बिहार चुनाव: जातीय समीकरण भाजपा की मजबूरी
पटना : (मुकुंद सिंह)। भारतीय जनता पार्टी इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में साम, दाम, दंड, भेद सब आजमा रही है। उसने जय, जय बिहार का नारा दिया है तो साथ ही तीन पार्टियों को साथ लेकर जातीय समीकरण भी ठीक करेगी। दिल्ली में भाजपा ने जय, जय बिहार, भाजपा सरकार का नारा दिया। इसके जरिए भाजपा बिहारी अस्मिता और गौरव को हाईलाइट करेगी।
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असल में भाजपा को अंदाजा है कि नीतीश कुमार इस बार यह दांव चलेंगे। उन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले बिहारी अस्मिता का मुद्दा उठाया था। बिहार की उप राष्ट्रीयता को हाईलाइट किया था। बिहार की स्थापना के एक सौ साल पूरा होने पर उन्होंने बिहार गीत लिखवाया और देश-दुनिया में कई कार्यक्रम कराए। सो, भाजपा ने पहले ही इसकी काट खोज ली है। पांच साल पहले दोनों मिल कर सुशासन, ब्रांड नीतीश और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर चुनाव लड़े थे। लेकिन इस बार उप राष्ट्रीयता, अस्मिता और गौरव का गान होगा।
पांच साल पहले भाजपा और जदयू का एजेंडा एक था। दोनों ने जाति की राजनीति छोड़ कर सर्वजन की राजनीति की थी। एक तरफ जाति का समीकरण बना रहे लालू और रामविलास पासवान थे तो दूसरी ओर सर्वजन की राजनीति कर रहे नीतीश और सुशील मोदी की टीम थी। इस बार दोनों अलग-अलग टीम में एक-दूसरे की काट खोज रहे हैं।
पिछली बार की तुलन में इस बार क्या है अलग
पिछली बार लालू प्रसाद के साथ लड़े रामविलास पासवान इस बार भाजपा के साथ हैं और नीतीश कुमार के साथ रहे उपेंद्र कुशवाहा भी इस बार भाजपा के साथ हैं। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू में रहे जीतन राम मांझी भी इस बार उनसे अलग हैं और भाजपा के साथ तालमेल के इंतजाम में हैं। इस लिहाज से भाजपा सवर्ण, पासवान, महादलित, पिछड़ा को लेकर इंद्रधनुषी गठबंधन बना रही है।
दूसरी ओर जदयू ने भी नीतीश के राज और सुशासन का मुद्दा उठा कर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। लेकिन लालू प्रसाद अब भी जातियों का ताना-बाना बुन रहे हैं। पिछले और इस चुनाव का एक बड़ा फर्क यह है कि सर्वजन की राजनीति करने वाले भी जाति को चुनाव जीतने का रामबाण मानने लगे हैं।













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