शर्मसार इंसानियत : गैरों के कंधो पर निकली अर्थी, जहन से कंगाल निकले करोड़पति भाई
इंसानियत को आईना दिखाने वाली यह हकीकत मप्र के डिंडौरी जिले की है। जहाँ आधुनिकता के माहौल में प्रदीप सोनी के परिवार को जिल्लत भरी जिंदगी से गुजरना पड़ा। Embarrassed Humanity: The meaning came out on the shoulders
डिंडौरी, 23 जून: कहते है जब दीवारों में दरार पड़ती है तो दीवारें गिर जाती है, लेकिन जब रिश्तों में दरार पड़ती है तो कभी न गिरने वाली दीवारें बन जाती हैं। ऐसी ही कभी न गिरने वाली रिश्तों की दीवार डिंडौरी में उस वक्त बनी जब मुफलिसी का शिकार एक युवती की अंतेष्टि के लिए उसके अपनों ने मुहं मोड़ लिया। उसकी अर्थी को कंधा देने चार नहीं, बल्कि संवेदनाओं के सैकड़ों हाथ उठ गए। शादीशुदा मृतक लड़की को उसके अपनों ने यह सजा सिर्फ इसलिए दी क्योकि उसके पिता ने अन्तर्रजातीय विवाह किया था।

इंसानियत पर अपनों का सितम
इंसानियत को आईना दिखाने वाली यह हकीकत मप्र के डिंडौरी जिले की है। जहाँ आधुनिकता के माहौल में प्रदीप सोनी के परिवार को जिल्लत भरी जिंदगी से गुजरना पड़ा। कहने के लिए भले हम चाँद पर पहुँच गए, लेकिन इलाके के लोगों को प्रदीप के 11 भाइयों के परिवार के ख्यालात पाताल के कीचड़ से कम नहीं लगते। प्रदीप की शादीशुदा बेटी की मौत हो गई और उसकी अंतेष्टि के लिए परिवार के चार कंधे नसीब नहीं हुए। पूजा काफी दिनों से गंभीर बीमारी से ग्रसित थी, उसके पिता प्रदीप का भी निधन हो चुका था। पूजा को यह सजा उसके अपनों ने सिर्फ इसलिए दी क्योकि उसके पिता ने घर वालों की मर्जी के बगैर दूसरी जाति में शादी कर ली थी। तब से प्रदीप और उसके घर वालों के बीच उठी नफरत की दीवार बढ़ती ही गई।

प्रदीप की मौत के बाद बिगड़ती गई माली हालत
बताया गया कि प्रदीप ने अपने परिवार की मर्जी के बगैर दूसरी जाति में अलका से प्रेम विवाह किया था। उसकी दो बेटियां थी, सभी भोपाल में रहते थे। दो बेटियों में पूजा की शादी होने के बाद वह ससुराल पक्ष से प्रताड़ित थी। जिससे त्रस्त पूजा बाद में अपनी बहन और माँ के साथ डिंडौरी चली आई। यहाँ उसकी तबियत और बिगड़ती चली गई। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण सही इलाज भी संभव नहीं हो सका। आखिर में उसने दम तोड़ दिया। इस दौरान प्रदीप की पत्नी ने अपने रिश्तेदारों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन सभी पत्थर दिल निकले।

न अंतेष्टि के लिए पैसे और न ही चार कंधे
पूजा की बीमारी फिर उसकी मौत के बाद स्थानीय लोगों ने जो नजारा देखा वह मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने के लिए काफी था। पूजा के रिश्तेदारों में किसी ने भी उसकी अंतेष्टि करने की जहमत नहीं उठाई। माँ और बहिन के बस में नहीं था, कि वह पूजा का ठीक ढंग से अंतिम संस्कार करा सकें। जैसे ही पड़ोसियों को इस बात की खबर लगी तो मदद के लिए सैकड़ों हाथ उठ गए। जो जिम्मेदारी प्रदीप के भाइयों को निभाना था, उससे कही ज्यादा अपनापन गैरों ने दिखाया। क्षेत्रीय लोगों ने आपसी सहयोग से पूजा की न सिर्फ अंतेष्टि कराई, बल्कि उसको चार मजबूत कंधे भी नसीब हुए। जिस पर आज पूरा डिंडौरी नाज कर रहा है।

आगे भी परिवार की मदद का संकल्प
पूजा के लिए गैर होकर भी अपने बने डिंडौरी के उन लोगों ने आगे भी परिवार की मदद करने का संकल्प लिया है । पूजा की माँ अलका कहना था कि मदद करने वाले ये लोग ईश्वर के फ़रिश्ते से कम नहीं, क्योकि उनके अपनों का भरा परिवार होने के बाबजूद आखरी पड़ाव में भी रिश्ता निभाने नहीं आया। जबकि उनके पास करोड़ों की दौलत है और किसी भी तरह की कोई कमी नहीं ।
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