हार गये तो उन्होंने इसके लिए मुलायम सिंह यादव को जिम्मेदार ठहरा दिया था। इसके बाद बावजूद उन्होंने शरद यादव से अदावत नहीं पाली। 1996 और 1999 में मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बन सकते थे लेकिन लालू यादव और शरद यादव ने इसका विरोध कर दिया था। मुलायम सिंह दिल से इतने उदार थे कि उन्होंने ये बाते भुला कर लालू यादव के साथ रिश्तेदारी कायम कर ली थी। उन्हें किसी से परहेज नहीं था। उन्होंने 1989 में भाजपा के सहयोग से ही पहली बार सरकार बनायी थी। मंदिर आंदोलन के समय वे भाजपा के कट्टर विरोधी थे लेकिन कभी दुश्मनी नहीं पाली। भाजपा के नेताओं के साथ उनके आत्मीय संबंध थे।

दिमाग से नहीं, दिल से राजनीति की
मुलायम सिंह सच बोलने वाले नेता था। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने स्वीकार किया था कि अक्टूबर 1990 में उनके आदेश से ही कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई थी। इस कबूलनामे से उन्हें राजनीतिक नुकसान हुआ लेकिन उन्होंने सच कहने का साहस दिखाया था। जिस नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विपक्षी दल के नेता भृकुटि ताने रहते हैं उनके लिए मुलायम सिंह की सोच बिल्कुल अलग थी। फरवरी 2019 में 16वीं लोकसभा के अंतिम दिन मुलायम सिंह ने अपने भाषण से सबको हैरत में डाल दिया था। उन्होंने कहा था, प्रधानमंत्री ने सबको साथ लेकर चलने की कोशिश की है। मैं आपको बधाई देता हूं कि आप फिर प्रधानमंत्री बने। मैं जब भी प्रधानमंत्री से मिला उन्होंने दो मिनट के अंदर उस काम को पूरा कर दिया। आज जिस तरह की गलाकाट राजनीतिक स्पर्धा है उस कड़वे माहौल में एक विपक्षी नेता का प्रधानमंत्री के लिए ऐसा कहना, सुखद आश्चर्य है। मुलायम सिंह यादव जैसे नेता ही इतना बड़ा दिल दिखा सकते थे।
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