ऊपर एनडीए के सफाई अभियान से दिखने लगी अंदर की धूल
पटना (मुकुंद सिंह)। राजग गठबंधन में जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान के बीच उपजे विवाद ने बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। भले ही उनके बीच की दूरियों को भाजपा ने दुनिया के सामने मिटवा दिया हो, लेकिन मन में टीस तो है ही और उसी टीस का नतीजा है कि अब भी मांझी और पासवान के बीच अंदरूनी तल्खी की बातें चर्चा में हैं। लेकिन जिस तरह एनडीए सफाई अभियान चला रहा है, उससे अंदर की धूल साफ नजर आने लगी हैं।
तीखा सवाल- क्या भारत देश पर बोझ है बिहार?
मांझी की सफाई
मांझी ने सफाई तो दी थी कि पासवाान हमारे भाई हैं और घर में थोड़ी बहुत कहासुनी तो होती ही रहती है। इस पर ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। लेकिन इस विवाद के बीच अब सवाल वर्चस्व का भी हो गय़ा है। लेकिन मांझी और पासवान के बीच हुए मतभेद और राजग में टिकट बंटवारे के बाद उठ रही बातों पर चिराग पासवान ने भी सफाई दी थी कि मांझी से कोई नाराजगी नहीं है।
राम विलास पासवान की सफाई
अब रामविलास पासवान ने भी सफाई दी है और कहा है कि मांझी तो हमारे भाई हैं। पासवान ने कहा कि, मांझी और हमलोग एक परिवार के हैं। हम दोनों भाई-भाई हैं। इसलिए उन्होंने ने भी वहीं कहा था , जो हमने कहा है। उन्होंने कहा था कि एक परिवार में हैं तो कभ -कभार खट-पट हो जाती है और उसमें माफ करने का और नहीं करने सवाल ही नहीं उठता है।
चिराग पासवान की सफाई
यही बात तो चिराग ने भी कहा था कि हमसब एक परिवार हैं। मतलब है कि उपेंद्र कुशवाहा छोटे भाई हैं, मांझी जी हमारे अपने हैं ही और हम लोगों का तो एक ही लक्ष्य है। सीट का बंटवारा से लेकर कोई नाराजगी या मतभेद नहीं है और जो बात फैलाया जा रहा है कि मांझी जी का पासवान से सीट को और कद को लेकर झगड़ा है तो ऐसा कुछ नहीं है। पहले चिराग पासवान और फिर रामविलास पासवान ने मांझी को लेकर अपनी सफाई दी और कहा कि हमारे बीच कोई विवाद नहीं है।
इतनी सफाई किस लिये?
एनडीए रूपी गोले के ऊपर धूल की परतें जम रही हैं, इसमें कोई शक नहीं है, यही कारण है कि बार-बार नेता आगे आकर इस धूल को साफ कर रहे हैं, ताकि बाहर ऐसा ही संदेश जाये, कि अंदर ऑल इज वेल है। पासवान एंड सन की इस सफाई के भी कई मायने निकाले जा रहे हैं।
मतलब साफ है कि एनडीए में सबसे आखिरी में इंट्री करने वाले जीतनराम मांझी को गठबंधन में भाजपा की ओर से ज्यादा तवज्जो मिलना उनके कद को ऊंचा करना है। यही नहीं भाजपा की ओर से जिस तरह से कहा गया है कि मांझी के कुछ कार्यकर्ताओं को वो अपनी टिकट पर चुनाव लड़वायेगी और मांझी का फैसला उस पर सर्वमान्य होगा।
इससे तस्वीर यही दिखती है कि मांझी को पासवान के मुकाबले गठबंधन में ऊंचा कद मिल रहा है, जबकि पासवान कांफ्रेंस के जरिए अपने कद को ऊंचा बताने और दिखाने में लगे हुए हैं।
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