पंजाब: राज्यपाल के फैसले पर राघव चड्ढा ने उठाए सवाल, नेटफ्लिक्स के शो का किया जिक्र

नई दिल्ली, 24 सितंबर: दिल्ली की तरह पंजाब में भी सरकार और राज्यपाल के बीच गतिरोध शुरू हो गया है। ये गतिरोध तब और बढ़ गया, जब राज्यपाल ने 27 सितंबर को AAP सरकार द्वारा बुलाए गए सत्र के विधायी कार्य के एजेंडे का विवरण मांगा। इस पर सीएम भगवंत मान ने पलटवार करते हुए कहा कि विधायिका के किसी भी सत्र से पहले राज्यपाल की सहमति एक औपचारिकता है। 75 वर्षों में किसी भी राज्यपाल ने सत्र बुलाने से पहले कभी भी विधायी कार्यों की सूची नहीं मांगी। विधायी कार्य बीएसी और स्पीकर द्वारा तय किया जाता है। आगे वो सभी भाषणों को भी उनके द्वारा अनुमोदित होने के लिए कहेंगे। ये बहुत ज्यादा हो रहा। अब इस मुद्दे पर AAP सांसद राघव चड्ढा का बयान सामने आया है।

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चड्ढा ने गवर्नर ऑफिस से जारी पत्र को ट्वीट कर लिखा कि चाहे चर्चा हो महंगाई पर या "Fabulous Lives of Bollywood Wives" पर - विधानसभा का Legislative Business तय करने का अधिकार सिर्फ स्पीकर और बिजनेस एडवाइजरी कमेटी को है, ना की गवर्नर को। गवर्नर साहब हर दिन अपने प्रतिष्ठित पद की गरिमा गिरा रहे हैं। आपको बता दें कि "Fabulous Lives of Bollywood Wives" ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स का एक शो है, जिसमें बॉलीवुड स्टार्स की पत्नियों के शानदार जीवन के बारे में बताया गया है।

कई दिनों से राज्यपाल निशाने पर
दरअसल आम आदमी पार्टी की सरकार ने विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया था, जिसे राज्यपाल ने अनुमति दे दी थी, लेकिन बाद में वो पलट गए। इस पर चड्ढा ने कहा था कि राज्यपाल का ये फैसला असंवैधानिक है, वो अपने ही फैसले से पलट नहीं सकते हैं, यह संविधान के खिलाफ है। भारत का संविधान और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले कहते हैं कि राज्यपाल मंत्रिमंडल के फैसले से बाध्य हैं, वह पोस्टमास्टर का काम करते हैं। वह अपना विवेक लगाकर इसे पलट नहीं सकते हैं। राघव चड्ढा ने कहा कि राज्यपाल ने जो रोक लगाई है, वह गैर संवैधानिक है। सदन बुलाने का अधिकार सरकार का नहीं होता तो राज्यपाल क्यों इसकी अनुमति देते। वर्ष 1951 में भी उस समय के मुख्यमंत्री विश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे। तमिलनाडु में भी सी राजागोपलाचारी भी 1952 में विश्वास प्रस्ताव ला चुके हैं। राज्यपाल सिर्फ नाममात्र के शीर्ष होते हैं. वह सरकार के मंत्रिमंडल द्वारा पास किए गए फैसलों से बाध्य होते हैं। अपना विवेक लगाकर राज्यपाल कैबिनेट के फैसले को रोक नहीं सकते हैं।

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