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बिहार: सन ऑफ मल्लाह का सियासी भविष्य ख़तरे में, क्या मुकेश सहनी करेंगे सियासत से किनारा ?

बिहार की सियासत में ऐसा उलटफेर देखने को मिला कि मुकेश सहनी की सियासी नांव डूबने की कगार पर आ गई है।

पटना, 24 मार्च 2022। बिहार की सियासत में ऐसा उलटफेर देखने को मिला कि मुकेश सहनी की सियासी नांव डूबने की कगार पर आ गई है। विकासशील इंसान पार्टी के सुप्रीमो का सियासी भविष्य दांव पर लग गया है। सियासी गलियारों में तो यह तक चर्चा हो रही है कि मुकेश सहनी का राजनीतिक भविष्य ख़त्म हो चुका है। उनके पास बस एख ही रास्ता बचा है कि वह किसी अन्य दल के बैनर पर अपनी सियासी सफर को जारी रखे या फिर सियासत से किनारा कर लें। मुकेश सहनी का 21 जुलाई के बाद मंत्री बना रहना भी मुश्किल हो सकता है। फिलहाल वह मंत्री पद छोड़ेंगे यह अपने टर्म को 21 या फिर टर्म खत्म होने का इंतजार करेंगे इस पर संशय बरक़रार है।

बोंचहा सीट पर प्रत्याशी को लेकर तकरार

बोंचहा सीट पर प्रत्याशी को लेकर तकरार

विकासशील इंसान पार्टी के सुप्रीमो मुकेश सहनी के पार्टी के तीनों विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाएंगे यह किसी ने भी नहीं सोंचा था। लेकिन तीनों पार्टी के भाजपा में शामिल होने से मुकेश सहनी को तगड़ा झटका लगा है। आपको बता दें कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सहनी ने 11 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जिनमें से सिर्फ़ चार प्रत्याशियों को कामयाबी मिल पाई थी। विकासशील इंसान पार्टी के एक विधायक मुसाफिर पासवान की मौत के बाद वीआईपी के पास तीन विधायक (राजू सिंह, मिश्रीलाल यादव और स्वर्णा सिंह), जो कि अब भाजपा का हिस्सा बन चुके हैं। बोंचहा विधानसभा सीट पर उपचुनाव में अपने उम्मीदवार को उतारना मुकेश सहनी के लिए ताबूत में आखरी कील ठोकना साबित हो गया।

भाजपा का बिहार में मास्टर स्ट्रोक

भाजपा का बिहार में मास्टर स्ट्रोक

भारतीय जनता पार्टी मुकेश सहनी को पहले ही किनारा करना चाह रही थी। उन्होंने बोंचहा विधानसभा सीट पर उम्मीदवार उतारने के बाद भाजपा को मौक़ा भी दे दिया। एनडीए गठबंधन में मुकेश सहनी की वजह से फूट पड़नी शुरू हो गई थी। इसलिए भाजपा ने बिहार में कुर्सी बचाने के लिए मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए वीआईपी के तीनों विधायकों को ही अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। ग़ौरतलब है कि मुकेश सहनी खुद विधान परिषद के सदस्य बने और नीतीश सरकार में उन्हें पशुपालन विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन उन्होंने ज़्यादा की चाह में अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली। अब उनके मंत्री पद पर ख़तरा बादल मंडरा रहे हैं।

सहनी ने 3 साल पहले बनाई थी पार्टी

सहनी ने 3 साल पहले बनाई थी पार्टी

मुकेश सहनी ने तीन साल पहले अपनी सियासी पार्टी वीआईपी की नींव रखी थी। पहली बार बिहार विधानसभा के चुनाव में उन्हें चार सीटों पर कामयाबी मिली थी। इस पर भी उन्हें संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने पार्टी के विस्तार की चक्कर में उत्तर प्रदेश में 53 सीटों पर भाजपा के ख़िलाफ़ ही चुनावी मैदान में उम्मीदवार उतार दिए। भाजपा से पंगा लेने के बावजूद सहनी को यूपी में एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली। ग़ौरतलब है कि उन्होंने यूपी चुनाव में मतदाताओं को भाजपा को वोट नहीं देने की अपील तक कर डाली थी। सहनी ने जब ही यूपी में भाजपा के खिलाफ़ उम्मीदवार की घोषणा की तब से ही बिहार में उनके सियासी सफ़र की उलटी गिनती शुरू हो गई थी।

मुकेश सहनी को सियासी झटका लगने की वजह

मुकेश सहनी को सियासी झटका लगने की वजह

मुकेश सहनी को सियासी झटका लगने की एक और वजह यह भी है कि उन्होंने अपनी ग़लतियों से सबक नहीं लिया और अपने सहयोगी दल के ख़िलाफ़ ही क़दम उठाते चले गए। यूपी चुनाव में कामयाबी नहीं मिलने के बाद सहनी को अपने क़दम रोक लेने चाहिए थे। संगठन को मजबूत करने के बाद पार्टी के विस्तार के लिए रणनीति तैयार करनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने पहली गलती यूपी चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ उम्मीदवार उतार कर की, दूसरी ग़लती बिहार में बोंचहा सीट पर उपचुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ प्रत्याशी की घोषणा की। तीसरी ग़लती बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए भाजपा के ख़िलाफ़ उम्मीदवारों की घोषणा करना रही।

नए सिरे से सियासी सफर का कर सकते हैं आगाज़

नए सिरे से सियासी सफर का कर सकते हैं आगाज़

बिहार में 2020 विधानसभा चुनाव के दौरान मुकेश सहनी की पार्टी (विकासशील इंसान पार्टी) महागठबंधन का हिस्सा थी। जब सीटं के बंटवारे पर सहमति नहीं बनी तो वह भाजपा के साथ मिलकर एनडीए गठबंधन का हिस्सा बन गए थे। अब बिहार में इस तरह के सियासी समीकरण बन गए हैं कि मुकेश सहनी के सियासी भविष्य पर ही ख़तरा मंडराने लगा है। फिलहाल उनके विधान परिषद का कार्यकाल 21 जुलाई को ख़त्म होने वाला है तब तक वह मंत्री पद पर बने रह सकते हैं। क्योंकि उनके साथ अति पिछड़ा जाती का वोट बैंक है। ऐसे में भाजपा मंत्री पद से सहनी को हटाकर उस वोट बैंक को खोना नहीं चाहेगी। बिहार के सियासी गलियारों में यह चर्चा है कि मुकेश सहनी अपने टर्म से पहले ही मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे कर नए सिरे से सियासी सफर का आगाज़ कर सकते हैं वहीं दूसरा विकल्प राजनीति से संन्यास लेना ही बचा है।

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