india@75: अंग्रेजों के आगे कभी झुके नहीं, रुके नहीं, हमेशा फौलाद की तरह अडिग रहे सिब्बन लाल सक्सेना
पूरे देश में 'आज़ादी का अमृत महोत्सव' मनाया जा रहा है।आजादी के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में देश में उत्सव का माहौल है।हर घर तिरंगा लहराने की तैयारी में सभी लोग जुटे हैं।ऐसे में देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका
महराजगंज, 5अगस्त: पूरे देश में 'आज़ादी का अमृत महोत्सव' मनाया जा रहा है।आजादी के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में देश में उत्सव का माहौल है।हर घर तिरंगा लहराने की तैयारी में सभी लोग जुटे हैं।ऐसे में देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सच्चे सपूतों व वीरों को याद करना भी जरुरी है।जिन्होंने देश को व समाज को एक नई दिशा दी। आज हम बात करेंगे पूर्व के लेनिन,महराजगंज के मसीहा ,धरती के नेता जैसे कई नामों से प्रसिद्ध प्रोफेसर सिब्बन लाल सक्सेना की।एक ऐसा नेता जिसने जनसेवा के लिए अपने संपूर्ण जीवन का त्याग किया,एक ऐसा नेता जिसने जनता की सेवा को ही अपने जीवन का उद्देश्य बनाया । अंग्रेजों के आगे कभी झुके नहीं, रुके नहीं, हमेशा फौलाद की तरह अडिग रहे सिब्बन लाल सक्सेना।

बरेली में जन्म,कानपुर में शिक्षा,महराजगंज कर्मभूमि
सिब्बन लाल सक्सेना का जीवन ही संघर्षो भरा था।इनका जन्म 13जुलाई1906 को अपने मामा के घर आगरा में हुआ था।इनके पिता का नाम श्री छोटेलाल सक्सेना था जो पोस्टमास्टर थे। इनकी माता का नाम 'बिट्टी रानी' था। चाचा का नाम श्यामसुंदर लाल सक्सेना एवम रामसुंदर लाल सक्सेना था । आप बरेली में आवला तहसील, बल्लिया नामक गाँव के मूल निवासी थे। शिब्बनलाल का परिवार अपने समय में बल्लिया का एक समृद्ध परिवार था जिसकी वजह से उसका गाँव में काफी सम्मान था।सात साल की उम्र में इनकी माता व नौ साल की उम्र में इनके पिता का देहांत हो गया।शिब्बनलाल और उनके दो छोटे भाई-बहन होरीलाल और प्रियंवदा को उनके मामा दामोदार लाल सक्सेना ने सहारा दिया और अपने साथ कानपुर ले गये जहाँ पर वह स्वयं वकालत करते थे। शिब्बनलाल की प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा कानपुर के शासकीय हाई स्कूल, क्राइस्ट चर्च इण्टर कॉलेज, और डीएवी कॉलेज में हुई। वे प्रारम्भ से ही काफी मेधावी छात्र रहे थे जिसके फलस्वरूप उन्होने अपनी सारी परीक्षाएँ न केवल प्रथम श्रेणी में बल्कि स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की थीं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिब्बनलाल ने 1927 में अपनी बी. ए. की परीक्षा गणित और दर्शनशास्त्र विषयों के साथ स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की। 1929 में इन्होंने एम. ए. की परीक्षा स्वर्ण पदक प्राप्त करते हुये गणित विषय के साथ उत्तीर्ण की। सन् 1930 में शिब्बनलाल गोरखपुर के सेन्ट एण्ड्रूयूज कालेज में गणित के प्रवक्ता के रुप में नियुक्त हुये और 1931 में उन्होने आगरा विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र विषय से एम. ए. की डिग्री ली।
महात्मा गांधी के आह्वान पर राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लिया
शिब्बन लाल सक्सेना पेशे से डिग्री कालेज के अध्यापक थे। 1932 में महात्मा गांधी के आह्वान पर अध्यापन त्यागकर पूर्ण रुप से राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने महराजगंज के किसानों -मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति के लिए कार्य किया।जब सक्सेना गोरखपुर में प्रवक्ता नियुक्त हुए थे उसी समय महात्मा गांधी एक सभा में भाषण देने के लिए गोरखपुर आए हुए थे। गांधी जी से उनकी पहली मुलाकात यहीं हुई और गांधी जी ने उन्हें कांग्रेस में आने की सलाह दी जिसे शिब्बनलाल ने स्वीकार कर लिया।
बेहद पिछड़ा था महराजगंज
इनके समय महराजगंज गोरखपुर जिले का अत्यंत पिछड़ा इलाका था।घने जंगलो से आच्छादित नेपाल की तराई में स्थित यह क्षेत्र शिक्षा,विकास से बहुत दूर था।ऐसे में सिब्बन लाल सक्सेना ने महाराजगंज जाकर लोगों को एक करने का बीड़ा उठाया और अपने प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर महराजगंज के उत्थान में लग गए।
धरती के नेता थे सिब्बन लाल
वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व शिक्षक विनोद कुमार श्रीवास्तव बताते है कि सिब्बन लाल का जीवन ही त्याग का जीवन था।उनका उद्देश्य सिर्फ व सिर्फ जनसेवा करना ही था।दिन-रात वह इसी प्रयास में रहते थे कि मजदूरों,गरीबों की दशा में कैसे सुधार हो।उनका जीवन स्तर कैसे ऊपर उठे।समाज में फैली अशिक्षा को कैसे दूर किया जाए।इसके लिए वह घर-घर जाते और उनकी समस्याओं को जानते। जहां रात हो जाती वहीं रुक जाते और अगले दिन सुबह जनसेवा पर निकल जाते थे।महराजगंज में शिक्षा का अलख जगाने का श्रेय सिब्बन लाल सक्सेना को ही है।उन्होंने यहां कई डीग्री कॉलेज,इंटरमीडिएट कॉलेजों की स्थापना की।यहां की शिक्षा व्यवस्था को सुधारा। शिब्बन लाल ने मजदूरों के लिए लड़ाइयां लड़ी और जेल भी गए। तब राजनीति संघर्ष, त्याग, तपस्या व बलिदान पर आधारित थी और सिब्बन लाल इसके उदाहरण है।
जब पैर में लगी थी गोली एक समय जब सिब्बन लाल जन-जन को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ रहे थे, उस समय अंग्रेजों ने प्रो. सक्सेना पर इनाम घोषित कर दिया। इसी बीच एक दिन सिब्बन लाल घुघली के गोड़धोवा गांव में गए हुए थे। अगले दिन भोर में करीब चार बजे वे वेष बदलकर गांव से निकल रहे थे कि नित्य क्रिया के लिए निकले अंग्रेजों के एक मुखबिर ने उन्हें पहचान लिया। उसने सिब्बन लाल पर गोली चला दी। गोली उनके पैर में लग गई। किसी तरह वो बचते-बचाते दूसरे गांव में पहुंचे, जहां मौजूद क्रांतिकारियों ने उनके पैर से गोली निकालकर उनका इलाज करवाया।
महराजगंज के पहले सांसद होने का गौरव
सिब्बन लाल सक्सेना 1957 में निर्दल चुनाव लड़े और 52.57 फीसद वोट पाकर विजयी हुए। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी हरिशंकर को 27 हजार से अधिक वोटों से हराया था। सक्सेना को 92 हजार 617 वोट मिले थे। इसके बाद 1962 में उन्हें महादेव प्रसाद से हार का सामना करना पड़ा। 1967 में गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ ने 42 हजार से अधिक वोटो से हरा दिया। 1971 में निर्दल प्रत्याशी के रूप में उन्हें फिर विजय हासिल हुई। इस बार उन्हें 93 हजार से अधिक वोट मिले। 1977 में शिब्बन लाल सक्सेना को 61.88 फीसद वोट मिले। उन्होंने रघुबर प्रसाद को एक लाख 31 हजार से अधिक वोटो से शिकस्त दी थी।उन्हें महराजगंज के पहले सांसद होने का गौरव प्राप्त है।












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