Profile: जानें कौन हैं वो बैडमिंटन खिलाड़ी जिन्होंने मिटाया 73 साल का सूखा, कैसा रहा थॉमस कप का सफर
नई दिल्ली। थाईलैंड के बैंकॉक में खेले गये थॉमस कप 2022 में भारतीय बैडमिंटन ने बड़ा उलफेटर करते हुए इतिहास रच दिया और 14 बार की चैम्पियन टीम इंडोनेशिया को 3-0 से मात देकर पहला खिताब अपने नाम कर लिया है। 1948-49 में शुरू हुआ यह बैडमिंटन टूर्नामेंट इकलौती ऐसी प्रतियोगिता है जिसमें खिलाड़ी बतौर टीम के रूप में हिस्सा लेते हैं। बैडमिंटन का विश्वकप कहे जाने वाले इस टूर्नामेंट का आयोजन पहले हर 3 साल में किया जाता था लेकिन 1982 में इसमें बदलाव कर इसे हर दो साल के अंतराल पर आयोजित किया जाने लगा है।

इस टूर्नामेंट का आयोजन 3 सिंगल्स और 2 डबल्स के प्रारूप में खेले जाने वाले 5 मैच के सेट के आधार पर किया जाता है, जिसमें देशों को एक टीम के तौर पर जीत हासिल करनी होती है। भारत ने इस टूर्नामेंट में 43 साल पहले सेमीफाइनल में जगह बनाई थी जिसके बाद पहली बार युवा खिलाड़ियों के दम पर उसने इतिहास रच दिया। भारत ने जर्मनी और कनाडा के खिलाफ 5-0 से जीत हासिल कर अपने कैंपेन का आगाज किया था, जिसके बाद उसने चीनी ताइपे की टीम को 3-2 से मात देकर क्वार्टरफाइनल में जगह बनाई।
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जानें कैसा रहा भारत का पूरा कैंपेन
क्वार्टरफाइनल में उसका मुकाबला 5 बार की चैम्पियन मलेशिया से हुआ और उसे भी 3-2 से हराकर उसने सेमीफाइनल में जगह बनाई। वहीं सेमीफाइनल मुकाबले में उसका सामना डेनमार्क से हुआ और वहां भी भारतीय टीम ने 3-2 से जीत हासिल कर पहली बार फाइनल में जगह बनाने का कारनामा किया। फाइनल में भारतीय टीम के सामने 14 बार की चैम्पियन इंडोनेशिया की चुनौती थी लेकिन उसने 3-0 से जीत हासिल कर इस टूर्नामेंट का पहला खिताब जीतने का सपना पूरा किया। भारतीय टीम ने अपने कैंपेन के दौरान इस टूर्नामेंट का खिताब जीत चुकी 5 में से 4 टीमों को मात दी और खुद यह खिताब जीतने वाली छठी टीम बनी।

लक्ष्य सेन ने सिंगल्स में दिया अहम योगदान
भारतीय टीम की बात करें तो उसमें पहला नाम लक्ष्य सेन का है जिन्होंने शुरुआत से ही इस कैंपेन में शानदार प्रदर्शन किया। भारत के लिये बैडमिंटन में लगातार अपना नाम बना रहे इस युवा खिलाड़ी ने जर्मनी के खिलाफ कैंपेन का आगाज करते हुए मैक्स विस्किरचेन को 21-16 और 21-13 से मात दी, वहीं पर कनाडा के खिलाफ ब्रायन यांग ने उन्हें चुनौती जरूर दी लेकिन लक्ष्य ने उन्हें भी 20-22, 21-11, 21-15 की स्कोर लाइन से हरा दिया। लक्ष्य का यह अजेय क्रम चीनी ताइपे के खिलाफ भी जारी रहा और उन्होंने चाउ तिएन चेन को 21-19, 13-21 और 21-17 की स्कोर लाइन से मात दी। क्वार्टरफाइनल में लक्ष्य को अपनी पहली हार का सामना करना पड़ा और उन्हें ली झी जिया ने 21-23, 9-21 से हरा दिया, तो वहीं पर सेमीफाइनल मैच में भी डेनमार्क के विक्टर एक्सलेसन ने 13-21, 13-21 की स्कोरलाइन से मात दी। दो अहम मुकाबलों में हार का सामना करने के बाद लक्ष्य सेन ने फाइनल में जबरदस्त वापसी की और इंडोनेशिया के एंथनी गिनटिंग को 21-8, 17-21, 16-21 को मात देकर जीत की नींव रखी।

डबल्स में सात्विक-चिराग का रहा जलवा
डबल्स में भारत के लिये सात्विक साईराज रेड्डी और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने भी शानदार प्रदर्शन किया और जर्मनी की जोड़ी के खिलाफ 21-15, 10-21, 21-13 की स्कोर लाइन के साथ जीत हासिल की, वहीं पर कनाडाई जोड़ी को 21-12, 21-11 से मात दी। चीनी ताइपे के खिलाफ भी उसने अपना विजय क्रम जारी रखा और 21-11, 21-19 से जीत हासिल की। क्वार्टरफाइनल में उसने मलेशियाई जोड़ी के खिलाफ 21-19, 21-15 से जीत हासिल कर विजयी क्रम को जारी रखा और पहले डेनमार्क के खिलाफ 21-18, 21-23, 22-20 और फिर इंडोनेशिया के खिलाफ 21-18, 21-23, 19-21 से जीत हासिल कर अपने अजेय कैंपेन को खिताब के साथ समाप्त किया।

किदांबी श्रीकांत ने जीता ऐतिहासिक लम्हा
भारतीय टीम का तीसरा मुकाबला सिंगल्स के रूप में खेला गया जिसमें पूर्व वर्ल्ड नंबर 1 खिलाड़ी और वर्ल्ड चैम्पियनशिप में सिल्वर मेडेल जीत चुके किदांबी श्रीकांत खेलते नजर आये। किदांबी श्रीकांत ने बाकी खिलाड़ियों की तरह ही अपने कैंपेन का आगाज जीत के साथ किया और ग्रुप स्टेज में पहले जर्मनी के की स्कफर के खिलाफ 18-21, 21-9, 21-11 से जीत हासिल की तो वहीं पर कनाडा के ब्रायन यंग को 20-22, 21-11, 21-15 से हराया। चीन के वांग जू वी के खिलाफ श्रीकांत को 19-21, 16-21 से पहली हार का सामना करना पड़ा तो वहीं पर मलेशिया के खिलाफ 21-11, 21-17 से जीत हासिल कर वापसी की। सेमीफाइनल में डेनमार्क के एंडर्स एंटोनसेन के खिलाफ किदांबी श्रीकांत ने 21-18, 12-21, 21-15 से जीत की लय को बरकरार रखा।
फाइनल मैच में किदांबी श्रीकांत का सामना इंडोनेशिया के क्रिस्टी जोस्टन से हुआ और इस बेहद रोमांचक मुकाबले में 15-21, 21-23 से जीत हासिल कर भारत के लिये इतिहास रचने का कारनामा किया।

दूसरे डबल्स में भी मिला बेहतरीन साथ
भारतीय टीम को दूसरे डबल्स में शामिल कृष्ण प्रसाद गर्ग और विष्णुवर्धन गौड़ पांजला की जोड़ी ने भी शानदार प्रदर्शन कर टीम को पहला खिताब जीतने में अहम योगदान दिया। भारतीय टीम की इस जोड़ी ने पहले जर्मनी के खिलाफ 25-23, 21-15 की स्कोर लाइन से जीत हासिल की तो वहीं पर कनाडा की टीम के सामने एमआर अर्जुन और ध्रुव कपिला की जोड़ी ने 21-15, 21-11 से जीत हासिल की और चीनी ताइपे के खिलाफ 21-17, 19-21, 21-19 से जीत हासिल कर टीम को आगे बढ़ने में मदद की। क्वार्टरफाइनल में कृष्ण-विष्णु की जोड़ी ने फिर से वापसी की लेकिन उसे 19-21, 17-21 से हार का सामना करना पड़ा तो वहीं पर सेमीफाइनल मैच में भी उसे 14-21, 13-21 से हार मिली। फाइनल में इस जोड़ी को मैदान पर उतरने का ही मौका नहीं मिला क्योंकि भारत ने 3-0 से बढ़त लेकर खिताब अपने नाम कर लिया था।

भारत के संकटमोचक बनें थे एचएस प्रणॉय
आखिरी सिंगल्स मुकाबले में भारत के कैंपेन का आगाज एचएस प्रणॉय ने 21-9, 21-9 की जीत के साथ किया तो वहीं पर प्रियांशु रजावत ने 21-13, 20-22, 21-14 की जीत के साथ इसे आगे बढ़ाया। चीनी ताइपे के खिलाफ एचएस प्रणॉय ने वापसी की लेकिन 18-21, 21-17, 18-21 से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इसके बाद एचएस प्रणॉय ने क्वार्टरफाइनल और सेमीफाइनल मुकाबले में संकटमोचक की भूमिका निभाई और मैच के आखिरी मुकाबले में पहले मलेशिया के खिलाफ 13-21, 21-9, 21-12 से जीत दिलाई तो वहीं पर डेनमार्क के खिलाफ सेमीफाइनल मैच में भी 21-13, 21-8 से जीत हासिल कर टीम को इतिहास रचने का मौका दिलाया।
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