Twisha Sharma का क्या नहीं होगा दूसरा पोस्टमार्टम? लाश को -80°C में क्यों कोर्ट ने सुरक्षित रखने को कहा?
Twisha Sharma Death Mystery: भोपाल की अदालत ने 33 वर्षीय ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत के मामले में परिवार की अहम मांग को खारिज कर दिया है। परिवार ने दिल्ली के AIIMS में दूसरा पोस्टमार्टम और बेहतर फॉरेंसिक जांच की मांग की थी, लेकिन भोपाल कोर्ट ने इस याचिका को ठुकरा दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि AIIMS दिल्ली में दूसरा पोस्टमार्टम और मृतक के फॉरेंसिक विश्लेषण के लिए दिए गए निर्देश इस आदेश द्वारा खारिज किए जाते हैं।
यह फैसला शादी के महज 5 महीने बाद 12 मई 2026 को कटारा हिल्स स्थित ससुराल में फांसी के फंदे पर लटकी मिली ट्विशा की मौत के मामले को नया मोड़ देता है। परिवार अब न्याय की अंतिम उम्मीद के साथ टूटा हुआ महसूस कर रहा है, जबकि शव AIIMS भोपाल की मोर्चरी में सड़ने की कगार पर पहुंच चुका है। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्यों कोर्ट ने दिया चौंकाने वाला फैसला?

Twisha Sharma Case: 12 मई की रात को क्या-क्या हुआ? दोनों का पक्ष क्या?
ट्विशा शर्मा, नोएडा निवासी, पूर्व मिस पुणे और MBA ग्रेजुएट, दिसंबर 2025 में भोपाल के वकील समर्थ सिंह से शादी के बाद भोपाल शिफ्ट हुई थीं। दोनों की मुलाकात डेटिंग ऐप पर हुई थी। शादी के पांच महीने बाद 12 मई की रात को उन्हें घर में फांसी पर लटका पाया गया। पुलिस ने शुरू में इसे आत्महत्या का मामला माना, लेकिन ट्विशा के परिवार ने इसे हत्या करार दिया।
परिवार का आरोप है कि ट्विशा को दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, मारपीट हुई और गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने व्हाट्सएप मैसेजेस और कॉल रिकॉर्ड्स का हवाला दिया, जिसमें ट्विशा ने अपनी मां और भाई (सेना अधिकारी) को 'मेरी जिंदगी नर्क हो गई है', 'मुझे यहां से निकाल लो, वे मुझे जीने नहीं देंगे' जैसे संदेश भेजे थे। परिवार का दावा है कि शव पर चोटों के निशान थे, जो पहले पोस्टमार्टम में ठीक से दर्ज नहीं हुए।
दूसरी तरफ, ससुराल पक्ष (समर्थ सिंह और उनकी मां, रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह) ने ट्विशा पर ड्रग एडिक्शन और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के आरोप लगाए हैं। गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत मिल चुकी है, जबकि समर्थ सिंह फरार बताए जा रहे हैं।
Twisha Sharma Post-mortem: पहले पोस्टमार्टम में क्या रहीं खामियां? क्यों उठे सवाल?
AIIMS भोपाल में 13 मई को हुए पहले पोस्टमार्टम में मौत का कारण फांसी बताया गया। रिपोर्ट में मल्टीपल एंटीमॉर्टम इंजरी (ब्लंट फोर्स) का भी जिक्र है, लेकिन नशा को रूल आउट किया गया। महत्वपूर्ण खामी यह रही कि फांसी में इस्तेमाल हुई बेल्ट को पोस्टमार्टम के दौरान डॉक्टर्स को उपलब्ध ही नहीं कराया गया, जिससे लिगेचर मार्क्स की वैज्ञानिक तुलना नहीं हो सकी। ये खामियां परिवार के अविश्वास को और बढ़ाती हैं। उन्होंने दिल्ली AIIMS में दूसरा पोस्टमार्टम की मांग की, ताकि स्वतंत्र और बेहतर सुविधाओं वाले केंद्र में जांच हो सके।
कोर्ट का फैसला: क्या कहा अदालत ने?
भोपाल कोर्ट ने परिवार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि दूसरा पोस्टमार्टम दिल्ली AIIMS में कराने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। हालांकि, शव के संरक्षण पर कोर्ट ने कुछ निर्देश दिए।
शव वर्तमान में AIIMS भोपाल की मोर्चरी में -4°C तापमान पर रखा गया है, जबकि लंबे समय तक संरक्षण के लिए -80°C की सुविधा जरूरी है, जो भोपाल में उपलब्ध नहीं है। कोर्ट ने SHO कटारा हिल्स थाना को निर्देश दिया कि वे मध्य प्रदेश के अन्य चिकित्सा संस्थानों और महानगरों में बेहतर कोल्ड स्टोरेज सुविधा की जानकारी तुरंत लें और रिपोर्ट पेश करें।
पुलिस की भूमिका: भोपाल पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने स्पष्ट किया कि पुलिस को दूसरे पोस्टमार्टम पर कोई आपत्ति नहीं है। परिवार ने उनसे मुलाकात भी की थी। फिर भी अंतिम फैसला कोर्ट पर निर्भर था, जो अब आ चुका है। पुलिस ने परिवार को पत्र लिखकर शव तुरंत ले जाने की अपील की है, क्योंकि सड़न शुरू हो चुकी है।
फॉरेंसिक साइंस और कानूनी पहलू: दूसरा पोस्टमार्टम क्यों मायने रखता है?
भारतीय कानून में दूसरे पोस्टमार्टम की अनुमति अदालत दे सकती है, खासकर जब पहली जांच में खामियां हों या पारदर्शिता पर सवाल उठें। फॉरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार, देरी से दूसरा पोस्टमार्टम मुश्किल हो जाता है क्योंकि ऊतकों में बदलाव आ जाते हैं। हालांकि, उन्नत सुविधाओं वाले केंद्र (जैसे AIIMS दिल्ली) में हिस्टोपैथोलॉजी, टॉक्सिकोलॉजी और DNA विश्लेषण से अतिरिक्त सबूत मिल सकते हैं।
इस मामले में बेल्ट न उपलब्ध कराने जैसी खामी जांच की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है। SIT जांच चल रही है, जिसमें CCTV, कॉल रिकॉर्ड्स और डिजिटल सबूत शामिल हैं। परिवार CBI जांच और MP से बाहर ट्रांसफर की भी मांग कर रहा है।
ट्विशा शर्मा की लाश -80°C तापमान पर कोर्ट ने क्यों सुरक्षित रखने का निर्देश दिया?
'ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में, उनके परिवार के वकील अंकुर पांडे ने कहा, 'कोर्ट ने हमारी अर्जी को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने दोबारा पोस्टमॉर्टम की हमारी अर्जी को तो नामंजूर कर दिया, लेकिन SHO को निर्देश दिया है कि वे शव को सुरक्षित रखें और जहां तक संभव हो, मध्य प्रदेश में ही शव को -80°C तापमान पर सुरक्षित रखा जाए... उनके इस आदेश से ऐसा लगता है कि वे वास्तव में दूसरा पोस्टमॉर्टम करवाना चाहते हैं... पीड़ित परिवार से मुलाकात करने के बाद हम आगे की कानूनी कार्रवाई तय करेंगे।'
परिवार की पीड़ा और सामाजिक संदर्भ
ट्विशा के पिता नवनिधि शर्मा का कहना है कि वे अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शव लेने से इनकार का मतलब है कि अंतिम संस्कार अभी नहीं हो सका। यह स्थिति परिवार के लिए मानसिक रूप से अत्यंत कष्टदायक है।
केस बड़े सामाजिक मुद्दों को छूता है। इसमें दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, शादी के बाद महिलाओं की स्थिति और प्रभावशाली परिवारों (यहां रिटायर्ड जज) वाले मामलों में जांच की निष्पक्षता। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी संज्ञान लिया है। पूर्व सैनिकों और सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शन किए हैं। दूसरी तरफ, ससुराल पक्ष प्रभावशाली वकीलों और न्यायिक पृष्ठभूमि का हवाला देकर चरित्र हनन के आरोप लगा रहा है। यह 'उसकी कहानी vs हमारी कहानी' का क्लासिक मामला बन गया है।
आगे क्या? संभावित परिदृश्य और चुनौतियां
- शव का संरक्षण: कोर्ट के निर्देश के बाद पुलिस बेहतर सुविधा तलाश रही है। अगर नहीं मिली तो परिवार पर दबाव बढ़ेगा।
- जांच: SIT रिपोर्ट और फॉरेंसिक सबूतों पर केस की दिशा निर्भर करेगी। अगर चोटों और मैसेजेस को मजबूत सबूत माना गया तो IPC की धाराएं (304B, 498A आदि) मजबूत होंगी।
- राजनीतिक-कानूनी प्रभाव: मध्य प्रदेश में महिला सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में अपील का रास्ता परिवार के पास अभी भी है।
न्याय की राह लंबी और कठिन
भोपाल कोर्ट के इस फैसले ने ट्विशा शर्मा के परिवार की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, लेकिन लड़ाई खत्म नहीं हुई। पहला पोस्टमार्टम, गुम बेल्ट, चोटों के निशान, मैसेजेस और फरार आरोपी, ये सबूत जांच एजेंसियों के लिए चुनौती हैं। ट्विशा की मौत महज एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था की परीक्षा भी है। क्या प्रभावशाली पृष्ठभूमि वाले परिवार में निष्पक्ष जांच संभव है? क्या देरी हुई फॉरेंसिक जांच न्याय दिला पाएगी? क्या बेटियों की शादी के बाद सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समाज और कानून और सख्त होंगे? शव का मुद्दा जल्द सुलझना चाहिए, ताकि ट्विशा को अंतिम विदाई मिल सके। लेकिन सच्चाई की तलाश जारी रहेगी। यह केस एक बार फिर याद दिलाता है कि 'इंसाफ' कभी आसान नहीं होता, खासकर तब जब शक्तियां सामने हों।













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