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Ajmer Dargah: कौन थे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती? शिव मंदिर के दावे के बीच जानिए अजमेर शरीफ दरगाह का इतिहास

Who was Khwaja Moinuddin Chishti: यूपी के संभल की राह पर राजस्‍थान का अजमेर है। संभल की जामा मजिस्‍द की जगह मंदिर होने के दावे के बाद सर्वे को लेकर मचे बवाल से संभल चर्चा में है जबकि राजस्‍थान के अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की जगह शिव मंदिर होने को दावे को लेकर कोर्ट में हिंदू सेना चीफ विष्‍णु गुप्‍ता की याचिका स्‍वीकार कर पक्षकारों को नोटिस भेजे हैं।

अजमेर दरगाह को संकट मोचन महादेव मंदिर घोषित, दरगाह का पंजीकरण रद्द करने, ASI सर्वेक्षण करवाने और हिंदुओं को अजमेर दरगाह की जगह पूजा करने का अधिकार दिए जाने की मांग की गई है। अजमेर की सिविल कोर्ट द्वारा स्‍वीकार की गई 38 पेज की याचिका पर अगली सुनवाई 20 दिसंबर को होगी।

यह भी पढ़ें- Ajmer Dargah vs Hindu Sena: अजमेर दरगाह मंदिर विवाद क्‍या है, हिंदू सेना ने किसलिए खटखटाया कोर्ट का दरवाजा?

Who was Khwaja Moinuddin Chishti

यूपी की संभल जामा मजिस्‍द के बाद चर्चा में आई राजस्‍थान के अजमेर की दरगाह का इतिहास व सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के बारे में जानिए।

इतिहासकार डॉ. जाहरुल हसन शाहरिब की किताब 'ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती' के मुताबिक मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म 1135 में ईरान के इस्फ़हान में हुआ था। अजमेर से इस्‍फहान की दूरी 2,320 किलोमीटर है। वे 1149 तक उज्बेकिस्तान के समरकंद और बुखारा पहुँच गए, जहाँ उन्होंने 1155 तक शिक्षा हासिल की थी। चिश्ती संप्रदाय के संत उस्मान हारूनी के साथ, वे बाद में मक्का-मदीना की तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।

अजमेर शरीफ दरगाह का ऐतिहासिक महत्व
अजमेर शरीफ दरगाह मोइनुद्दीन चिश्ती से जुड़ी होने के कारण ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। 1236 में उनके निधन के बाद, अजमेर में एक साधारण मकबरा बनाया गया था। समय के साथ, विभिन्न संरक्षकों ने दरगाह का विस्तार किया। विशेष रूप से, मांडू के महमूद खिलजी ने वहां एक मस्जिद का निर्माण किया। मुगल काल में मोहम्मद बिन तुगलक और शेर शाह सूरी जैसे शासकों के अधीन और भी वृद्धि हुई।

उर्स महोत्सव: भक्ति का उत्सव
हर साल इस्लामी महीने रजब के दौरान, हज़ारों लोग अजमेर शरीफ़ दरगाह पर उर्स के लिए इकट्ठा होते हैं। यह आयोजन मोइनुद्दीन चिश्ती के जीवन और शिक्षाओं की याद में मनाया जाता है। दिल्ली के महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार कारी की दरगाह से एक महत्वपूर्ण जुलूस शुरू होता है। 'कलंदर' के नाम से जाने जाने वाले प्रतिभागी अजमेर पहुँचने के लिए 400 किलोमीटर पैदल चलते हैं।

मोइनुद्दीन चिश्ती का प्रभाव और विरासत
11वीं सदी के अंत में दिल्ली पहुंचने के बाद, मोइनुद्दीन चिश्ती जल्द ही अजमेर चले गए। वहां, उन्हें 'गरीब नवाज़' की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है 'गरीबों का हितैषी'। उनकी ख्याति व्यापक रूप से फैली क्योंकि सभी धर्मों के लोग उनसे मार्गदर्शन और आशीर्वाद मांगते थे। उनकी शिक्षाओं में करुणा और समावेशिता पर जोर दिया गया था।

मोइनुद्दीन चिश्ती को पैगम्बर मोहम्मद साहब का सपना आया था, जिसने उनकी भारत यात्रा में अहम भूमिका निभाई। इस सपने ने उन्हें दिल्ली की यात्रा करने का निर्देश दिया, जो इस क्षेत्र में उनके आध्यात्मिक मिशन की शुरुआत थी। इस दिव्य दर्शन ने उनके मार्ग और उसके बाद भारतीय आध्यात्मिकता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला।

अजमेर शरीफ दरगाह का स्थायी आकर्षण इसके समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक महत्व में निहित है। यह विभिन्न समुदायों के बीच एकता और भक्ति का प्रतीक है। करुणा और समावेशिता की विरासत से आकर्षित होकर विभिन्न पृष्ठभूमि से आगंतुक इस पवित्र स्थल पर आते रहते हैं।

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