भोपाल हॉस्पिटल की आंखों देखी: 'मैंने 8 बच्चों की जान बचाई, लेकिन अपने ही भांजे को ना बचा पाया'

कमला नेहरू हॉस्पिटल में हुए इस दर्दनाक हादसे में जिन बच्चों की जान गई, उनमें रचना की जुड़वां बच्चियों में से एक बच्ची, रईस कुरैशी का बेटा और राशिद खान का भांजा भी शामिल था।

भोपाल, 10 नवंबर: सोमवार सुबह करीब 8 बजे का समय था, जब रचना ने अपनी जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया और मां बनने के बाद वो काफी खुश नजर आ रहीं थीं। दोपहर 3 बजे के आसपास रईस कुरैशी भी अपने बेटे को खेलता हुआ देखकर बाहर निकले थे। वहीं, उसी दिन शाम को राशिद खान खाना खाने के लिए बैठे थे... तभी खबर आई कि भोपाल के कमला नेहरू हॉस्पिटल में बच्चों के आईसीयू वार्ड में आग लग गई है और इन तीनों के जीवन में वो भयानक रात आई, जिसे शायद ही ये लोग कभी भूल पाएं।

हादसे में गई 12 बच्चों की जान

हादसे में गई 12 बच्चों की जान

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, कमला नेहरू हॉस्पिटल में हुए इस दर्दनाक हादसे में जिन बच्चों की जान गई, उनमें रचना की जुड़वां बच्चियों में से एक बच्ची, रईस कुरैशी का बेटा और राशिद खान का भांजा भी शामिल था। इस हॉस्पिटल में बच्चों के आईसीयू वार्ड में सोमवार को अचानक आग लग गई, जिसमें 4 मासूम बच्चों की मौत उसी दिन हो गई, जबकि 8 बच्चों ने 36 घंटों के बाद दम तोड़ दिया। मामले में कार्रवाई करते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने हॉस्पिटल के डायरेक्टर सहित तीन उच्च स्वास्थ्य अधिकारियों को उनके पद से हटा दिया है।

'बच्चों को बचाने के लिए डॉक्टर और नर्स दौड़ रहे थे'

'बच्चों को बचाने के लिए डॉक्टर और नर्स दौड़ रहे थे'

अपने भांजे को दफनाने के बाद राशिद खान की आंखों से आंसू नहीं थम रहे हैं। राशिद खान ने बताया, 'मैं घर पर था और खाना खाने के लिए बैठा ही था कि तभी मेरी बहन इरफाना का फोन आया और उसने मुझे हॉस्पिटल में लगी आग के बारे में बताया। मैं तुरंत हॉस्पिटल के लिए निकला और जब तीसरी मंजिल पर बने स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट पहुंचा तो देखा कि बच्चों को वहां से बाहर निकालने के लिए डॉक्टर और नर्स दौड़ रहे हैं।'

'सोचा था, अल्लाह मेरे भांजे की भी हिफाजत करेगा'

'सोचा था, अल्लाह मेरे भांजे की भी हिफाजत करेगा'

राशिद खान ने बताया, 'मैं अपने भांजे को भूलकर उन लोगों के साथ बच्चों को बचाने में जुट गया। मैंने सोचा कि अगर मैं इन बच्चों की जान बचा सका तो अल्लाह मेरे भांजे की भी हिफाजत करेगा। मैं उस वार्ड में लगी आग के बीच आठ नवजात बच्चों की जान बचाई, लेकिन अपने आठ दिन के भांजे राहिल को ना बचा सका। मेरी बहन की शादी के करीब 12 साल बाद राहिल का जन्म हुआ था।'

'वो सभी मासूम बच्चे थे, जिनकी जिंदगी बचानी जरूरी थी'

'वो सभी मासूम बच्चे थे, जिनकी जिंदगी बचानी जरूरी थी'

उस भयावह मंजर का जिक्र करते हुए राशिद खान ने आगे बताया, 'वहां आग की लपटें कम थीं, लेकिन पूरा वार्ड धुएं से भरा हुआ था। हमने तारों को काटना शुरू किया, बिजड़ी से जुड़े हुए उपकरण बाहर निकाले और बच्चों को दूसरे वार्ड में लेकर गए। लेकिन, इस अफरातफरी के माहौल में मैं अपने ही भांजे को नहीं देख पाया...वो सभी मासूम बच्चे थे, जिनकी जिंदगी बचानी जरूरी थी। आठ बच्चों को बचाने के बाद मैंने उस वक्त राहत की सांस ली, जब मुझे बताया गया कि सभी बच्चे वार्ड से निकाल लिए गए हैं।'

'सुबह 3 बजे मुर्दाघर में खत्म हुई मेरे भांजे की तलाश'

'सुबह 3 बजे मुर्दाघर में खत्म हुई मेरे भांजे की तलाश'

राशिद खान ने आगे बताया, 'करीब आधे घंटे बाद अब मैंने अपने भांजे को तलाशना शुरू किया और मेरी तलाश सुबह 3 बजे उस वक्त खत्म हुई, जब सबसे आखिर में मुझे बताया गया कि मैं एक बार मुर्दाघर में जाकर देखूं। मैं जब मुर्दाघर पहुंचा तो वहां मेरे भांजे के बराबर में एक और नवजात का शव रखा हुआ था, जो महज एक दिन की बच्ची थी और वो उन जुड़वां बच्चियों में से एक थी, जिनका जन्म सोमवार को ही हुआ था।'

'वेंटिलेटर को वहां से हटा देते तो आग शायद नहीं फैलती'

'वेंटिलेटर को वहां से हटा देते तो आग शायद नहीं फैलती'

रचना और उनके पति अंकुश के लिए सोमवार का दिन सबसे ज्यादा खुशी का दिन था, क्योंकि उनके जीवन में जुड़वां बच्चियां आईं थी। हालांकि दोनों बच्चियों का जन्म गर्भावस्था के सातवें महीने में ही हो गया था और इसलिए दोनों को ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत थी। हॉस्पिटल के बाहर अपनी बच्चे का शव लेने के लिए खड़े अंकुश ने बताया, 'हम लोग वार्ड के अंदर डॉक्टर से ये पूछने के लिए गए थे कि कौन सा इंजेक्शन लाना है कि तभी अचानक वेंटिलेटर में चिंगारी भड़की और हर कोई इधर-उधर भागने लगा। अगर हम लोग वेंटिलेटर को वहां से हटा देते तो आग शायद नहीं फैलती, लेकिन वहां सब लोग बस भागने लगे।'

'अस्पताल के कर्मचारियों ने लापरवाही दिखाई'

'अस्पताल के कर्मचारियों ने लापरवाही दिखाई'

वहीं, अंकुश के पिता नारायण यादव ने बताया, 'हम लोग आग बुझाने वाली मशीनों की तरफ दौड़े, लेकिन उनमें से ज्यादातर या तो खराब थी, या फिर खाली थी। अस्पताल में आग फैलने की सबसे बड़ी वजह वहां के कर्मचारियों की लापरवाही थी। वे लोग आग बुझाने की बजाय वहां से खुद अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। हम लोग प्राइवेट हॉस्पिटल नहीं जा सकते थे, क्योंकि वहां आईसीयू का एक दिन का खर्च 5 हजार रुपए था और इसलिए हम अपने बच्चों को इस सरकारी हॉस्पिटल में लेकर आए।'

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