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Mulayam Singh Yadav: सत्तावादी समाजवाद के कुशल अखाड़ेबाज थे मुलायम सिंह यादव

Mulayam Singh Yadav: साल 2017 की सर्दियां दस्तक दे रही थीं। एक दोपहर को दिल्ली हवाई अड्डे पर कुछ पत्रकार अपनी गाड़ियों का इंतजार कर रहे थे। इतने में एक वीआईपी कॉफिला निकला। अचानक काफिले की मुख्य गाड़ी रूकी। खिड़की के पीछे से एक तुतलाती आवाज निकली, तुम्हें तो नई दिल्ली ही चलना होगा। आओ गाड़ी में बैठो।

यह आवाज थी नेताजी के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव की। जिन पत्रकार के लिए उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी, वे भौंचक्क थे। उन्हें रिपोर्टिंग छोड़े अरसा हो गया था, उन्हें यह अहसास भी नहीं था कि मुलायम सिंह यादव उन्हें जानते होंगे। लेकिन लखनऊ से दिल्ली पहुंचे मुलायम सिंह यादव ने उन्हें पहचान लिया।

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मुलायम सिंह यादव की यही खासियत थी। संघर्ष से निकले थे, आम आदमी से खास बने थे। समाजवाद की घुट्टी ने उनका राजनीतिक पोषण किया था, लिहाजा संघर्ष के साथियों और आम कार्यकर्ताओं को याद रखते थे।

1992 में उनके साथ जनता दल से अलग हुए और समाजवादी पार्टी के महासचिव रहे और अब कांग्रेस के नेता मोहन प्रकाश उनके इस गुण को शिद्दत से याद करते हैं। मोहन प्रकाश उनकी राजनीतिक सफलता का श्रेय उनके इसी गुण को देते हैं।

इटावा जिले के सैफई गांव से निकले मुलायम सिंह यादव के बारे में समाजवादी खेमे के अलंबरदार दावे करते मिल जाएंगे कि डॉक्टर लोहिया उन्हें खुद सोशलिस्ट पार्टी में से लेकर आए थे। लेकिन समाजवाद के पुरोधा जानते हैं कि डॉक्टर लोहिया के सामने जब साठ के दशक का युवा पहलवान बिधूना के राजकीय अतिथि गृह में पेश किया गया था तो उनके साथ युवा समाजवादी बृजभूषण तिवारी भी मौजूद थे।

लोहिया ने तिवारी को तब मुलायम को चवन्निया मेंबरशिप देने का आदेश सुनाया था। तब सोशलिस्ट पार्टी की मेंबरशिप चार आने यानी पच्चीस पैसे में मिलती थी इसलिए चवन्निया सदस्यता कही जाती थी।

मुलायम सिंह यादव राजनीति में आने से पहले पहलवानी भी करते थे। अखाड़े के दांवपेच का असर उनकी राजनीति पर भी हावी रहा। मोहन प्रकाश उन्हें समाजवाद से सत्ता तक के यात्री के रूप में याद करते हैं।

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वे कहते हैं कि अखाड़ेबाजी के दांवपेंच को सत्ता के लिए मुलायम सिंह यादव ने हर बार सफलतापूर्वक साधा। सत्ता को साधने की यह कला ही थी कि वे उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे। पहली बार जहां वे जनता दल-भाजपा गठबंधन के मुख्यमंत्री रहे, वहीं दूसरी बार सत्ता में उनकी सहभागी बहुजन समाज पार्टी रही। तीसरी बार साल 2003 में भारतीय जनता पार्टी के परोक्ष समर्थन से वे मुख्यमंत्री बने।

नेताजी के तौर पर विख्यात मुलायम सिंह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार 1967 में विधायक चुने गए। इसके बाद वे चौधरी चरण सिंह के नजदीक आए। किसानों के लिए वे लगातार संघर्षरत रहे। उनकी संघर्षशील छवि ऐसी बनी कि चरण सिंह के बाद वे एक तरह से पूरे उत्तर प्रदेश के समाजवादियों का चेहरा बन गए। इसका ही असर रहा कि 1990 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए।

हालांकि उस वक्त चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, लेकिन अपने दांव पेंच वे से सत्ता तक अपनी पहुंच बनाने में कामयाब रहे।

यही वह दौर था, जब विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में राममंदिर का आंदोलन चला रखा था। विश्व हिंदू परिषद की अपील पर 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में लाखों की संख्या में कारसेवक पहुंच गए। तब मुलायम सिंह यादव का एक बयान बहुत मशहूर हुआ था। सरकारी प्रसारक दूरदर्शन पर आकर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने कहा था कि अयोध्या की विवादित बाबरी मस्जिद के पास परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

विश्व हिंदू परिषद के रणनीतिकारों ने इसे चुनौती के तौर पर लिया। तीस अक्टूबर को अयोध्या कारसेवकों से पट गई। आंदोलित कारसेवकों को काबू करने के लिए मुलायम सिंह यादव ने पुलिस को गोली चलाने का आदेश दिया। इस घटना ने उनके समाजवादी व्यक्तित्व में गहरी दरार पैदा की। अल्पसंख्यक समुदाय के जहां वे हीरो बन गए, वहीं हिंदू समाज की नजरों में वे मुल्ला मुलायम हो गए।

मुल्ला मुलायम की उनकी छवि ने उनके राजनीतिक कद को बहुत बड़ा बना दिया। इसके बाद राजनीति की दुनिया में उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1996 के आम चुनावों में कांग्रेस और भाजपा विरोधी माहौल था। अयोध्या गोलीकांड के बाद मुलायम सिंह यादव वामपंथी राजनीति के चहेते बन गए थे। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव उनके मेंटर के रूप में उभरे।

1996 के आम चुनावों में जीतकर लोकसभा पहुंचे मुलायम, उन दिनों हरकिशन सिंह सुरजीत की नजरों में प्रधानमंत्री पद के सबसे चहेते उम्मीदवार थे। यह बात और है कि गैर कांग्रेस और गैर बीजेपी दलों में सबसे ज्यादा सीटें जीत चुके जनता दल के तत्कालीन अध्यक्ष शरद यादव ने मुलायम के नाम पर अड़ंगा लगा दिया।

इसके बाद हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा देश के प्रधानमंत्री बने। उनके मंत्रिमंडल में मुलायम रक्षा मंत्री बने। रक्षा मंत्री बनने के बाद उनके व्यक्तित्व पर पहली बार भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। इन्हीं दिनों उनके समाजवादी साथी उनसे अलग होते चले गए। रघु ठाकुर, मोहन प्रकाश आदि ने मुलायम से अलग राह चुनी, हालांकि छोटे लोहिया के रूप में मशहूर जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह और बृजभूषण तिवारी जैसे तपेतपाए समाजवादियों का साथ बना रहा।

रक्षा मंत्री रहते हुए ही उनके नजदीक अमर सिंह पहुंचे और इसके बाद का मुलायम का समाजवाद हाशिए के समाजवाद के रूप में याद रखा जाएगा। तब समाजवादी और ठेठ मुलायम का संग-साथ मुंबइया हीरो-हीरोइनों के साथ बढ़ता गया। इसके बाद पहलवान मुलायम राजनीतिक चुस्कियों के भी केंद्र बने।

मुलायम सिंह यादव को कई कार्यों के लिए याद किया जाएगा। महिला आरक्षण विधेयक की उनके सामने ही लोकसभा में उनके सांसदों ने तत्कालीन विधि मंत्री राम जेठमलानी से छीनकर चिंदी उड़ा दी थी। मुलायम पर लगातार यह भी आरोप लगा कि जब भी उनका शासन आता है, एक खास बिरादरी का मन बढ़ जाता है। अपराधियों के साथ भी सांठगांठ के उन पर आरोप लगे।

1998 के आम चुनावों के बीच उत्तर प्रदेश की कल्याण सरकार को बर्खास्त करके जगदंबिका पाल को रातोंरात शपथ दिलाने के पीछे भी मुलायम का राजनीतिक हाथ देखा गया।

राममंदिर आंदोलन के दौरान मुलायम भारतीय जनता पार्टी के भी निशाने पर रहे, लेकिन जब 1999 में मुलायम ने वाजपेयी सरकार गिरने के बाद कांग्रेस को समर्थन देने से इनकार कर दिया, तब वे भाजपा के भी करीब आ गए। तब मुलायम ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर सवाल उठाते हुए उन्हें समर्थन देने से इनकार कर दिया था।

राजनीति के मैदान पर मुलायम ने सत्ता के लिए चाहे जितने भी दांवपेंच खेले हों, समाजवादी राजनीति को परिवारवाद के केंद्र के रूप में विकसित किया हो, लेकिन वे भारतीय भाषाओं के जबरदस्त हिमायती थे। पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया था। इसी कार्यकाल में उन्होंने राज्यों के बीच आपसी संवाद के लिए हिंदी और भारतीय भाषाओं की हिमायत की थी।

उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपना विशेष मुकाम हासिल करने के बाद मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश को आगे बढ़ाना शुरू किया और धीरे धीरे बेटे का कद बढ़ता गया और मुलायम किनारे होते गए। लेकिन उनका महत्त्व समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए कभी कम नहीं हुआ। अब मुलायम नहीं रहे हैं तो समाजवादी पार्टी के भविष्य की दशा और दिशा पर सबकी नजर रहेगी।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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