Aravalli Hills Controversy: राजस्थान के किन जिलों से होकर गुजरती है अरावली? क्यों दहशत में हैं 8 करोड़ लोग?
Aravalli Hills Controversy: हजारों वर्षों से भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में एक अडिग प्रहरी की तरह खड़ी अरावली पर्वतमाला आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। यह पर्वत श्रृंखला हिमालय से भी पुरानी है। ये कभी घने जंगलों, बहती नदियों और विविध वन्यजीवों का बसेरा हुआ करती थी। आज यह 'पत्थरों के ढेर' में तब्दील होने की कगार पर है। हाल ही में अरावली की 'नई वैज्ञानिक परिभाषा' को लेकर शुरू हुए विवाद ने न केवल पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है, बल्कि राजस्थान से लेकर दिल्ली-NCR तक की 8 करोड़ की आबादी के मन में एक अनजाना खौफ पैदा कर दिया है।
यह विवाद केवल पहाड़ों की ऊंचाई नापने का नहीं है, बल्कि उस जीवनरेखा को बचाने का है। यह थार के रेगिस्तान को दिल्ली के दरवाजे तक पहुंचने से रोकती है। सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर खड़ा यह मुद्दा अब एक 'इकोलॉजिकल इमरजेंसी' (पारिस्थितिक आपातकाल) बन चुका है। अगर अरावली की इन छोटी दिखने वाली पहाड़ियों को 'पहाड़' की श्रेणी से बाहर कर दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को विरासत में केवल धूल भरी आंधियां और प्यासी धरती ही मिलेगी!

राजस्थान के इन क्षेत्रों से होकर गुजरती है अरावली की 'सुरक्षा दीवार'
अरावली केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह थार मरुस्थल को रोकने वाली एक प्राकृतिक दीवार है। राजस्थान के पुनर्गठन के बाद, यह पर्वतमाला मुख्य रूप से इन क्षेत्रों को कवर करती है:
- प्रमुख केंद्र: उदयपुर (झीलों की नगरी), अजमेर, जयपुर और अलवर।
- उत्तरी बेल्ट: नीम का थाना, सीकर, झुंझुनूं और खैरथल-तिजारा।
- दक्षिणी बेल्ट: सिरोही (माउंट आबू), राजसमंद, सलूंबर और डूंगरपुर।
- मध्य बेल्ट: ब्यावर और दूदू।
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'100 मीटर का फॉर्मूला' क्यों बना विवाद का कारण?
विवाद की जड़ में केंद्र सरकार द्वारा दी गई अरावली की नई परिभाषा है। इसके तहत:
- केवल उन पहाड़ियों को 'अरावली' का हिस्सा माना जाएगा जिनकी ऊंचाई तलहटी से 100 मीटर से अधिक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली की अधिकांश पहाड़ियां सदियों के क्षरण (Erosion) के कारण अब 100 मीटर से कम ऊंची रह गई हैं। यदि इन छोटी पहाड़ियों को 'अरावली' की श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है, तो भू-माफिया और खनन कंपनियां इन्हें कानूनी रूप से समतल कर सकेंगी।
क्यों दहशत में हैं 8 करोड़ लोग?
अरावली का विनाश केवल राजस्थान के लिए नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए एक 'इकोलॉजिकल टाइम बम' की तरह है:
(i) रेगिस्तान का विस्तार (Desertification)
अरावली थार मरुस्थल की धूल भरी आंधियों को दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने से रोकती है। पहाड़ियां गायब होने का मतलब है कि उपजाऊ मैदानी इलाके भी जल्द ही रेगिस्तान बन जाएंगे।
(ii) भीषण जल संकट
अरावली की पहाड़ियां "एक्विफर" (Aquifer) के रूप में काम करती हैं, जो बारिश के पानी को जमीन के नीचे भेजती हैं। इनके खत्म होने से जयपुर और दिल्ली-NCR का Groundwater Level तेजी से नीचे गिरेगा।
(iii) प्रदूषण की मार
अरावली दिल्ली-NCR के लिए 'ग्रीन लंग्स' का काम करती है। यदि ये पहाड़ियां नहीं रहीं, तो सर्दियों में स्मॉग और प्रदूषण का स्तर वर्तमान से कई गुना अधिक घातक हो जाएगा।
(iv) वन्यजीवों का पलायन
सरिस्का और रणथंभौर जैसे टाइगर रिजर्व के बीच अरावली एक कॉरिडोर प्रदान करती है। खनन के कारण इनका रास्ता रुकने से मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) बढ़ जाएगा।
(v) सुप्रीम कोर्ट का रुख और वर्तमान स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक राज्य सरकारें सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान (MPSM) नहीं बना लेतीं, तब तक अरावली क्षेत्र में किसी भी नए खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया है, लेकिन 100 मीटर की परिभाषा पर अभी भी तकनीकी पेंच फंसा हुआ है।
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