Shibu Soren: 'धनकटनी आंदोलन' से मुख्यमंत्री तक का सफर! कहां तक पढ़े थे शिबू सोरेन?
Shibu Soren Academic Profile: झारखंड के 'गुरुजी' शिबू सोरेन अब हमारे बीच नहीं रहे। 81 साल की उम्र में उनका निधन पूरे राज्य ही नहीं, बल्कि देश के लिए एक बड़ी क्षति है। शिबू सोरेन ने अपने संघर्ष, जिद और जमीनी आंदोलन से खुद को आदिवासी समाज की आवाज बना दिया। झारखंड की राजनीति में शिबू सोरेन सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक ऐसा अध्याय हैं, जिसने संघर्ष और जमीनी नेतृत्व की नई परिभाषा लिखी।
साधारण परिवार में जन्म लेने वाले शिबू सोरेन ने पिता की हत्या के बाद उन्होंने किताबों के बजाय समाज की लड़ाई को अपना हथियार बना लिया। महाजनों के खिलाफ 'धनकटनी आंदोलन' से लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना और तीन बार मुख्यमंत्री बनने तक उनका सफर बताता है कि असली शिक्षा डिग्री से नहीं, बल्कि जमीनी अनुभव और हौसले से मिलती है।

संघर्ष से लिखी अपनी सफलता की कहानी!
झारखंड की राजनीति के सबसे बड़े नाम और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक शिबू सोरेन का जीवन किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है। साधारण पढ़ाई करने के बाद भी उन्होंने अपने संघर्ष और नेतृत्व से आदिवासी समाज को नई दिशा दी।
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शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के हजारीबाग जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन गांव के स्कूल में शिक्षक थे और आदिवासी समाज में शिक्षा का संदेश फैलाने वाले गिने‑चुने लोगों में शामिल थे। लेकिन 1957 में जब शिबू सोरेन मात्र 13 साल के थे, उनके पिता की हत्या महाजनों और सूदखोरों ने कर दी। यह घटना उनके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुई।
पढ़ाई छूट गई, शुरू हुआ संघर्ष
शिबू सोरेन ने हजारीबाग के गोला हाई स्कूल से 10वीं तक पढ़ाई की थी। पिता की हत्या के बाद वे आगे पढ़ाई नहीं कर पाए और अपने समाज के हक की लड़ाई के लिए संघर्ष के रास्ते पर निकल पड़े।
'धनकटनी आंदोलन' से पहचान
शिबू सोरेन ने आदिवासियों को शोषण से बचाने के लिए महाजनों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन को 'धनकटनी आंदोलन' कहा गया। इसमें आदिवासी खेतों में जाकर धान काटते और उसे गरीबों में बांट देते। इसी वजह से लोग उन्हें प्यार से 'दिशोम गुरु' यानी 'देश का गुरु' कहने लगे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना
1972 में शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) बनाया। यह संगठन झारखंड राज्य के निर्माण की लड़ाई का सबसे बड़ा चेहरा बना।
राजनीतिक सफर
शिबू सोरेन ने 1980 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीता। इसके बाद वे कई बार सांसद बने और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे। केंद्र सरकार में कोयला मंत्री के तौर पर भी उन्होंने काम किया।
शिक्षा कम, हौसला ज्यादा
शिबू सोरेन भले ही सिर्फ 10वीं तक पढ़े थे, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ, संघर्षशील स्वभाव और समाज के लिए समर्पण ने उन्हें 'गुरुजी' बना दिया। उन्होंने दिखा दिया कि बड़ी डिग्री नहीं, बल्कि मजबूत इरादे ही इतिहास रचते हैं।
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