कौन हैं 'बीहड़ का बाग़ी' फ़ेम दिलीप आर्या, मज़दूर से कैसे बने अभिनेता, पढ़िए संघर्ष भरी कहानी
बॉलिवुड जगत की आपने कई संघर्ष की कहानी पढ़ी होगी लेकिन आज हम आपको हम आपको एक ऐसी शख्सियत से रूबरू करवाने जा रहे हैं
मुम्बई, 25 अप्रैल 2022। बॉलिवुड जगत की आपने कई संघर्ष की कहानी पढ़ी होगी लेकिन आज हम आपको हम आपको एक ऐसी शख्सियत से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जिसने बचपन में मज़दूरी कर अपनी ज़िंदगी बसर की और फिर मेहनत मशक़्क़त कर अपनी एक अलग पहचान बनाई। एक फिल्म़ में उन्होंने बखूबी मुख्य अभिनेता का किरदार निभाया जिसके बाद उन्हें सर्वश्रेष्ट अभिनेता के अवार्ड से भी नवाज़ा गया। जी हां आज हम बात करने जा रहे हैं बीहड़ का बाग़ी फेम दिलीप आर्या की जिन्होंने बहुत ही कम वक़्त में सुर्खियां बटोर ली हैं। अब वह बीहड़ का बागी-2 और भोला के लिए अपने आप को तैयार कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने लुक को भी बदल लिया है।

बच्चों की ख़ातिर मां ने की थी मज़दूरी
दिलीप आर्या एक ऐसा नाम है जो कि एक गांव से ताल्लुक़ रखते हैं। उनका जन्म 3 जुलाई 1980 में हुआ था। आज 21वीं सदी में युवा पीढ़ी के लिए मार्ग दर्शक एवं प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। उनका वास्तविक नाम दिलीप कुमार है लेकिन इंडस्ट्री में लोग उन्हें दिलीप आर्या के नाम से जाते हैं। सन् 1985 में दिलीप के बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया। घर के मुखिया के जाने के बाद पूरा परिवार बिखर सा गया था। ऐसी स्थिति में मां ने बच्चों की ख़ातिर मज़दूरी करना तय किया। तेज़ धूप में मां को खेतों में निराई, गुड़ाई करता देख, दिलीप और उसके बड़े भाई ने भी मज़दूरी करना शुरू कर दिया।

बचपन में दिलीप ने भी की थी मज़दूरी
दिलीप ने भी बचपन में ही मज़दूरी करनी शुरी कर दी थी, उम्र में छोटे होने की वजह से बड़ों की अपेक्षा उन्हें देहाड़ी कम मिलती थी। काम में नुकसान ना हो इस कारण उसे मज़दूरी पर कभी-कभी लोग नही ले जातें थे। दिलीप को इस बात का बहुत दुःख होता था और वो ज़ल्द से ज़ल्द बड़ा हो जाना चाहते थे ताकि अपने भाई और मां के साथ मिलकर घर का बोझ उठा सकें, उन दिनों मज़दूर की दिहाड़ी सिर्फ़ पाँच रूपये हुआ करती थी। दिलीप ज्यादा से ज्यादा समय तक काम पर लगे रहते थे। आज के दौंर में काम से छुट्टी मिले तो खुशी मिलती है लेकिन दिलीप के साथ ऐसा कभी नहीं रहा वह ज़्यादा से ज़्यादा काम करना चाहते थे।

राज मिस्त्री का काम करते थे दिलीप के पिता
दिलीप के पिता पेशा मेसन (राज मिस्त्री) का था। स्वर्गीय गंगा सागर जी के निधन (1985) के बाद उनकी माता का पेशा कृषि श्रम बन गया। बड़े भाई अनीश कुमार ने बड़े होने के फ़र्ज़ को बख़ूबी अंजाम दिया। पिता के निधन के बाद उन्होंने मज़दूरी करते हुए परिवार का ख़र्चा उठाया। दिलीप आर्या 6 भाई और बहन हैं, 3 भाई और 3 बहने हैं। उन्होंने ने भी अपने परिवार के दो सिरों को पूरा करने के लिए 11 साल की उम्र में ही मज़दूरी करनी शुरू कर दी थी। 7 से 8 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद उन्हे कुछ रूपये मिलते थे जिससे परिवार की रोज़ी-रोटी चलती थी।

छोटे गांव से मुबंई जैसे शहर का सफ़र
एक छोटे गांव से मुबंई जैसे शहर का रास्ता कितना मुश्किल भरा हो सकता है ये आप अंदाजा नहीं लगा सकते। दिलीप महानगरी मुम्बई तो पहुंच गए थे लेकिन उन्हें पता नहीं कि वह कहां रहेंगे , क्या खाएंगे और कैसा काम करेंगे ? आमतौर पर महानगर में ज़िंदगी गुजारने का बजट आम बजट से कहीं ज्यादा होता है। दिलीप के इरादे मज़बूत और हौसले बुलंद थे, उन्हें जुनून था कि अपने ख़्वाब को सच कर दिखाना है। किसी भी हाल में सपने को साकार करना ही है।

बीहड़ का बाग़ी वेब सीरीज़ से मिली कामयाबी
अब आप को दिलीप के गांव के बारे में बताता हूं। उनके गांव का नाम अमौली है जो कि तहसील बिंदकी जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश में स्थित है। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहां के प्राइमरी विद्यालय में हुई। उनका बचपन मज़दूरी के पसीने में लिपटा परेशानी भरा था। इसके अलावा उनके सामने कोई और विकल्प भी तो नहीं था। फिर भी उन्होंने अपना हौसला बुलंद रखा आगे की पढ़ाई की, स्नातक और परास्नातक की डिग्रियां लीं। दिलीप आर्या की वेब सीरीज़ बीहड़ का बाग़ी को दर्शकों ने खूब सराहा और आज इंडस्ट्री में दिलीप आर्या ने अलग पहचान बना ली है। अब कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर वह काम भी कर रहे हैं। बीहड़ का बागी-2 और भोला मूवी के लिए उन्होंने अपना लुक भी बदल लिया है।
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