Aravalli Mining Dispute: अरावली खत्म होने वाली है? बवाल के बीच पर्यावरण मंत्री ने बताया क्या है सरकार का प्लान
Aravalli Mining Dispute: अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और माइनिंग को लेकर मचे घमासान के बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सरकार का रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने अरावली की नई परिभाषा और माइनिंग के दावों को लेकर फैल रहे भ्रम को खारिज करते हुए कहा कि पर्वत शृंखला का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आज भी पूरी तरह सुरक्षित है।
मंत्री ने साफ किया कि 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में से मात्र 0.19% हिस्से में ही खनन की अनुमति है। सरकार का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब पर्यावरणविद और विपक्षी नेता नई परिभाषा के कारण अरावली के अस्तित्व पर खतरा बता रहे हैं।

भूपेंद्र यादव ने क्या कहा?
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के अनुसार, अरावली को लेकर सोशल मीडिया और कुछ यूट्यूबरों द्वारा फैलाया जा रहा डर निराधार है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि अरावली का कुल क्षेत्रफल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से केवल 217 किलोमीटर क्षेत्र में ही माइनिंग की इजाजत दी गई है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि पहाड़ियों को नापने का पैमाना जमीन से चोटी तक की समग्र ऊंचाई पर आधारित है, और सरकार 'ग्रीन अरावली मिशन' के जरिए इसके संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।
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100 मीटर की नई परिभाषा पर विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ अरावली की नई परिभाषा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है। नए नियम के तहत अब केवल उन्हीं भू-आकृतियों को 'अरावली पहाड़ी' माना जाएगा जिनकी ऊंचाई धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक है। विशेषज्ञों और प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि इस मानक से अरावली का एक बड़ा हिस्सा कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा। इससे उन छोटी पहाड़ियों पर खनन और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स शुरू होने का रास्ता साफ हो सकता है, जो अब तक संरक्षित थीं।
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सुप्रीम कोर्ट का रुख और भविष्य की योजना
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की नई परिभाषा को तो मान लिया है, लेकिन दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में नई माइनिंग लीज पर फिलहाल अंतरिम रोक लगा दी है। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक 'सतत खनन प्रबंधन योजना' (MPSM) तैयार नहीं हो जाती। सरकार का कहना है कि भविष्य में केवल राष्ट्रीय हित और रणनीतिक महत्व के खनिजों के लिए ही सीमित छूट दी जाएगी। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस संवेदनशील मामले में अदालत को पूरा सहयोग प्रदान करेगा।
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विपक्ष का प्रहार: 'अरावली बचेगी तो ही NCR बचेगा'
सपा प्रमुख अखिलेश यादव सहित कई विपक्षी नेताओं और पर्यावरणविदों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। अखिलेश यादव ने चेतावनी दी है कि अरावली सिर्फ एक पहाड़ नहीं, बल्कि दिल्ली-NCR की लाइफलाइन है। यह पर्वतमाला रेगिस्तान को बढ़ने से रोकती है और प्रदूषण कम करने में सहायक है। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि ऊंचाई आधारित परिभाषा अरावली के पारिस्थितिक तंत्र को कमजोर कर देगी, जिससे आने वाले समय में बारिश और जल स्तर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
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