पंजाब: क्या ईसाई मतदाताओं के सहारे सिद्धू पार लगाना चाहते हैं अपनी नैया, जानिए क्यों दिया ये बयान ?

पंजाब कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मदीवार की घोषणा होने के बाद से पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू बयानबाज़ी से दूर नज़र आ रहे थे।

चंडीगढ़, 11 फरवरी 2022। पंजाब कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मदीवार की घोषणा होने के बाद से पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू बयानबाज़ी से दूर नज़र आ रहे थे। कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा के बाद नवजोत सिंह सिद्धू की बयानबाज़ी से सियासी पारा चढ़ गया है। गुरुवार को चुनाव प्रचार के दौरान नवजोत सिंह सिद्ध ने कहा सभी धार्मिक स्थलों पर गया हूं। मैं यक़ीन दिलाता हूं की मेरे ज़िंदा रहने तक कोई भी ईसाई धर्म पर बुरी नजर नहीं डाल सकता है। सिद्धू के इस बयान के बाद सियासी सरगर्मियां बढ़ गईं हैं, कई तरह के क़यास लगाए जा रहे हैं। सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि क्या नवजोत सिंह सिद्धू ईसाई मतदाताओं के ज़रिए अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं।

ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश

ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश

पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने इसस पहले कभी भी ईसाई समुदाय को लेकर बयानबाज़ी नहीं की थी लेकिन चुनाव से ठीक पहले इस बयान के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सिद्धू ने आखिर क्यों ये बयान दिया है इसके पीछे की वजह क्या है ? सियासी जानाकारों की मानें तो नवजोत सिंह सिद्धू के ललकारने के बाद बिक्रम सिंह मजीठिया उनके विधानसभा हलका अमृतसर ईस्ट से चुनाव लड़ रहे हैं। मजीठिया की पूरी कोशिश है कि वह नवजोत सिंह सिद्धू को उनके ही गढ़ में मात दें। इसलिए सियासी समीकरण को देखते हुए नवजोत सिंह सिद्धू ने ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश की है। चुनाव में जाती समीकरण बहुत मायने रखता है लेकिन ईसाई समुदाय कहीं भी विनिंग फ़ैक्टर के तौर पर नहीं गिने जाते हैं। लेकिन पंजाब की सियासत में ये अहम भूमिका निभाते हैं। ईसाई समुदाय अहम भूमिका में यह सुनने में अजीब ज़रूर लग रहा है लेकिन हक़ीकत यही है।

तीन वर्गों में बंटे हुए हैं ईसाई समुदाय

तीन वर्गों में बंटे हुए हैं ईसाई समुदाय

पंजाब के सियासी समीकरण की बात की जाए तो पंजाब में में तीन वर्गों में ईसाई समुदाय को गिना जाता है। एक वर्ग तो वह है जिनके पूर्वजों ने ब्रिटिश शासन के दौरान ईसाई धर्म अपना लिया था। दूसरे वर्ग में वह लोगा आते हैं जो ग़रीब और अशिक्षित हैं और उनपर डेरा का प्रभाव ज्यादा हैं। वहीं तीसरे वर्ग में सबसे बड़े समूह में दलित हैं जो ईसाई धर्म को मानते हैं। ग़ौरतलब है कि यह सभी वर्ग इसाई धर्म को निभाते हैं लेकिन आधिकारिक तौर से उन्होंने सरकारी दस्तावेज़ों में धर्मांतरण नहीं किया है। पंजाब की सियासत में सभी नेताओं और सियासी दलों की निगाहें इन पर रहती हैं क्योंकि इन प्रभाव में बने बनाए समीकरण की भी बाज़ी पलट जाती है। ऐसे में सिद्धू ने ईसाई मतदाताओं को लुभाने के लिए अपने बयान के ज़रिए मास्टर स्ट्रोक लगाने की कोशिश की है।

आरक्षण से वंचित रह जाने का डर

आरक्षण से वंचित रह जाने का डर

ईसाई समुदाय के 98 फीसदी मतदाताओं को दलित बैकग्राउंड है, उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है लेकिन इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है आरक्षण है। क्योंकि अगर वह दस्तावेज़ों पर धर्मांतरण करवा लेंगे तो आरक्षण से वंचित रह जाएंगे। वहीं जानकार बताते हैं कि ईसाई होने के बाद दलित का तमग़ क्यों नहीं हटता है इसके पीछे दूसरी वजह यह भी है कि सिख और ईसाई किसी भी धर्म से क्यों ना लेकिन जाती पुरानी ही रहती है। आरक्षण खोने की वजह से भी इस समुदाय के लोग ईसाई के तौर पर रजिस्टर करवाने से कतराते हैं।


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