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भारत में विकराल हो रहा है बेरोजगारी का संकट

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 01 फरवरी। निरंजन कुमार के पिता बिहार में एक छोटे से किसान हैं. निरंजन उन सवा करोड़ लोगों में से हैं जिन्होंने एक साल पहले रेलवे की 35 हजार नौकरियों के लिए आवेदन किया था.

गणित से ग्रैजुएट 28 साल के निरंजन और उनके साथ तैयारी करने वाले उनके दोस्त का नाम शॉर्ट लिस्ट में भी नहीं था. उनकी सालों की मेहनत बर्बाद हो गई थी. यह वही लिस्ट थी जिसके बाद पिछले हफ्ते बिहार और उत्तर प्रदेश में छात्रों ने हिंसक प्रदर्शन किए थे.

पूरी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दसियों हजार छात्र सड़कों पर उतर आए थे. निरंजन कुमार और उनका दोस्त भी उनमें शामिल थे. छात्रों ने रेलमार्ग रोके, खाली गाड़ियों में आग लगा दी और पुलिस के साथ भी हाथापाई की.

बिहार की राजधानी पटना के काशी लॉज में अपने दोस्त के साथ बैठे कुमार कहते हैं, "सरकार हमारी जिंदगियों के साथ खेल रही है. वे सब चीजों को प्राइवेटाइज करना चाहते हैं. वे लोगों की भर्तियां करना ही नहीं चाहते."

गहराता जा रहा है संकट

भारत पिछले कई सालों से बेरोजगारी की समस्या जूझ रहा है. जब सरकारी भर्तियां निकलती हैं तो लाखों की संख्या में युवा उनके लिए आवेदन करते हैं. लेकिन हाल में रेलवे भर्तियों को लेकर जो गुस्सा उबला है, वह मौजूदा केंद्र और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार के लिए चिंता का विषय है क्योंकि राज्य में चुनाव होने हैं.

भारतीय जनता पार्टी सालाना एक करोड़ नौकरियों के वादे के साथ 2014 में सत्ता में आई थी. तब से भारत में बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है. कोरोनावायरस महामारी के चलते मार्च 2020 में तो यह 23.5 प्रतिशत पर पहुंच गई थी. मुंबई स्थित सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के आंकड़ों के मुताबिक तब से बेरोजगारी दर 7 प्रतिशत से ऊपर ही बनी हुई है.

आंकड़े दिखाते हैं कि दिसंबर में 5.2 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार थे और नौकरियां खोज रहे थे. इनमें वे लोग शामिल नहीं हैं जो अब नौकरियां खोज ही नहीं रहे हैं. भारत में नौकरी के योग्य यानी 15 से 64 वर्ष आयु के लोगों की संख्या एक अरब मानी जाती है. सीएमआईई के मुताबिक इनमें से सिर्फ 40.3 करोड़ ही नौकरीशुदा हैं.

'हमें संकट का पता है'

जाहिर है, विपक्षी नेता बेरोजगारी का मुद्दा चुनावों में भी उठा रहे हैं. इसी महीने कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक ट्वीट कर कहा, "बेरोजगारी का संकट बहुत गहरा गया है. इसे हल करना प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है. देश जवाब मांग रहा है, बहाने बनाना बंद कीजिए."

इस बारे में रॉयटर्स ने वित्त और श्रम मंत्रालयों से सवाल पूछे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल कहते हैं कि सरकार संकट से वाकिफ है और उद्योगों को उत्पादन के लिए लाभ देकर मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद अधिकारियों से कहा है कि रेलवे भर्तियों की समस्याओं को हल करें.

अग्रवाल कहते हैं, "हम इसे खारिज नहीं कर रहे हैं. हम नहीं कह रहे हैं कि बेरोजगारी कोई समस्या नहीं है. लेकिन हम ऐसे हल खोज रहे हैं जिनका असर लंबे समय तक रहे."

'अभी नहीं तो कभी नहीं'

इस बीच रेलवे जैसी नौकरियों की तैयारी में सालों बिता देने वाले युवा हताश हो रहे हैं. निरंजन कुमार कहते हैं, "मैंने एक साल से किराया नहीं दिया है. मेरे पिता ने कह दिया है कि इस साल के बाद वह मुझे मदद नहीं दे पाएंगे. मेरा परिवार हमेशा से मुश्किल झेलता रहा है. एक सरकारी नौकरी ही इन सारी मुश्किलों का हल है."

काशी लॉज में ऐसे दर्जनों युवा हैं जो बिहार के ग्रामीण इलाकों से आकर यहां रह रहे हैं और विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. कई तो पांच-पांच साल से यहां रह हे हैं. ऐसे ही अजय कुमार मिश्रा कहते हैं कि वह नरेंद्र मोदी के बड़े प्रशंसक थे और 2014 में जब रैली के लिए मोदी पटना आए थे तो उन्होंने समर्थन में नारे भी लगाए थे.

मिश्रा कहते हैं, "हमने उनके लिए अपना कलेजा निकाल कर रख दिया था. अब उन्हें हमारी बात सुननी ही होगी. युवा दर्द में हैं. क्या वह चाहते हैं कि हम भी चाय-पकौड़ा बेचें? शायद हमें यही करना पड़ेगा. हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है. जल्दी ही सरकारी नौकरियों के लिए हमारी उम्र निकल जाएगी."

मिश्रा कहते हैं कि अगले साल उनके पिता रिटायर हो रहे हैं और उससे पहले उन्हें नौकरी खोजनी है क्योंकि परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ जाएगी. वह कहते हैं, "बस अभी नहीं तो कभी नहीं. हमने एक क्रांति की शुरुआत की है जिसमें कोई नेता नहीं है और हर कोई नेता है क्योंकि हर कोई प्रभावित है."

वीके/एए (रॉयटर्स)

Source: DW

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