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पंजाब में किसान कर रहे सियासत या हो रहे राजनीति का शिकार, पढ़िए इनसाइड स्टोरी,

पिछले नौ महीने से दिल्ली बॉर्डर पर बैठे किसानों ने पंजाब के सियासी समीकरण को प्रभावित कर दिया है। या फिर ऐसा भी कहा जा सकता है कि पंजाब की सियासत में किसान जत्थेबंदियां हावी हो गई हैं।

चंडीगढ़, सितंबर 13 2021। पिछले नौ महीने से दिल्ली बॉर्डर पर बैठे किसानों ने पंजाब के सियासी समीकरण को प्रभावित कर दिया है। या फिर ऐसा भी कहा जा सकता है कि पंजाब की सियासत में किसान जत्थेबंदियां हावी हो गई हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में किसानी मुद्दे ही ज़्यादातर पार्टी नेताओं के ज़ुबानों पर हैं। वहीं दूसरी तरफ़ सियासी पार्टियों की वजह से ज़मीनी स्तर पर गांवों में किसानों में गुटबाज़ी होने लगी है।

Punjab farmers

किसान यूनियन ने सुनाया फ़रमान
चंडीगढ़ में जिस तरह किसान संगठनों ने कचहरी लगाकर तमाम सियासी पार्टी के दिग्गजों को अपना फरमान सुनाया इससे तो यह बात साफ़ हो गई है कि पंजाब में किसान यूनियन सियासत पर पूरी तरह से हावी है। ग़ौरतलब है कि पंजाब के गांवों में कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का ख़ासा जनाधार है। 117 विधानसभा सीटों में 89 सीटें ऐसी हैं, जहां किसानों की भूमिका अहम है। वहीं 28 सीटें ऐसी हैं जहां किसानों का कोई प्रभाव नहीं है। इन 28 सीटों समेत 45 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह से फोकस कर रही है। जबकि अन्य राजनीतिक दलों की नजर 89 सीटों पर हैं।

खेती से जुड़े हुए हैं कई फीसद लोग
कई विधानसभा सीटों पर जहां कांग्रेस का खासा जनाधार है, वहीं अकाली दल औऱ आम आदमी पार्टी भी पीछे नहीं है। पंजाब के गांवों में एससी वर्ग की आबादी भी अच्छी खासी है और बहुजन समाज पार्टी भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहती है। खासकर दोआबा के ग्रामीण इलाकों में बहुजन समाज पार्टी का खासा वोट बैंक है और यह वोट किसानों के आंदोलन के साथ ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। यही नहीं पंजाब में 75% लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर खेती से जुड़े हैं। प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोगों में किसान, खेतों में काम करने वाले मजदूर, फसल खरीदने वाले आढ़ती और खाद-कीटनाशक के व्यापारी शामिल हैं।

खेती के ज़रिए एक-दूसरे जुड़े किसान
सभी लोग खेती के जरिये एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। वहीं इनके साथ ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री भी जुड़ी हुई है। आढ़तियों से फसल ख़रीदकर आगे सप्लाई करने वाले ट्रेडर्स और एजेंसियां भी खेती से ही जुड़ी हुई हैं। इसके जरिये कई छोटे कारोबार भी चलते रहते हैं। पंजाब में खेतीबाड़ी की जमीन 7.442 मिलियन हेक्टेयर है। जिसका मालिकाना हक 10.93 लाख लोगों के पास है। इनमें 2.04 लाख (18.7%) छोटे और सीमांत किसान हैं। 1.83 लाख (16.7%) छोटे किसान हैं, जबकि 7.06 लाख (64.6%) किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन है।

किसानों पर टिकी सियासी दलों की निगाहें
पंजाब की तमाम सियासी दलों के नेताओं की निगाह इन्हीं किसानों पर है। कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के चक्कर में गांवों में ऐसे हालात हो गए कि किसान आपस में ही बंटने शुरू हो गए हैं। किसान नेता मिर्मल सिंह सिद्धू का कहना है कि पंजाब के 75 फीसदी लोगों का मुद्दा खेती है। सभी किसानों का मिशन है इन तीन कृषि कानूनों को वापस करवाना है। चुनावों की वजह से हो रही रैलियों से हमारे बीच किसानी भाईचारा बंट रहा है। गांवों में सियासत शुरू हो गई है। किसानों का मुद्दा कमज़ोर पड़ रहा है।

ये भी पढ़ें: किसान दिल्ली में ही रखें अपना विरोध प्रदर्शन, पंजाब को ना करें तंग: अमरिंदर सिंह

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