Mahua Moitra को 'Ishq Karo Party' में क्यों देखना चाहते हैं 80 साल के रिटायर्ड SC जज? असली गेम प्लान क्या?

Markandey Katju Launches Ishq Karo Party: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने 80 साल की उम्र में अचानक एक नई 'पार्टी' लॉन्च कर दी। नाम है 'इश्क करो पार्टी' (Ishq Karo Party)। नारा है, 'युद्ध नहीं, प्रेम करो'। सुनने में यह कोई रोमांटिक या मजाकिया आइडिया लग सकता है, लेकिन इसके पीछे उनका क्या असली इरादा है? और वे तृणमूल कांग्रेस की फायरब्रांड नेता महुआ मोइत्रा को इसमें क्यों देखना चाहते हैं?

क्या यह सचमुच कोई नई राजनीतिक शुरुआत है या सिर्फ एक तेज धार वाला राजनीतिक व्यंग्य? इस पूरे एपिसोड को समझने के लिए ये जानना जरूरी है कि 'इश्क करो पार्टी' वास्तव में है क्या, इसका संदेश क्या है, महुआ मोइत्रा का जिक्र क्यों हो रहा है, और काटजू का असली गेम प्लान किस दिशा में जाता दिखता है। आइए एक-एक परत को खोलते हैं...

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इश्क करो पार्टी: नाम रोमांटिक, एजेंडा राजनीतिक

मार्कंडेय काटजू ने 'इश्क करो पार्टी' को एक मंच के रूप में पेश किया है, जो उनके मुताबिक, भारत में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने और आम लोगों की बुनियादी समस्याओं पर जनसंघर्ष खड़ा करने के लिए बनाया गया है।

उन्होंने अपने दोस्त इरफान अली (जो अमेरिका के न्यू जर्सी, प्रिंसटन में रहते हैं) के साथ मिलकर यह प्लेटफॉर्म खड़ा किया। इरफान ने तुरंत इसके लिए वेबसाइट, इंस्टाग्राम, फेसबुक अकाउंट और एक आधिकारिक ईमेल आईडी - [email protected] - बना दी। खुद काटजू इस मंच के 'संरक्षक' (Patron) की भूमिका में हैं, जबकि इरफान अली को 'अध्यक्ष' (President) बताया गया है। काटजू साफ कह चुके हैं कि यह कोई पारंपरिक चुनावी राजनीतिक पार्टी नहीं है। वे इसे ऐसे मंच के रूप में देखते हैं जो:

  • देशभक्त और जागरूक नागरिकों को जोड़े - धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक और वैज्ञानिक सोच वाले नेतृत्व को सामने लाए - जाति-धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर जनदबाव बनाए
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया को इस 'पार्टी' का मुख्य मैदान बनाया गया है। यही वजह है कि इसका पहला औपचारिक एलान भी X (पूर्व ट्विटर) और ईमेल के जरिए किया गया।

जस्टिस काटजू ने यह मंच अभी क्यों शुरू किया?

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काटजू के मुताबिक, भारत इस समय बेहद गंभीर संकटों से जूझ रहा है। वे जिन मुद्दों को सबसे बड़े संकट के रूप में देखते हैं, वे हैं...

  • व्यापक गरीबी और बेरोजगारी
  • बच्चों में कुपोषण का खतरनाक स्तर (ग्लोबल हंगर इंडेक्स जैसे इंडिकेटर्स का हवाला देकर वे कहते हैं कि हर दूसरा बच्चा किसी न किसी रूप में प्रभावित है)।
  • आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा की भारी कमी।
  • महंगाई, खासकर रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतें।
  • जाति और धर्म के नाम पर नफरत और हिंसा।
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काटजू का तर्क है कि इन समस्याओं से निपटने के लिए भारतीय समाज को एकजुट होना पड़ेगा। लेकिन, उनके अनुसार, मौजूदा राजनीतिक ढांचा और बड़े-बड़े नेता लोगों को जाति, धर्म, भाषा और नस्ल के आधार पर बांटने में लगे हैं। यहीं से 'इश्क करो पार्टी' का आइडिया आता है। उनकी नजर में यह एक ऐसा मंच है जो विभाजन और नफरत की राजनीति के खिलाफ 'दिल' और 'दिमाग' दोनों स्तर पर प्रतिरोध खड़ा करे और लोगों को बतौर नागरिक जोड़ने की कोशिश करे।

यह 'इश्क' कौन-सा है? सूफी अर्थ बनाम रोमांटिक गलतफहमी

'इश्क करो पार्टी
'इश्क करो पार्टी

'इश्क-ए-हकीकी' का मतलब है ईश्वर से, या किसी उच्च आदर्श से वह प्रेम, जिसके लिए इंसान अपना सब कुछ कुर्बान कर सके। यह ऐसा भाव है जो सीमाओं से परे है, न जाति, न धर्म, न भाषा, न नस्ल - कुछ भी आड़े नहीं आता।

काटजू अक्सर मिर्जा गालिब के शेर का उदाहरण देते हैं:

'इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश 'गालिब' कि लगाए न लगे और बुझाए न बने!'

उनका कहना है कि 'इश्क करो पार्टी' में 'इश्क' का मतलब है - देश के हर नागरिक के लिए प्रेम, मानवीय करुणा और बराबरी की भावना। यानि एक तरह का राजनीतिक और सामाजिक 'सूफी इश्क', जो विभाजन की जगह एकता पर जोर देता है।

Gen Z, Cockroach Janata Party और नया 'प्रेम बनाम युद्ध' नैरेटिव

'इश्क करो पार्टी' की एंट्री ऐसे समय में हुई, जब एक और डिजिटल-युग की 'व्यंग्यात्मक' पार्टी पहले से सुर्खियों में थी 'कॉकरोच जनता पार्टी'। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभीजित दीपके हाल के दिनों में दिल्ली में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर चुके हैं। यह 'पार्टी' खुद को एक तंजिया, लेकिन राजनीतिक तौर पर एंगेज्ड प्लेटफॉर्म के रूप में पेश कर रही है और उसने काफी हद तक Gen Z और युवा सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान खींचा है। उनका प्लान है कि अपनी मांगों और विरोध-प्रदर्शनों को राज्यस्तर पर पूरे देश में फैलाया जाए।

इसी बीच, काटजू ने 'इश्क करो पार्टी' की घोषणा की। वे खुलकर कह रहे हैं कि युवा, खासकर Gen Z, आज एक ऐसे माहौल में बड़े हो रहे हैं जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीति पर हावी हैं । हेट स्पीच और ध्रुवीकरण सामान्य बात बन चुके हैं। जोश बहुत है, पर दिशा कई बार भटक जाती है। काटजू खुद को युवाओं के लिए एक वैकल्पिक 'पथप्रदर्शक' के रूप में पेश करते हैं और कहते हैं कि 'युद्ध नहीं, प्रेम करो' सिर्फ स्लोगन नहीं, बल्कि राजनीति में ह्यूमैनिटी और नैतिकता वापस लाने का संदेश है।

असली गेम प्लान: पार्टी या पॉलिटिकल व्यंग्य?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या काटजू सचमुच कोई गंभीर राजनीतिक पार्टी बना रहे हैं, या यह उनके पहले के प्रयोगों की तरह एक तीखा व्यंग्य है? वे पहले 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसी कल्पित पार्टी का जिक्र कई बार कर चुके हैं, जहां वे भ्रष्ट, अवसरवादी राजनीति पर तंज कसते थे। 'इश्क करो पार्टी' भी बहुत हद तक उसी सिलसिले की अगली कड़ी लगती है, लेकिन इस बार फोकस केवल तंज पर नहीं, बल्कि एक 'पॉजिटिव' वैल्यू यानी प्रेम और एकता पर रखा गया है। डिजिटल युग में जहां हर चीज कंटेंट, मीम और ट्रेंड में बदल जाती है, काटजू का असली दांव यही लगता है कि वे गंभीर मुद्दों पर बात करने के लिए व्यंग्य और प्रतीकवाद का इस्तेमाल कर रहे हैं। 'पार्टी' का फॉर्मेट चुनकर वे दिखाना चाहते हैं कि अगर नफरत की राजनीति पार्टी बन सकती है, तो 'इश्क' भी एक राजनीतिक विचार बन सकता है।

Markandey Katju Invite Mahua Moitra : महुआ मोइत्रा वाला एंगल, आमंत्रण, व्यंग्य या प्रयोग?

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इस पूरी कहानी का सबसे चर्चित हिस्सा वह स्क्रीनशॉट है, जो सोशल मीडिया पर घूमता रहा। उसमें दावा किया गया कि काटजू ने महुआ मोइत्रा को 'इश्क करो पार्टी' में शामिल होने का आमंत्रण दिया है। यह बात तुरंत सुर्खियों में इसलिए आ गई क्योंकि महुआ मोइत्रा अपनी आक्रामक, बेलौस और तीखी राजनीतिक शैली के लिए जानी जाती हैं। संसद और टीवी डिबेट्स में उनके भाषण अक्सर सरकार पर सीधे, कटु और धारदार हमले माने जाते हैं।

Who Is Markandey Katju: कौन हैं मार्कंडेय काटजू? न्यायाधीश, विद्रोही और व्यंग्यकार

'इश्क करो पार्टी' को समझने के लिए काटजू की पर्सनैलिटी और बैकग्राउंड पर एक नजर डालना जरूरी है, क्योंकि वही इस पूरे प्रयोग का टोन सेट करती है। 20 सितंबर 1946 को जन्मे मार्कंडेय काटजू कानून की गहरी परंपरा वाले परिवार से आते हैं। उनके पिता एस.एन. काटजू इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज थे। उनके दादा डॉ. कैलाश नाथ काटजू आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रहे, आजाद भारत में केंद्रीय गृह और रक्षा मंत्री रहे, और एक बड़े राजनेता व वकील माने जाते थे।

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डिजिटल प्रोवोकेशन: उम्र 80, अंदाज पूरी तरह ऑनलाइन

काटजू की मौजूदा रणनीति को अगर एक वाक्य में समझना हो तो वह है - 'डिजिटल प्रोवोकेशन'। वे X (पूर्व ट्विटर), फेसबुक और ब्लॉग्स के जरिए ऐसी बातें लिखते हैं, जो तुरंत बहस, ट्रोलिंग और वायरल कंटेंट बन जाएं। वे पारंपरिक राजनीतिक दल बनाने या चुनाव मैदान में उतरने की दिशा में नहीं दिखते, लेकिन राजनीतिक विमर्श को झकझोरते रहने की चिंता लगातार दिखती है। 'इश्क करो पार्टी' उनके इसी डिजिटल एजेंडा का नया एपिसोड है, जिसमें वे नफरत भरे नेरेटिव के बीच अचानक 'प्रेम करो' जैसी बात उछालकर सबको असहज कर देते हैं।

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