Pakistan: यहां बाढ़ में महिलाएं भूखे मरने को मजबूर हैं, क्योंकि यह मर्दों के 'सम्मान' की बात है
इस्लामाबाद, 14 सितंबर: पाकिस्तान में आई भीषण बाढ़ में कुछ गांव काफी समय से पानी से घिरे हुए हैं। लोगों के घरों में राशन खत्म हो रहा है। लोगों से बार-बार अपील की जा रही है कि हालात और बिगड़े उससे पहले वे किसी सुरक्षित राहत शिविर में शिफ्ट हो जाएं। लेकिन, कुछ गांव के लोग इसलिए राहत कैंपों में जाने से मना कर चुके हैं कि वह अपने घरों की महिलाओं को वहां नहीं ले जा सकते, क्योंकि वहां वो गैर-मर्दों के साथ घुल-मिल सकती हैं। पंजाब प्रांत के एक गांव में 90 घर हैं और ज्यादातर इस बाढ़ में बर्बाद हो चुके हैं। लेकिन, सिर्फ महिलाएं बाहर नहीं जा सकतीं, इसलिए लोग सुरक्षित कैंपों में शिफ्ट नहीं हुए हैं। गांव के मर्दों ने इस फैसले को 'सम्मान' की बात कहा है।

भुखमरी मंजूर है, लेकिन महिलाओं का बाहर जाना नहीं
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बस्ती अहमद दिन नाम का एक छोटा सा गांव है, जो बाढ़ के पानी से बुरी तरह घिरा हुआ है। गांव में करीब 400 लोग रहते हैं, जो अब भुखमरी और कई तरह की बीमारियों का सामना कर रहे हैं। लेकिन, इन्होंने बाढ़ से निकलकर सुरक्षित जगह पर शिफ्ट होने की अपील ठुकरा दी है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने एक विदेशी न्यूज एजेंसी के हवाले से जो खबर दी है, उससे इस भयानक बाढ़ में भी पाकिस्तान की महिलाओं की बुरी स्थिति साफ होती है।

महिलाओं को अपनी राय रखने का भी अधिकार नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक बस्ती अहमद दिन के लोगों का कहना है कि गांव छोड़कर रिलीफ कैंप में शिफ्ट होने का मतलब है कि महिलाएं अपने परिवार के बाहर के मर्दों से मिलेंगी और इससे उनके 'सम्मान' को धक्का लगेगा। लेकिन, इस मसले पर गांव की महिलाओं को अपनी राय रखने का भी अधिकार नहीं है। जब 17 साल की शिरीन बीबी से पूछा गया कि क्या वह सूखी जमीन पर बने कैंप में जाना चाहेंगी तो उन्होंने कहा, 'यह फैसला गांव के बुजुर्गों को करना है।'

बाढ़ से सैकड़ों गांव हो चुके हैं तबाह
पाकिस्तान का बहुत बड़ा इलाका इस साल भयंकर बाढ़ की चपेट में आया है, जिसके लिए जलवायु परिवर्तन को दोष दिया जा रहा है। इसी बाढ़ की चपेट में बस्ती अहमद दिन जैसे सैकड़ों गांव तबाह हो चुके हैं और लाखों लोगों की आजीविका छिन चुकी है। पंजाब प्रांत के रोझन इलाके में स्थित इस गांव के 90 घरों में से आधे से ज्यादा पूरी तरह से उजाड़ हो चुके हैं। जून में जब बारिश शुरू हुई थी तो गांव के चारों ओर जो कपास के फसल लहलहा रहे थे, अब बाढ़ के पानी में सड़ चुके हैं और नजदीकी शहर को जोड़ने वाली सड़क बाढ़ के गंदे पानी में 10 फीट डूबी हुई है।

नाव से आना-जाना बहुत खर्चीला है
गांव के लोगों के पास भोजन और बाकी आवश्यक चीजें जुटाने के लिए एक ही उपाय बच गया है- टूटी-फूटी और जर्जर नाव। लेकिन, यह भी उतना आसान नहीं है। नाव चलाने वाले लोगों को लाने-ले जाने के लिए मोटी रकम वसूल रहे हैं। गांव के लोगों के पास अब बहुत ही कम मात्रा में अनाज बच गया है। गांव में जो वॉलंटियर राहत पैकेट लेकर आते हैं, उन्होंने गांव वालों से सुरक्षा के लिए यहां से निकलने की बहुत अपील की है। लेकिन, कोई फायदा नहीं हुआ है।

'भूखे मरने देना पसंद करेंगे, लेकिन महिलाओं को बाहर जाने नहीं देंगे'
यहां के एक निवासी मोहम्मद अमीर ने कहा, 'हम बलोच हैं। बलोच अपनी महिलाओं को बाहर जाने की इजाजत नहीं देते।' इस गांव में बलोच काफी प्रभावी भूमिका में हैं। उन्होंने कहा, 'बचोच अपने परिवार को बाहर जाने देने के बजाए भूखे मरने देना पसंद करेंगे।' यह सिर्फ बलोच महिलाओं की स्थिति नहीं है। पाकिस्तान के ज्यादातर हिस्से में मर्दों के 'सम्मान' के नाम पर महिलाओं को ऐसे ही सख्त दायरे में रहकर जीने की मजबूरी है। यहां महिलाओं को परिवार के बाहर के मर्दों से बात करने तक की इजाजत नहीं दी जाती।

इस बाढ़ में महिलाओं ने बहुत भुगता है
यहां महिलाओं को गैर-मर्दों से बात करने या परिवार के चुने हुए शख्स से बाहर के व्यक्ति से शादी करने पर खून तक किया जा सकता है; और बाढ़ ने तो महिलाओं को उनकी मूलभूत जरूरतों और स्वास्थ्य सुविधाओं से भी पूरी तरह से वंचित कर दिया है और सबकुछ मर्दों के रहमो करम पर छोड़ दिया गया है। मर्दों के सम्मान के नाम पर पुरुषों को नावों पर मोटी रकम खर्च कर हफ्ते में एक दिन नजदीकी रिलीफ कैंप में जाकर राहत सामग्री लाना कबूल है, लेकिन घर की महिलाओं को बाढ़ से निकालना मंजूर नहीं है।
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'वो उन कैंपों में नहीं रह सकतीं, यह सम्मान की बात है'
गांव के बुजुर्गों (सारे मर्द) का कहना है, महिलाओं को सिर्फ आपात स्थिति में ही निकलने की इजाजत है, जैसे कि अगर स्वास्थ्य खराब हो तब। इसमें बाढ़ जैसी प्राकृतिक विभीषिका के लिए कोई छूट नहीं है। मुरीद हुसैन नाम के एक बुजुर्ग ने कहा कि 2010 की भयानक बाढ़ में भी उन्होंने गांव नहीं खाली किया था। उन्होंने कहा, 'हमने तब अपना गांव नहीं छोड़ा था।' वो बोले- 'हम अपनी औरतों को बाहर जाने की इजाजत नहीं देते। वो उन कैंपों में नहीं रह सकती हैं। यह सम्मान की बात है।'
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