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मिशन- 2019 और सहयोगियों की नजरअंदाजगी!

आपको बता दें कि बात सिर्फ 2019 के आम चुनाव की ही नहीं है। उसके पहले गुजरात, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ वगैरह कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।

दिल्ली। वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दल कितने तैयार हैं, इस बारे में अभी कोई आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन सत्ताधारी पार्टी भाजपा के लिए चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। 03 सितम्बर को हुए केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जिस तरह भांति-भांति के चेहरों को शामिल किया गया है और उन्हें अपेक्षा के विपरीत विभाग दिए गए हैं, उससे यही लगता है कि सरकार अभी से वोटरों को साधने की कोशिश में जुट गई है। हां, एक बात जरूर खटक रही है कि जिन सहयोगी दलों को गले लगाने के लिए भाजपा पूरी स्पीड से बढ़ती थी, उन सहयोगियों को इस मंत्रिमंडल विस्तार से अलग क्यों रखा गया। इससे भाजपा नेतृत्व व पीएम मोदी की मंशा पर सवाल खड़ा हो रहा है कि कहीं वे लोग वर्ष 2019 के चुनाव अकेले लड़ने के मूड में तो नहीं हैं। वैसे, सच्चाई क्या है, ये तो उन्हीं लोगों को पता होगा, पर राजनीतिक हलकों में इन बातों को लेकर जबर्दस्त गहमागहमी और चर्चा है। हालांकि अगला आम चुनाव अभी लगभग 20 महीने दूर है लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल का जिस तरह से विस्तार और पुनर्गठन किया गया उससे उससे यह प्रतीत हो रहा है कि भाजपा कहीं पे निशाना, कहीं पे निगाहें की तर्ज पर सियासत कर रही है।

Mission- 2019 and the allies will overlook!

इस मंत्रिमंडलीय विस्तार की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें राजनैतिक समीकरणों और संतुलन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। सहयोगी दलों को संतुष्ट करने की कोशिश भी नहीं की गई है। रणनीति सिर्फ एक है- ऐसी टीम बनाना जो कुछ कर के दिखा सके और जिसके प्रदर्शन को अगली बार जनता के सामने जाते समय सरकार की सफलता के रूप में पेश किया जा सके। पीएम मोदी के तीसरे मंत्रिमंडल विस्तार को भले न्यू इंडिया की टीम कहा जा रहा हो, लेकिन इस समय इसका मुख्य फोकस 2019 का लोक सभा चुनाव ही माना जाएगा। न्यू इंडिया का लक्ष्य 2022 तक पूरा होना है। जब 2019 के चुनावी दौर को पार करेंगे तभी तो न्यू इंडिया का लक्ष्य पाएंगे। कह सकते हैं कि दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि टीम अच्छा प्रदर्शन करेगी यानी न्यू इंडिया के लक्ष्य के लिए काम करेगी तो उसे 2019 में जनता का समर्थन मिलेगा। मोदी ने आगामी चुनौतियों को ध्यान रखते हुए ही नये लोगों को शामिल किया है एवं कुछ पुराने का विभाग बदला है या अतिरिक्त जिम्मेवारियां दी हैं। वास्तव में मोदी मंत्रिमंडल का चेहरा तो नहीं बदला है, क्योंकि ज्यादातर पुराने लोग ही हैं। लेकिन कुछ हद तक इसका चरित्र बदलने की कोशिश अवश्य हुई है।

नौ चेहरों में चार पूर्व नौकरशाहों को शामिल किया गया है। इसमें से दो तो किसी सदन के सदस्य भी नहीं है। इसी तरह प्रोन्नत किए गए चारों मंत्रियों में से पीयूष गोयल को रेलवे और निर्मला सीतारमण को रक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग दिए गए हैं तो धर्मेन्द्र प्रधान को कौशल विकास की अतिरिक्त जिम्मेवारी। नितिन गडकरी को जल संसाधन एवं गंगा मिशन की अतिरिक्त जिम्मेवारी दी गई है। इस तरह मंत्रिमंडल का थोड़ा चरित्र बदल गया है। शायद प्रधानमंत्री को लगा है कि 2019 के 350 सीटों के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मंत्रिमंडल के चरित्र को बदलना जरूरी है। चरित्र का यह बदलाव जिन मंत्रालयों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं हैं, उनमें कार्यसंस्कृति में बेहतर बदलाव के तौर पर भी दिखनी चाहिए। ऐसा नहीं होता तो फिर इस बदलाव का कोई मायने नहीं है। हालांकि यह प्रश्न बना हुआ है कि केवल छह मंत्रियों को ही बाहर क्यों किया गया? इस प्रश्न का एकदम सहमतिकारक उत्तर भी नहीं मिलता। दूसरे, इतनी कवायद के बावजूद मंत्रियों को अतिरिक्त जिम्मेवारी देने की विवशता क्यों कायम रही? इससे ऐसा लगता है कि यह फेरबदल शायद अंतिम न हो। यानी आने वाले समय में छोटा बदलाव और भी हो सकता है। वैसे भी राजग में शामिल हुई जदयू को इसमें जगह नहीं मिली है। हो सकता है कि कुछ दिनों बाद जद (यू) से एक या दो को मंत्रिमंडल में जगह दी जाए। अन्नाद्रमुक अंदरूनी कलह से राजग का भाग बनने से वंचित रह गई है।

आपको बता दें कि बात सिर्फ 2019 के आम चुनाव की ही नहीं है। उसके पहले गुजरात, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ वगैरह कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ये सभी राज्य भारतीय जनता पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हैं और इनमें से चार राज्यों में तो उसकी सरकार ही है। जाहिर है कि उन राज्य सरकारों के अलावा केंद्र सरकार के कामकाज का भी चुनाव नतीजों पर काफी असर पड़ेगा। भाजपा के लिए अच्छी चीज यह है कि विपक्ष केंद्र और इन सभी राज्यों में उसके मुकाबले कुछ कमजोर दिख रहा है। लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार जिस तरीके से किया गया है, वह बताता है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी किसी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। पीएम नरेंद्र मोदी की राजनैतिक दबावों के आगे न झुकने और चौंकाने वाली शैली इस विस्तार और पुनर्गठन में भी दिख रही है। एक चीज स्पष्ट है कि जिन केंद्रीय मंत्रियों का अच्छा प्रदर्शन पिछले काफी समय से चर्चा में था उन्हें पदोन्नति दी गई है या उनके कार्यभार को बढ़ाया गया है।

Mission- 2019 and the allies will overlook!

इसी तरह जिनका रिपोर्ट कार्ड अच्छा नहीं रहा उनसे या तो त्याग-पत्र ले लिया गया है या फिर उनके दायित्व में कटौती की गई। मंत्रियों के अच्छे और बुरे रिपोर्ट कार्ड कभी सार्वजनिक नहीं होते, इसलिए इस बारे में महज अटकल ही लगाई जा सकती है। अच्छे रिपोर्ट कार्ड वालों में निर्मला सीतारमन को न सिर्फ पदोन्नति मिली है बल्कि रक्षा जैसे अहम मंत्रालय का कार्यभार भी दिया गया है। पहली बार किसी महिला को इस मंत्रालय की बागडोर सौंपी गई है। इससे सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति में अब एक साथ दो महिलाओं की मौजूदगी रहेगी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन। प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल में जिन नौ चेहरों को शामिल किया है उनमें से चार नौकरशाह रहे हैं। विस्तार यह भी बताता है कि प्रधानमंत्री के लिए राजनैतिक संतुलन से ज्यादा महत्वपूर्ण है उन्हें आगे लाना जो सरकार की मशीनरी को चलाने की समझ और क्षमता रखते हों।

इस बार नौ नए मंत्री बनाए गए, लेकिन उनमें एक भी भाजपा के सहयोगी दलों से नहीं था। हाल ही में राजद और कांग्रेस से हाथ छुड़ाकर एनडीए के साथ आने वाली जदयू से भी किसी को मंत्री नहीं बनाया गया। शिवसेना की ओर से इस पर तीखी प्रतिक्रिया आई है। उनके प्रवक्ता संजय राउत ने कहा है कि एनडीए अब लगभग मर चुका है। उधर जेडीयू को मंत्री पद न मिलने पर आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव ने चुटकी ली है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि दो नाव पर चलना और टांग फट कर मरना। नीतीश दो नाव की सवारी कर रहे हैं। ये अपनी ही चालाकी में फंस गए। जेडीयू के पास दो सांसद हैं। बीजेपी के 18 सांसद हैं। अभी टीडीपी है, और पार्टियां हैं। दक्षिण से इन्हें एक पार्टी को लेना ही है। एआईएडीएमके का आना लगभग तय है, लेकिन वहीं चूंकि स्थिति अभी बहुत उलझी हुई है और तय नहीं है कि कौन-सा गुट सत्ता में रहेगा। जब तक तमिलनाडु में एआईएडीएमके की आंतरिक समस्याएं नहीं सुलझ जातीं, तब तक वहां से किसी को लिया नहीं जा सकता। तब तक मोदी को शिवसेना और दूसरे सहयोगियों से बात करके फ़ैसला लेना होगा।

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यह माना जा रहा है कि मोदी सरकार का चौथा कैबिनेट विस्तार होगा और वह मुख्यत: सहयोगी दलों पर ही केंद्रित होगा। एनडीए ने अब तक जो दिखाया है कि उन्हें भले ही बहुत ज़रूरत नहीं है, लेकिन उनकी आगे के विस्तार की जो योजनाएं और रणनीतियां हैं, उसके मद्देनज़र उन्हें सहयोगी दलों की ज़रूरत है और वह रहने वाली है। मंत्रिमंडल विस्तार और इसमें फ़ेरबदल पर शिवसेना की तरफ से औपचारिक प्रतिक्रिया भी आ गई। शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने कहा कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। चाहे लोग कहें कि ये राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार है लेकिन ये भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। बहरहाल, देखना है कि सहयोगी दलों के साथ भाजपा किस तरह तालमेल बिठाती है।

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