Siddaramaiah Resign: राज्यपाल ने मंजूर किया सिद्धारमैया का इस्तीफा, भंग हुई कैबिनेट, बने रहेंगे कार्यवाहक सीएम
Karnataka CM Siddaramaiah Resign: कर्नाटक के सियासी गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। पिछले कई महीनों से मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर जारी आंतरिक कलह और सस्पेंस पर अब पूरी तरह विराम लग गया है।
77 वर्षीय कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (Siddaramaiah) ने आधिकारिक तौर पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राज्य के राज्यपाल थावरचंद गहलोत (Thaawarchand Gehlot) ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (Siddaramaiah) का इस्तीफा आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया है।

इस बैठक में राज्य के कई कद्दावर मंत्रियों की मौजूदगी में तय हुआ कि सिद्धारमैया आज दोपहर बाद राजभवन को अपना इस्तीफा सौंप देंगे, जिससे डी.के. शिवकुमार की ताजपोशी का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा
संविधान के अनुच्छेद 164(1) के तहत जारी हुआ आदेश
राजभवन द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आदेश में कहा गया है-"भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(1) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, मैं, थावरचंद गहलोत, कर्नाटक का राज्यपाल, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार करता हूं और उनके नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को तत्काल प्रभाव से भंग करता हूं।"
वैकल्पिक व्यवस्था होने तक संभालेंगे कामकाज
संवैधानिक प्रोटोकॉल के अनुसार, राज्यपाल ने निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से अनुरोध किया है कि जब तक राज्य में नई सरकार के गठन या मुख्यमंत्री के चयन की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक वे 'केयरटेकर सीएम' (कार्यवाहक मुख्यमंत्री) के रूप में दैनिक प्रशासनिक कामकाज संभालते रहें।
क्या है आलाकमान का 'त्याग पैकेज' और 4 डिप्टी सीएम का नया फॉर्मूला?
अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, सिद्धारमैया आसानी से पद छोड़ने को तैयार नहीं थे। वे शिवकुमार को कमान सौंपने के सख्त खिलाफ थे, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उन्हें स्पष्ट कर दिया कि उत्तराधिकारी का चयन करना उनका काम नहीं है। सिद्धारमैया को मनाने के लिए आलाकमान ने एक नया बीच का रास्ता निकाला है:
राज्यसभा सीट और बेटे को कैबिनेट: जून 2026 में कर्नाटक की 4 राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। इसके तहत सिद्धारमैया को दिल्ली लाकर राज्यसभा सांसद बनाया जाएगा और उनके बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को कर्नाटक की नई कैबिनेट में मंत्री पद दिया जाएगा।
(Multiple Deputy CMs): सिद्धारमैया ने अपने पीछे अपने वफादार गुट का संतुलन बनाए रखने के लिए एक शर्त रखी है। नए बदलाव के तहत राज्य में सामाजिक संतुलन (Social Balance) साधने के लिए 4 नए उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। इनमें एम.बी. पाटिल, ईश्वर खंड्रे, जी. परमेश्वर और तनवीर सैत जैसे बड़े चेहरों के नामों की चर्चा तेज है।
बेंगलुरु पहुंचे केसी वेणुगोपाल और सुरजेवाला; आज की बैठक बेहद अहम
हालात की संवेदनशीलता को देखते हुए कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और कर्नाटक प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला बुधवार शाम को ही विशेष विमान से बेंगलुरु पहुंच चुके हैं। सुरजेवाला ने मुख्यमंत्री आवास पर जाकर सिद्धारमैया से देर रात मुलाकात भी की।
हालांकि, हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए सुरजेवाला ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की और कहा, "फिलहाल विधायक दल (CLP) की कोई आधिकारिक बैठक नहीं बुलाई गई है। मल्लिकार्जुन खरगे जी और राहुल गांधी जी जो भी फैसला लेंगे, वह किसी व्यक्ति के हित में नहीं बल्कि कर्नाटक की जनता के हित में होगा।" लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि आज सुबह की ब्रेकफास्ट मीटिंग में ये दोनों केंद्रीय नेता मौजूद रहेंगे, जहां इस्तीफे की रूपरेखा तय होगी और शुक्रवार को विधायक दल की बैठक बुलाकर वीकेंड (शनिवार या रविवार) तक नए मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह कराया जा सकता है।
राहुल गांधी के 'ओबीसी कार्ड' पर उठे सवाल
सिद्धारमैया के वफादार और पूर्व राज्यसभा सांसदों का एक धड़ा इस फैसले से पूरी तरह खुश नहीं है। उनका तर्क है कि राहुल गांधी देश भर में खुद को ओबीसी (OBC) और दलितों के मसीहा के रूप में स्थापित कर रहे हैं। ऐसे में दक्षिण भारत के इतने बड़े इकलौते पिछड़े वर्ग (OBC) के मुख्यमंत्री को पद से हटाकर कांग्रेस देश में क्या संदेश देना चाहती है? यही कारण है कि नए मंत्रिमंडल में पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को भारी प्रतिनिधित्व देने की तैयारी की जा रही है।
डीके शिवकुमार की ताजपोशी और नई चुनौतियां
डी.के. शिवकुमार, जिन्हें कांग्रेस का सबसे बड़ा संकटमोचक और 'पोल फाइनेंसर' माना जाता है, इस पूरे घटनाक्रम के दौरान बेहद शांत और संयमित बने हुए हैं। वे वर्तमान में उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (KPCC) का पद भी संभाल रहे हैं।
मुख्यमंत्री बनते ही उन्हें 'एक व्यक्ति एक पद' के सिद्धांत के तहत प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी होगी, जिसके लिए भी नए नाम की तलाश शुरू हो गई है। 2028 के विधानसभा चुनाव में अब महज दो साल का वक्त बचा है, ऐसे में आंतरिक असंतोष को शांत कर सरकार को वापस ट्रैक पर लाना नए मुख्यमंत्री के लिए कांटों भरा ताज साबित होने वाला है।












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