TMC Rebel Crisis: ‘सुवेंदु अधिकारी के लिए सम्मान है' TMC में फूट के बीच ऐसा क्यों बोलीं महुआ मोइत्रा
TMC Rebel Crisis 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचे घमासान और इतिहास के सबसे बड़े अस्तित्व के संकट के बीच पार्टी की तेजतर्रार लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) का एक बड़ा बयान सामने आया है।
सुखेंदु शेखर राय और सुष्मिता देव जैसे दिग्गज सांसदों के इस्तीफे और दर्जनों विधायकों की बगावत के बाद, महुआ मोइत्रा ने इस पूरे घटनाक्रम को पार्टी का शुद्धिकरण करार दिया है।

महुआ मोइत्रा ने HT मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में पार्टी छोड़ने वाले नेताओं को 'अवसरवादी' बताते हुए भाजपा के पाले में गए पुराने बागी नेता सुवेंदु अधिकारी की तारीफ कर सबको चौंका दिया है। आइए जानते हैं कि महुआ ने सुवेंदु अधिकारी को लेकर ऐसा क्यों कहा, बागियों पर उनका गुस्सा क्यों फूटा...
सुवेंदु अधिकारी के लिए सम्मान क्यों? महुआ ने खोल दिया राज
जब महुआ मोइत्रा से पूछा गया कि क्या टीएमसी के भीतर उठ रहे इस टूट की वजह अभिषेक बनर्जी का बढ़ता वर्चस्व (परिवारवाद) है? इस पर महुआ ने सीधे तौर पर सुवेंदु अधिकारी का उदाहरण दिया। महुआ मोइत्रा ने कहा-2014 में जब अभिषेक बनर्जी आए, तो उन्हें टिकट मिला क्योंकि वह ममता बनर्जी के भतीजे थे। लेकिन पिछले 12 सालों में उन्होंने तीन बार चुनाव जीता है, पूरे राज्य का दौरा किया है और जमीन पर संगठन खड़ा किया है। मैं भी उनकी जगह बागी हो सकती थी क्योंकि वह मुझसे बहुत छोटे हैं, लेकिन मैंने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के रूप में स्वीकार किया।
लेकिन सुवेंदु अधिकारी ने ऐसा नहीं किया। सुवेंदु ने साफ-साफ कहा था कि-'मैं ममता दी के बाद नंबर दो की कमान संभालना चाहता हूं। जब तक अभिषेक वहां हैं, मुझे वह जगह नहीं मिलेगी, इसलिए मैं अलग रास्ता चुन रहा हूं।' सुवेंदु ने अपनी बात रखी और बीजेपी में चले गए। यह काम करने का एक साफ-सुथरा और पारदर्शी तरीका था। उन्होंने जो कहा, वह करके दिखाया। इसीलिए मेरे मन में सुवेंदु के लिए सम्मान है और उनके साथ मेरे निजी संबंध आज भी अच्छे हैं।
बागियों को महुआ की चुनौती: चुनाव से पहले क्यों नहीं छोड़ी पार्टी?
सुवेंदु अधिकारी की तारीफ करने के बहाने महुआ ने मौजूदा समय में बगावत कर रहे 64 विधायकों और 20 सांसदों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अगर इन लोगों को अभिषेक बनर्जी से इतनी ही दिक्कत थी, तो इन्होंने 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी क्यों नहीं छोड़ी? ये लोग टीएमसी के टिकट पर जीतकर आए और अब ममता बनर्जी की पीठ में छुरा घोंप रहे हैं।
सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर राय को बताया राजनीतिक अवसरवादी
राज्यसभा से इस्तीफा देने वाले टीएमसी के दो बड़े चेहरों-सुखेंदु शेखर राय और सुष्मिता देव के जाने पर भी महुआ मोइत्रा ने बेबाकी से अपनी राय रखी। महुआ ने सुखेंदु शेखर राय को शुद्ध रूप से राजनीतिक अवसरवादी करार दिया। उन्होंने कहा, सुखेंदु कभी दिल से हमारे साथ थे ही नहीं। 2011 में जब हम सत्ता में आए, तब वह प्रणब मुखर्जी के आदमी थे।
जब कांग्रेस उन्हें राज्यसभा नहीं भेज पाई, तो प्रणब दा के कहने पर ममता दी ने उन्हें दो बार राज्यसभा भेजा। अगर उन्हें RG Kar अस्पताल मामले को लेकर इतनी ही तकलीफ थी, तो यह घटना डेढ़ साल पहले हुई थी, उन्होंने तब इस्तीफा क्यों नहीं दिया? तब तो वह कश्मीर में छुट्टियां मना रहे थे। सुष्मिता देव को अपनी सहेली बताते हुए महुआ ने कहा, कांग्रेस छोड़कर हमारे पास आई थीं। ममता दी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। अब वह क्यों गईं, इसका जवाब उन्हें खुद देना होगा।
20 बागी सांसदों के दावे पर महुआ का कानूनी दांव
बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार के उस दावे पर, जिसमें उन्होंने 20 सांसदों के साथ लोकसभा अध्यक्ष से अलग बैठने की व्यवस्था मांगी है, महुआ मोइत्रा ने कानूनी हकीकत सामने रखी। महुआ ने कहा कि दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए केवल विधायी दल का टूटना काफी नहीं है, बल्कि पूरी राजनीतिक पार्टी के दो-तिहाई हिस्से को अलग होना होगा और किसी दूसरी पार्टी (जैसे बीजेपी) में विलय करना होगा।
उनके पास 20 सांसद नहीं हैं। अगर होते, तो वे अब तक हस्ताक्षर के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके होते। और अगर वे अलग बैठ भी जाएं, तो वे खुद को 'काकोली कांग्रेस' कहें या 'शताब्दी कांग्रेस' या 'बीजेपी की बी-टीम', इससे संसद में उन्हें कोई अलग ब्लॉक के रूप में मान्यता नहीं मिलने वाली। वे अलग बैठकर भाजपा को वोट दे सकते हैं, लेकिन वह उनके लोकसभा करियर का अंत होगा।
बंगाल की राजनीति में बढ़ सकती है हलचल
TMC में जारी असंतोष और सांसदों की कथित बगावत ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को नई दिशा दे दी है। हालांकि महुआ मोइत्रा का दावा है कि पार्टी टूट नहीं रही बल्कि मजबूत हो रही है, लेकिन आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि बागी नेताओं का अगला कदम क्या होता है और इसका ममता बनर्जी की राजनीति पर कितना असर पड़ता है।














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