Madhya Pradesh: अगर पत्नी का चल रहा है अफेयर, तो कोर्ट की ये बात आपके बड़े काम की हो सकती है, जानें क्या कहा
Madhya Pradesh: मेरठ में मुस्कान नाम की पत्नी ने अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर पति सौरभ राजपूत की हत्या कर दी थी। मामला ठंडा भी नहीं हुआ कि मेघायल में नई नवेली दुल्हन सोनम रघुवंशी द्वारा अपने पति राज के साथ मिलकर पति राजा रघुवंशी को हनीमून पर ले जाकर मारने की खबर आ गई। ऐसे में पतियों के हाथ-पैर इन दिनों फूले हुए हैं, लेकिन आप घबराइए नहीं मध्य प्रदेश कोर्ट की एक टिप्पणी को सुनकर आपको मनोबल दुरुस्त हो सकता है।
क्या है मामला?
दरअसल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बिना सहमति के हासिल किए गए व्हाट्सएप चैट को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की अनुमति दी है। जैसा कि समझ आ रहा होगा ये मामला एक वैवाहिक विवाद से संबंधित है, जहां एक पति ने अपनी पत्नी पर विवाह के बावजूद अपने प्रेमी से संबंध रखने का आरोप लगाया है।

पति ने कैसे हासिल किया पत्नी का चैट रिकॉर्ड?
मामला पारिवारिक न्यायालय में चल रहा था। पति ने निचली अदालत में पत्नी के खिलाफ कुछ सबूत पेश किए थे। यह सबूत उस शख्स ने पत्नी के व्हाट्सएप चैट से लिए थे, जिसे लेने के लिए पति ने पत्नी की इजाजत नहीं ली थी, लिहाजा गुप्त रूप से पति ने इस मिशन को अंजाम दिया था। कोर्ट में हुई बहस से पता चला कि पति ने पत्नी के मोबाइल फोन पर एक थर्ड-पार्टी ऐप इंस्टॉल किया था, जिसके माध्यम से उसकी पत्नी का व्हाट्सएप चैट ऑटोमैटिकली उसके फोन में पहुंच जाता था। फिर क्या था, इधर पर अपने प्रेमी के साथ ईलू-ईलू करती, पति को एक-एक चैट मिलता रहता। ऐसे में लॉयल एक पार्टनर पर क्या गुजर रही होगी उसका अंदाजा भी आप लगा सकते हैं। अब इन्हीं चैट को पति ने सबूत के तौर पर कोर्ट में पेश करते हुए दावा किया कि इस चैट से यह साबित होता है कि पत्नी का किसी तीसरे व्यक्ति के साथ विवाह के उपरांत भी संबंध थे।
निचली अदालत में इस सबूत के पेश किए जाने पर पत्नी ने इसका विरोध किया और हाईकोर्ट में अपील की। पत्नी के वकील ने दलील दी कि चैट को प्राप्त करने के लिए महिला की सहमति नहीं ली गई थी, जो कि निजता का उल्लंघन और साक्ष्य प्राप्त करने का अवैध तरीका है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट के न्यायाधीश आशीष श्रोती ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के तहत निजी व्हाट्सएप चैट को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, भले ही वह व्यक्ति विशेष की सहमति के बिना प्राप्त किया गया हो या फिर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत स्वीकार्य न हो। न्यायाधीश श्रोती ने साफ-साफ कहा कि सबूत स्वीकार होने का मतलब यह नहीं है कि इसे हासिल करने का अवैध तरीका नागरिक या आपराधिक कानून, या दोनों के तहत नहीं आता है।
निजता का अधिकार बनाम निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
जज की इस टिप्पणी के बाद पत्नी की ओर से यह तर्क दिया गया कि यह निजता के अधिकार और उनके मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आता है। इस पर न्यायाधीश श्रोती ने कहा, "हमारे संविधान के तहत कोई भी मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं है। इस मामले में, दो मौलिक अधिकारों के बीच टकराव है: निजता का अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार। दोनों ही संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आते हैं। ऐसी स्थिति में, निजता के अधिकार को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के आगे झुकना पड़ सकता है।" मतलब किसी की निजता से कोर्ट के अंदर चल रहे केस में फेयर ट्रायल को जज श्रोती ने महत्वपूर्ण बताया।
फैमिली कोर्ट के अधिकार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पारिवारिक न्यायालय के पास इस सबूत को स्वीकार करने का अधिकार है। न्यायालय ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवाद पर अंतिम निर्णय देते समय किसी विशेष साक्ष्य को स्वीकार करने या खारिज करने का पूरा अधिकार पारिवारिक न्यायालय के पास है। इसके बाद कोर्ट की सुनवाई आगे बढ़ी। लेकिन जज की इस टिप्पणी अब चर्चा में है, क्योंकि अभी तक ऐसे भी कई मामले सामने आ चुके जब पार्टनर को बिना बताए अफेयर से जुड़े सबूत दूसरे पार्टनर ने हासिल किए हों और उन्हें अवैध माना गया हो।
खैर, इस मामले पर आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में जरूर बताएं।












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