Satna News : उचेहरा में बने कांसे के बर्तन बिकने जाते हैं विदेश, इन बर्तनों में खाना खाने से होते हैं ये लाभ
Satna News: जिले का उचेहरा क्षेत्र में सदियों से कांसे एवं पीतल बर्तन निर्माण के लिए प्रख्यात रहा है। यहां पर घर-घर में पहले कांसे एवं पीतल बर्तन बनाने का काम चलता था। यहां बनने वाली थाली पूरे भारत में बेची जाती थी। हालांकि आधुनिकता एवं लागत मूल्य बढ़ने के कारण अब इस उद्योग को ग्रहण लड़ता हुआ नजर आ रहा है।
हालांकि अपने इस पुरातन धंधे को आज भी उचेहरा क्षेत्र के कुछ परिवार जीवित रखे हुए हैं। इन घरों में पीतल व कांसे की थाली बनाई जाती है। पहले जब स्टील नहीं था तब लोग इन्हीं धातुओं की थाली में भोजन करते थे, लेकिन स्टील के चलान में आने के बाद अब इनकी थालियों का उपयोग शादी विवाह के दौरान ही किया जाता है। इस धंधे में सबसे अधिक परेशान वर्तमान में मंहगी हो चुकी धातुओं के कारण आ रही है। क्योंकि इन धातुओं को गलाने के लिए जो भट्टी बनाई जाती थी उसमें काफी लकड़ी की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा अब कच्चा पीतल व कांसा के दाम भी बहुत अधिक हो गए हैं। जिससे उचेहरा के अधिकांश परिवारों ने इस धंधे को छोड़ दिया है।

पीतल के बर्तनों को उपयोग करने से बीमारी का छुटकारा
उचेहरा में निवासरत ताम्रकार परिवार के कई पीढियां इस काम को करती चली आ रही है और आज भी इस काम को बिनी किसी प्रशासनिक मदद से ताम्रकार परिवार के लोग जीवित रखे हुए हैं, इस समाज के घरों में आज भी कांसे के बर्तन बनाने का काम करते हैं, जिसमें फूल और पीतल के घरेलू एवं शादी के शुभ अवसर में उपयोग में आने वाले बर्तनों बनाया जाता है, कास एवं पीतल के बर्तनों को यूज करने से कई बीमारियों से छुटकारा मिलता है।

कांसे के बर्तन बनाने के लिए प्रसिद्ध
सतना जिले में धनतेरस के दिन कांसे के बर्तन का अलग महत्व है, यहां की ऐसी मान्यता है कि पीतल के बर्तन भगवान धनवंतरी को अति प्रिय होते हैं इसलिए धनतेरस में लोग कहां से और पुणे के बर्तन खरीदने का महत्व समझते हैं, महाभारत के अनुसार सूर्य देव द्रोपती को पीतल का अक्षय पात्र वरदान में दिया था जिसका व्याख्यान महाभारत में किया गया है, इसके अलावा पीला रंग भगवान विष्णु को संबोधित करता है। इसलिए पूजा-पाठ व शुभ कार्यों में पीले बर्तन का उपयोग किया जाता है, पीले बर्तन पीतल से बनाए जाते हैं,

क्षेत्र में 600 परिवार कर रहे हैं कार्य
जिले के उचेहरा में आज भी कांसे के बर्तन ताम्रकार परिवार के करीब 6 सौ परिवार इस काम को कर रहे हैं, ताम्रकार समाज की कई पीढ़ियां इस विरासत को आज भी राजवाडों के जमाने से सजोये हुए हैं।
हाथों से करते हैं कारीगरी
आज के आधुनिक जमाने में भी मशीन के बावजूद भी बिना हाथों के यह बर्तन तैयार नहीं होते,पीतल और कासे के बर्तन बनाने वाले कारीगर दिन-रात मेहनत करते हैं तब जाकर कहीं एक बर्तन को तैयार कर पाते हैं।

इन बर्तनों का करते हैं निर्माण
पीतल एवं कासे से बनने वाले बर्तन में मुख्य रूप से पीतल की थाली,बटुई, बटुआ, चम्मच, लोटा, गिलास, हाड़ा, कटोरी ज्यादातर इन बर्तनों का उपयोग विवाह जैसे शुभ कार्य एवं घरेलू उपयोग में किया जाता है, पूर्वजों के समय पहले गांव और आंचलिक इलाके में लोगों के घरों में यही बर्तन पाए जाते थे, लेकिन अब आज के आधुनिक युग में इन बर्तनों का महत्व कम होता जा रहा है, लोग टेक्नोलॉजी के समय में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन पूर्वजों के द्वारा बनाई गई विरासत को भूलते जा रहे हैं,

नाम मात्र के ताम्रकार समाज कर रहे हैं अब निर्माण कार्य
वही इन विरासत को सतना जिले के उचेहरा तहसील में ताम्रकार समाज आज भी सजोए हुए हैं, करीब 600 से अधिक लोग इस काम को करते थे, लेकिन वर्तमान समय में कुछ भी परिवार है जो इस काम को आज भी कर रहे हैं, इसकी मुख्य वजह है कि बिना किसी प्रशासनिक मदद के इस विरासत को जिंदा रखने वाला केवल ताम्रकार समाज ही हैं,

यहां के बर्तन देश के कोने कोने में जाते हैं
यहां के बर्तन प्रदेश के साथ-साथ देश के कोने कोने में जाते हैं, जो अपने आप में 1 अलग-अलग अलख जगाए हुए हैं, धनतेरस के दिन लोग धनवंतरी की पूजा पाठ करते हैं, यही वजह है कि अक्सर लोग धनतेरस में बर्तनों की खरीदारी करते हैं बर्तनों में मुख्य रूप से पीतल और कांसे के 1-1 बर्तन लोग जरूर खरीदते हैं
कांसे के बर्तन के बारे में बात करें तो उचेहरा क्षेत्र के निवासी ताम्रकार परिवार के बर्तन व्यापारी का कहना है कि उचेहरा क्षेत्र के फूल, कासे, पीतल के बर्तन पूरे देश भर में प्रसिद्ध है, यहाँ ताम्रकार परिवार के करीब 6 सौ परिवार इस कार्य को आज भी इस काम को कर रहे हैं।
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