राजस्थान की इन महिलाओं ने 6 गांवों को कैसे बनाया शराब मुक्त? जानिए शराबबंदी का लोकतांत्रिक तरीका

राजसमंद, 15 नवंबर। राजस्थान में शराब की दुकानें वर्तमान में नीलामी के जरिए आवंटित की जाती हैं। इससे पहले लॉटरी निकला करती थी। शराब के ठेके खोले कैसे जाते हैं? यह तो हर किसी को पता है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि लोकतांत्रित तरीक से अपने गांव में शराब की बिक्री पर पूर्णतया प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है?

भीम तहसील के गांवों में शराबबंदी

भीम तहसील के गांवों में शराबबंदी

राजस्थान के राजसमंद जिले की भीम तहसील के आधा दर्जन गांवों को महिलाओं ने अपने दम पर शराब मुक्त कर दिया। महिलाओं ने शराब की दुकानें हटवाने के लिए आवाज उठाई। विरोध झेलने के बावजूद डटीं रहीं और कई सालों तक संघर्ष किया। आखिर में शराबबंदी की मुहिम को अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लिया।

सबसे पहले 2016 में हुई शराबबंदी

सबसे पहले 2016 में हुई शराबबंदी

राजसमंद की भीम तहसील के गांवों में शराब की ​बिक्री बंद होने का जिक्र हम ​इसलिए कर रहे हैं कि यहां पर साल 2016 में गांव काछबली से नशा मुक्त बनाने की मुहिम शुरू हुई, जो साल 2021 में बरार गांव तक पहुंच गई। इस अवधि में छह गांव शराब मुक्त हो गए। ताजा शराबबंदी ग्राम पंचायत बरार में 13 नवंबर को हुई है।

कौनसे गांव में कब हुई शराबबंदी?

कौनसे गांव में कब हुई शराबबंदी?

1. काछबली 2016

2. मंडावर 2018
3. बरजाल 2017
4. थानेटा 2021
5. बरार 2021
6. हामेला की वैर 2021

काछबली कैसे बना पहला शराब मुक्त गांव?

काछबली कैसे बना पहला शराब मुक्त गांव?

वन इंडिया से बातचीत में राजसमंद में गांधी सेवा सदन के सचिव डॉक्टर महेन्द्र कर्णावत बताते हैं कि शराब से समाज को होने वाले नुकसान को देखते हुए 26 जनवरी 2016 को काछबली में शराब पर प्रतिबंध लगाने का शंखनाद किया गया था। शुरुआत में शराब माफिया ने डराया-धमकाया, मगर हम अपनी मुहिम से पीछे नहीं हटे।

नतीजा यह रहा कि हमने काछबली गांव में एक फरवरी 2016 से शराबबंदी के खिलाफ अभियान चलाया और अगले माह मार्च में वोटिंग के माध्यम से गांव काछबली से शराब का ठेका हटवाकर इसे राजस्थान का पहला शराब मुक्त गांव बना दिया। यहां आज तक शराब की दुकान नहीं खुली।

काछबली से बरार तक शराबंदी का सफर

काछबली से बरार तक शराबंदी का सफर

काछबली का शराब मुक्त गांव बनाने के बाद मंडावर, बरजाल, थानेटा व बरार ग्राम में शराबबंदी का काम हाथ में लिया गया। शराबबंदी की मुहिम से जुड़े ग्रामीणों को उस वक्त निराशा हाथ लगी जब बरजाल में शराब की दुकान चालू रखने या बंद करवाने के संबंध मतदान करवाया गया तो शराबबंदी के पक्ष वाले लोग हार गए। यानी शराब की दुकान चालू रखने के पक्ष में अधिक वोट पड़े।

 बरजाल सत्याग्रह का हुआ असर

बरजाल सत्याग्रह का हुआ असर

डॉ. महेंद्र करणावत कहते हैं कि बरजाल ग्राम पंचायत में लोकतांत्रिक तरीके से हार जाने के बाद सामाजिक स्तर पर ​नियम बनाए गए और तय किया गया कि गांव बरजाल में आवंटित होने वाली शराब की दुकान को खोलने के लिए कोई अपनी जमीन देगा तो उस पर 5 लाख रुपए जुर्माना लगाया जाएगा।

शराब पीकर गाली-गलौच, मारपीट करता पाया जाने पर 25 हजार और शादी समारोह में शराब परोसने पर 50 हजार रुपए का जुर्माना तय किया। इस व्यवस्था को बरजाल सत्याग्रह का नाम दिया गया। असर यह रहा कि गांव से अपने आप शराब बंद हो गई। दुकान खोलने के लिए जमीन नहीं मिलने पर शराब ने ठेका आवंटित करना ही बंद कर दिया।

पढ़ी-लिखी महिला सरपंचों ने कर दिखाया कमाल

पढ़ी-लिखी महिला सरपंचों ने कर दिखाया कमाल

राजसमंद जिले की भीम तहसील के गांवों को शराब मुक्त बनाने के श्रेय महिला शक्ति को दिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं। क्योंकि शराबबंदी के अभियान में 90 फीसदी भागीदारी महिलाओं की थी। खास बात यह है कि इन गांवों की बागडोर पढ़ी-लिखी महिला सरपंचों के हाथ में थी। गांव काछबली में दसवीं पास गीता रावत, गांव मंडावर में प्यारी रावत एमए बीएड, गांव बरार में पंकजा सिंह एमबीए और थानेट में दीक्षा चौहान सरपंच हैं।

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     बरार ग्राम पंचायत ने पांच साल बाद जीती जंग

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    ग्राम पंचायत बरार की सरपंच पंकजा एसपी सिंह कहती हैं कि पहले बरार व हामेला की वैर एक ही ग्राम पंचायत हुआ करती थीं। साल 2017 में हमने बरार ग्राम पंचायत को शराब मुक्त बनाने की ठानी तो प्रथम चरण में कुल मतदाताओं के बीस फीसदी मतदाताओं के हस्ताक्षर चाहिए थे, मगर हमारे 150 हस्ताक्षर कम पड़ गए।

    पंकजा एसपी सिंह के नेतृत्व में महिलाओं ने फिर प्रयास किया। पांच साल तक शराबबंदी के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इस बीच बरार व हामेला की वैर अलग अलग ग्राम पंचायत हो गई। अब 13 नवंबर को दोनों ग्राम पंचायत में वोटिंग के जरिए दोनों गांवों में शराबंदी करवाई। इस खुशी में महिलाओं ने देर रात तक जश्न भी मनाया।

    बरार में शराबबंदी के खिलाफ 3326 वोट

    बरार में शराबबंदी के खिलाफ 3326 वोट

    सरपंच पंकजा एसपी सिंह बताती हैं कि 2014 की वोटर लिस्ट के हिसाब से 5632 मतदाता हैं। 13 नवंबर को गांव के राजीव गांधी सेवा केंद्र में वोटिंग हुई तो 3624 मतदाताओं ने वोट डाले, जिनमें से 3326 ने शराबबंदी के पक्ष में वोट डाले। यहां महिलाओं का मतदान 83 फीसदी रहा। अब 1 अप्रैल 2022 से बरार व हामेला की वैर से शराब की दुकान का आवंटन नहीं होगा।

    क्या है शराबबंदी का लोक​तांत्रिक तरीका?

    क्या है शराबबंदी का लोक​तांत्रिक तरीका?

    राजस्थान आबकारी डिप्टी कमिश्नर नूर मोहम्मद कहते हैं कि किसी भी गांव में शराबबंदी के लिए कानूनी प्रावधान है। इस​के लिए The Rajasthan Excise (Closure of Country Liquor Shop by Local Option) Rules, 1975 बना हुआ है। इसके तहत ग्राम पंचायत के कुल 20 प्रतिशत मतदाताओं द्वारा प्रस्ताव करना पड़ता है। फिर एसडीएम या कलेक्टर को ज्ञापन देते हैं, जो आबकारी आयुक्त के पास जाता है। वे इस पर वोटिंग करवाने की राय देते हैं या मामला सरकार के पास भेजे देते हैं।

    शराबबंदी की प्रक्रिया में अनिवार्यता

    शराबबंदी की प्रक्रिया में अनिवार्यता

    प्रथम चरण

    पहले चरण में ग्राम पंचायत की मतदाता शामिल 20 प्रतिशत मतदाताओं के हस्ताक्षर करवाए जाते हैं। हस्ताक्षरों का सत्यापन करवाया जाता है।

    सत्यापन के बाद शराबबंदी के लिए सीएम ने नाम एसडीएम या जिला कलेक्टर को ज्ञापन दिया जाता है।


    अंतिम चरण

    अंतिम चरण में शराबबंदी को लेकर गांव में मतदान करवाया जाता है। लोगों से शराबबंदी के पक्ष व विपक्ष में वोटिंग करवाई जाती है। उसी आधार पर फैसला होता है।

    शराबबंदी के पक्ष में ज्यादा वोट पड़ने पर वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक तो यही शराब की दुकान जारी रहती है, मगर नए वित्तीय वर्ष में शराब की दुकान आवंटित ही नहीं की जाती।

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