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UP Medical Corruption: लोहिया अस्पताल में हुआ बड़ा फर्जीवाड़ा! मुर्दों के नाम पर होती रही दवाओं की कालाबाजारी

UP Medical Corruption: लखनऊ के लोहिया संस्थान में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। यहां मर चुके मरीजों के नाम पर लाखों रुपए की दवाएं निकालकर बाजार में बेच दी गईं। यह धांधली लंबे समय से चल रही थी, जिसमें संस्थान के कुछ फार्मासिस्ट और डॉक्टरों की मिलीभगत सामने आई है।

रिपोर्ट की मानें तो मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज के नाम पर यह घोटाला हुआ। मृत मरीजों के रिकॉर्ड से छेड़छाड़ कर उनके नाम पर दवाएं जारी की जाती रहीं और फिर उन्हें बाहर बेचा जाता रहा। कई मृतकों के परिवारजनों ने इस धोखाधड़ी की शिकायत भी की, लेकिन संस्थान के कुछ आला अधिकारी इस घोटाले पर पर्दा डालते रहे।

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जांच में पता चला है कि एक मरीज के नाम पर महज 4 से 5 दिनों में 500 से 1500 तक गोलियां निकाली गईं। मरीज की मौत के बाद भी उनके मेडिकल फंड से दवाएं उठाई जाती रहीं। इस फर्जीवाड़े से लाखों रुपए की हेराफेरी की गई है।

पारा के चंद्रोदय नगर निवासी नीलम के पति और हाईकोर्ट के वकील शिव प्रसन्ना सिंह का इलाज लोहिया संस्थान में चल रहा था। उनकी मृत्यु 15 फरवरी 2024 को हो गई, लेकिन इसके बावजूद उनके नाम पर 28 अगस्त से 13 सितंबर 2024 के बीच एक लाख 17 हजार रुपए की दवाएं निकाली गईं।

पीड़ित परिवारों ने की शिकायत

संतकबीर नगर के शुभम की मां स्वर्णकेशी देवी का 2023 में निधन हो गया था, लेकिन उनके नाम पर अक्टूबर 2024 में 85 हजार रुपए की दवाएं निकाली गईं। शुभम ने जब जांच करवाई तो यह घोटाला सामने आया। उन्होंने संस्थान के अधिकारियों से शिकायत भी की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

गोंडा के अजीज अहमद की मृत्यु 15 अगस्त 2024 को हो गई थी। लेकिन 5 और 8 अक्टूबर 2024 को उनके नाम से मुख्यमंत्री राहत कोष से 34 हजार रुपए की दवाएं निकाली गईं। इसी तरह जौनपुर के तारिक की मां रजिया बेगम का निधन दो साल पहले हो चुका था, लेकिन 23 अगस्त से 20 सितंबर 2024 के बीच उनके नाम पर 53 हजार रुपए की दवाएं निकाली गईं।

ऐसे चलता था फर्जीवाड़ा?

दवा जारी करने की प्रक्रिया में पहले डॉक्टर संस्थान के सॉफ्टवेयर पर ऑनलाइन दवा लिखते हैं। इसके बाद मरीज का पर्चा फार्मेसी में जाता है, जहां फार्मासिस्ट दवा जारी करता है। लेकिन इस घोटाले में मृत मरीजों के रिकॉर्ड में हेरफेर कर दवाएं निकाली गईं और फिर उन्हें बाजार में बेच दिया गया।

प्रशासनिक लापरवाही के कारण बढ़ता रहा घोटाला
संस्थान के कुछ आला अधिकारी भी इस खेल में शामिल दिख रहे हैं। यही वजह है कि शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जिन मरीजों की मृत्यु प्रमाण पत्र तक जारी हो चुका था, उनके नाम पर दवाएं निकाली जाती रहीं।

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