MP New CM: इसमें से एक कुर्सी है VVIP, प्रदेश में 72 साल के चुनावी इतिहास में पहली दफा सीएम का रोचक चयन
MP New CM: मध्य प्रदेश में प्रचंड बहुमत वाली बीजेपी सरकार का मुखिया कौन? इसका फैसला पर्यवेक्षकों के सामने नवनिर्वाचित 163 विधायक उसी कुर्सी में बैठे-बैठे किया जाएगा, जो अगले पांच साल अपने क्षेत्र और प्रदेश में प्रतिनिधित्व की पहचान देगी।
राजधानी भोपाल में प्रदेश बीजेपी मुख्यालय बैठक वाली जगह से लेकर बाहर तक दुल्हन की तरह सजा हैं। दिलचस्प बात यह है कि बैठक के लिए रखी गई कुर्सियों में से ही एक 'कुर्सी' कुछ घंटे बाद VVIP बन जाएगी। जिसकी ताकत निर्वाचित बाकी 162 विधायकों से सबसे ज्यादा होगी।
यह पहला अवसर है जब सूबे की सियासत में 'चीफ मिनिस्टर' के नाम का चयन रोचक मोड़ पर खड़ा हुआ। 2014 के बाद नई जिल्द वाली बीजेपी लॉन्ग टर्म प्लानिंग पर भरोसा करती आई हैं। लिहाजा 3 दिसंबर को नतीजे आने के बाद सीएम के नाम का ऐलान करने में 8 दिन मंथन में गुजारने पड़े।

ये खास तैयारियां
प्रदेश में 163 सीटों पर खिले 'कमल' की सरपरस्ती में विधायक दल की बैठक के लिए हॉल सहित पार्टी का दफ्तर फूलों से गुलजार हैं। जीत फिर सरकार बनने की खुशबू यहां से पूरे सूबे में महकेंगी। पार्टी संगठन का इस बार का यह प्रोग्राम इसलिए भी खास है क्योकि केन्द्रीय मंत्रियों समेत जिन सांसदों में बीजेपी ने चुनाव में उतारा उनमें कुलस्ते को छोड़ सभी जीतकर यहां पहुंचे। अलबत्ता सीएम की रेस में दावेदारों की फेहरिस्त लंबी हो गई।
नाम तय महज औपचारिकता!
सीनियर जर्नलिस्ट चैतन्य भट्ट बताते है कि मौजूदा बीजेपी में मोदी-शाह का ही सिक्का चल रहा हैं। जिस रणनीति पर पार्टी आगे बढ़ रही है, सीएम फेस पहले से ही तय है। चूंकि चयन प्रक्रिया की परंपरा को निभाना है, लिहाजा कोर कमेटी और विधायक दल की बैठक की रस्म निभाई जा रही हैं। पब्लिक के बीच एक अलग तरह का माहौल बनाना और मैसेज देने का संदेश इस बार सीएम चयन के निर्णय छिपा रहा।
एमपी में 72 साल का चुनावी इतिहास
मध्य प्रदेश राज्य का गठन 1956 में हुआ था, लेकिन पहला विधानसभा चुनाव पांच साल पहले 1951-52 में हुआ था। उस वक्त रियासतों का दौर था। बीजेपी 1980 में आस्त्तिव में आई। उससे पहले जनसंघ के बैनर तले चुनाव लड़ा जाता रहा। 1980 के बाद शिवराज सिंह चौहान ही बीजेपी के इकलौते चीफ मिनिस्टर हुए जिन्होंने दो बार पांच-पांच साल का कार्यकाल पूरा किया और सीएम की कुर्सी पर जमे रहे। कैलाश जोशी, वीरेंद्र सकलेचा, सुंदरलाल पटवा, उमा भारती इन चारों को किसी न किसी वजह से पूरे पांच साल कुर्सी पर विराजमान रहने का सुख नहीं मिल सका। कार्यकाल पूरा होने के पहले ही सीएम बदल गया।
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