किसानों की घर वापसी के बाद पंजाब में कैसे बदलेंगे सियासी समीकरण, जानिए किसे होगा नुकसान
पंजाब के चुनावी रण में अब किसान संगठन भी उतरने की तैयारी कर रहे हैं। कृषि कानून रद्द होने के बाद भारतीय जनता पार्टी इसका सियासी फ़ायदा लेने की कोशिश कर रही है।
चंडीगढ़ 9 दिसम्बर 2021। एक साल मशक्कत करने के बाद अब सरकार और किसान मोर्चा के बीच सहमति बन गई है। घर वापसी के बाद पंजाब के चुनावी रण में अब किसान संगठन भी उतर सकते हैं। कृषि कानून रद्द होने के बाद भारतीय जनता पार्टी इसका सियासी फ़ायदा लेने की कोशिश कर रही है। वहीं अन्य सियासी पार्टियां भी कृषि कानूनों की वापसी पर सियासी माइलेज लेने की रणनीति तैयार करने में जुटी हुई है। ग़ौरतलब है कि कुछ किसान संगठन भी पंजाब विधानसभा चुनाव में ताल ठोकने की तैयारी कर रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि जिस तरह से सियासी पार्टियां किसान आंदोलन को मुद्दा बनाकर वोट बैंक में सेधमारी करती। लेकिन अब ख़ुद किसान संगठन ही चुनावी रण में उतरने की तैयारी कर रहे हैं तो फिर सियासी दलों के पास किसानों का मुद्दा लेकर वोट मांगने का कोई मतलब ही नहीं बनता।

पंजाब के बिगड़ सकते हैं सियासी समीकरण
पंजाब में अगर किसान संगठन चुनाव लड़ते हैं तो कहीं न कहीं सभी सियासी दलों की बनी बनाई रणनीति पर पानी फिर जाएगा। आइए जानते हैं कि किसानों के घरर वापसी के बाद पंजाब में किस तरह के सियासी समीकरण बनने के आसार दिख रहे हैं। तीनों कृषि कानूनों की वापसी और लंबित मांगों पर सरकार के प्रस्ताव के बाद अब संयुक्त किसान मोर्चा ने किसान आंदोलन को स्थगित करने का फ़ैसला लिया है। किसान मोर्चा का कहना है कि आंदोलन को अभी खत्म नहीं स्थगित किया गया है। 15 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की समीक्षा बैठक होगी। अगर सरकार की तरफ़ से सक्रात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर दोबारा से आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया जा सकता है।

सियासी ज़मीन तलाश रही BJP
कृषि कानूनों के खिलाफ सालभर के क़रीब आंदोलन के बाद अब किसान मोर्चा और सरकार के बीच मांगों को लेकर सहमति बन गई है। सहमति बनने के बाद किसान अब दिल्ली बॉर्डर से हटने लगे हैं। पंजाब में किसान आंदोलन की वजह से भारतीय जनता पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है। कृषि कानूनों की वापसी के बाद भाजपा पंजाब में सियासी ज़मीन तलाशने में जुट गई है। किसान आंदोलन के दौरान बीते एक साल में खिसके जनाधार को फिर से जोड़ने के लिए भारतीय जनता पार्टी को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।

टकसाली नेताओं को BJP दे रही तरजीह
पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल से अलग हुए वरिष्ठ टकसाली नेताओं के साथ भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में चुनावी गठबंधन की कवायद भी शुरू कर दी है। इधर बीजेपी आलाकमान कैप्टन अमरिंदर सिंह से ज्यादा अकाली नेताओं को तरजीह दे रही है। क्योंकि गांवों में अकाली दल की पकड़ अच्छी है। जब भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन था तो बीजेपी को ग्रामीण मतदाताओं का भी समर्थन मिल जाता था। अभी भाजपा की पकड़ शहरी क्षेत्रों में हो इसलिए भाजपा अभी कैप्टन से ज्यादा अकाली दल से आए नेताओं को तरजीह दे रही है।

किसान संगठन लड़ सकते हैं चुनाव
पंजाब विधानसभा चुनाव में कुछ किसान नेता विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए मोर्चा बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इससे पहले किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी अपनी सियासी पार्टी बनाकर चुनावी रण में उतरने की बात कर रहे हैं। वहीं जम्हूरी किसान सभा के नेता कुलवंत सिंह संधू भी पंजाब विधानसभा चुनाव में स्वतंत्र रूप से मोर्चा बनाते हुए किसानों को चुनाव के मौदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं। गुरनाम सिंह चढूनी के बाद किसान नेता कुलवंत सिंह संधू चुनावी रण में दांव लगाने के लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो बिना किसी सियासी दलों के साथ गठबंधन करते हुए भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए किसान नेता चुनाव लड़ेंगे।
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