कौन हैं रिटायर्ड जस्टिस राम औतार सिंह, क्या है जाति? UP की पंचायतों में इनकी रिपोर्ट से तय होगा OBC आरक्षण
Who is Retired Justice Ram Autar Singh: उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनावों के लिए राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी आयोग) का गठन किया है। इस आयोग का नेतृत्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राम औतार सिंह करेंगे। इस महत्वपूर्ण कदम का सीधा असर उत्तर प्रदेश के आगामी पंचायत चुनावों पर पड़ेगा।
आयोग का कार्यकाल छह महीने निर्धारित किया गया है, यह आयोग छह माह में अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट देगा। इसी रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण का निर्धारण करेगी।

न्यायमूर्ति राम औतार सिंह को आयोग को जहां अध्यक्ष नियुक्त किया गया है वहीं दो सेवानिवृत्त अपर जिला न्यायाधीश, बृजेश कुमार और संतोष विश्वकर्मा और दो सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी, डॉ. अरविंद चौरसिया और एसपी सिंह, को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
क्यों इन्हें ओबीसी आयोग में किया गया शामिल?
न्यायमूर्ति राम औतार सिंह और दोनों सेवानिवृत्त अपर जिला न्यायाधीश - बृजेश कुमार और संतोष विश्वकर्मा - का पूर्व अनुभव इस क्षेत्र में काफी रहा है। ये तीनों 2022 में नगरीय निकाय चुनावों में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण निर्धारण के लिए गठित ओबीसी आयोग में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। आइए जानते हैं कौन हैं रिटायर्ड जस्टिस राम औतार सिंह और उनकी जाति क्या है?
कौन हैं रिटायर्ड जस्टिस राम औतार सिंह?
ओबीसी आयोग के अध्यक्ष राम औतार सिंह का जन्म बिजनौर में 15 जनवरी 1949 को हुआ था। उन्होंने 1976 में पीसीएस (न्यायिक सेवा) में अपना करियर शुरू किया था। 1991 में उन्हें उच्च न्यायिक सेवा में पदोन्नत किया गया और 2005 में वे जिला न्यायाधीश बने। इसके बाद, उन्होंने 2008 से 2011 तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में तीन वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं। सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राम औतार सिंह उत्तर प्रदेश में ओबीसी आयोग के अध्यक्ष के रूप में पहले भी काम कर चुके हैं।
रिटायर्ड जस्टिस राम औतार सिंह की जाति क्या है?
आयोग में शामिल एसपी सिंह को छोड़कर सभी सदस्य पिछड़े वर्गों से आते हैं। अध्यक्ष राम औतार सिंह जाट समुदाय से संबंध रखते हैं, जबकि संतोष कुमार विश्वकर्मा लोहार समुदाय से हैं। बृजेश कुमार स्वर्णकार समुदाय से हैं और डॉ. अरविंद चौरसिया भी अपने संबंधित समुदायों से आते हैं, जिसकी जानकारी दी गई है।
ओबीसी आयोग के अध्यक्ष राम औतार सिंह ने बताया, "आयोग का कार्यालय जल्द ही स्थापित किया जाएगा, जिसके बाद मैं अपने कर्तव्यों का कार्यभार संभालूंगा। आयोग समाज के सभी वर्गों से बातचीत करेगा और विभिन्न जिलों का दौरा करेगा। इसके बाद ही एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी। आयोग निर्धारित समय सीमा से पहले रिपोर्ट प्रस्तुत करने की पूरी कोशिश करेगा।"
पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन क्यों किया गया है?
इस आयोग की रिपोर्ट और सर्वेक्षण के आधार पर यह तय किया जाएगा कि आपके क्षेत्र में कौन सी पंचायत सीट ओबीसी (महिला या पुरुष) के लिए आरक्षित होगी और कौन सी सामान्य रहेगी। दरअसल, उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि स्थानीय निकायों (जैसे ग्राम पंचायत, जिला पंचायत) में ओबीसी आरक्षण प्रदान करने से पहले राज्यों को 'ट्रिपल टेस्ट' यानी त्रिस्तरीय जांच की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
यह आयोग इस 'ट्रिपल टेस्ट' को पूरा करने के लिए ही गठित किया गया है। आयोग ओबीसी समुदाय के आंकड़े एकत्र करेगा। यदि सरकार आयोग की रिपोर्ट के बिना सीधे आरक्षण लागू कर देती, तो मामला अदालत में फंस सकता था और पंचायत चुनाव रुक सकते थे। आयोग के गठन से अब चुनाव कानूनी रूप से सुरक्षित तरीके से कराए जा सकेंगे।
आयोग के तीन मुख्य कार्य होंगे
आंकड़े जुटाना: आयोग स्थानीय निकायों (ब्लॉक और पंचायत स्तर पर) में पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता की जांच करेगा। इसी आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
50% की सीमा का पालन करना: आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए संयुक्त आरक्षण कुल 50% से अधिक न हो।
आरक्षण अनुपात तय करना: आयोग की सिफारिशों के आधार पर, प्रत्येक स्थानीय निकाय में ओबीसी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित की जाएगी।
कब तक आएगी आयोगी रिपोर्ट?
आयोग की रिपोर्ट नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है, जिसके बाद ही आरक्षण का अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इस समय-सीमा से स्पष्ट हो गया है कि पंचायत चुनाव 2027 के विधानसभा चुनावों के बाद ही संभव हो पाएंगे, जिससे इन चुनावों में एक साल की देरी होगी। उच्च न्यायालय ने 4 फरवरी 2025 को सरकार को आयोग गठित करने का आदेश दिया था।
यूपी पंजायत चुनाव में क्या अटका है अडंगा?
बता दें वर्तमान पंचायत सदस्यों का कार्यकाल इस महीने पूरा हो रहा है। उत्तर प्रदेश में पिछला पंचायत चुनाव 2021 में हुआ था और पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल 25-26 मई 2026 तक पूरा हो रहा है। उत्तर प्रदेश में कुल 58,596 पंचायत संस्थाओं के चुनाव होने हैं, जिनमें 57,695 ग्राम पंचायतें, 826 क्षेत्र पंचायतें और 75 जिला पंचायतें शामिल हैं। इन त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनाव मूलतः मई माह में होने थे, लेकिन अब ये अगले वर्ष ही संभव हो पाएंगे।
आयोग की छह माह में रिपोर्ट मिलने के कारण पंचायत चुनाव अब अगले साल ही हो सकेंगे। इस देरी से चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों के करीब आ सकते हैं, जिसके पश्चात ही पंचायत चुनाव संभव होंगे।
कार्यकाल समाप्त होने पर चुनाव नहीं हुए ताे क्या होता है?
हालांकि, उत्तर प्रदेश में चुनाव की घोषणा से पहले ही यह मामला उच्च न्यायालय पहुंच गया। उच्च न्यायालय ने ओबीसी आयोग के गठन द्वारा नए सिरे से आरक्षण का आदेश दिया। यही कारण है कि इस बार चुनाव एक साल की देरी से होंगे। ऐसी स्थिति में, ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद व्यवस्था को संभालने के लिए पंचायती राज विभाग ने कैबिनेट को एक प्रशासक या प्रशासनिक समिति की नियुक्ति का प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव को कुछ ही दिनों में मंजूरी मिलने की उम्मीद है।













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