OI Explained: एशिया समेत पूरी दुनिया में उथल-पुथल, फिर भारत में कैसे स्थिर रहे हालात? मोदी ने ऐसा क्या किया?
OI Explained: पिछले 12 सालों में दुनिया की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। कई देशों में सरकारें बदलीं, राजनीतिक संकट पैदा हुए, तख्तापलट हुए, आर्थिक चुनौतियों ने सरकार ढहाई और कुछ जगहों पर लोकतांत्रिक संस्थाएं भी कमजोर होती नजर आईं। लेकिन इसी दौर में भारत ने लगातार नीतिगत स्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखी।
10 जून 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार नेतृत्व से जुड़ा एक नया रिकॉर्ड बनाया। इसे सिर्फ एक नेता की व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे, आर्थिक मजबूती और रणनीतिक स्थिरता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है। जब दुनिया के कई बड़े देश और भारत के पड़ोसी राजनीतिक अस्थिरता, संवैधानिक संकट और सत्ता संघर्षों से जूझ रहे हैं, तब भारत का अनुभव एक उदाहरण के रूप में सामने आ रहा है कि लोकतांत्रिक निरंतरता किसी देश को कैसे महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।

बांग्लादेश: तख्तापलट और लोकतंत्र का नया इम्तिहान
बांग्लादेश का हालिया राजनीतिक इतिहास दिखाता है कि जब राजनीतिक संस्थाएं सिर्फ एक जगह सेंट्रलाइज्ड हो जाती हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर पड़ती हैं, तो जनता के अंदर पनप रही बेचैनी अचानक विस्फोटक रूप ले सकती है। शेख हसीना सरकार का पतन और उसके बाद लगभग डेढ़ साल का यूनुस काल यह साबित करता है कि मजबूत और स्वतंत्र संस्थागत ढांचे के बिना राजनीतिक स्थिरता लंबे समय तक टिक नहीं सकती।
अब तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सत्ता में है और देश को नए लोकतांत्रिक रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर रही है। लेकिन उनके सामने टूटी हुई संस्थाओं को दोबारा मजबूत करना और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना बड़ी चुनौती है। भारत के लिए बांग्लादेश में स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, व्यापार और आतंकवाद विरोधी सहयोग सीधे तौर पर क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए हैं।
पाकिस्तान: राजनीतिक संघर्ष, आर्थिक दबाव और सैन्य शासन
पाकिस्तान की स्थिति बताती है कि जब सेना और राजनीतिक संस्थाओं के बीच लगातार टकराव बना रहता है, तो शासन व्यवस्था केवल क्राइसिस मैनेजमेंट तक सीमित होकर रह जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की लोकप्रियता और उनकी गिरफ्तारी के बाद पैदा हुआ आक्रोश, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की गठबंधन सरकार के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है। दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की शर्तों के कारण सरकार को कई ऐसे आर्थिक फैसले लेने पड़ रहे हैं जो जनता के बीच लोकप्रिय नहीं हैं। इससे लोगों में असंतोष और बढ़ रहा है। लंबे समय के लिए आर्थिक और राजनीतिक योजना की कमी के कारण पाकिस्तान आर्थिक और सुरक्षा दोनों मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। भारत के नजरिए से देखें तो एक अस्थिर और न्यूक्लियर हथियारों से लैस पड़ोसी हमेशा रणनीतिक चिंता का विषय रहेगा।
नेपाल: बार-बार बदलती सरकारें और नई उम्मीद
नेपाल पिछले 14 सालों में 15 सरकारें बदल चुका है। यह राजनीतिक अस्थिरता का बड़ा उदाहरण माना जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों के आंदोलन ने केपी शर्मा ओली सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। इसके बाद 35 साल के बालेंद्र "बालेन" शाह के नेतृत्व में एक नई राजनीतिक उम्मीद उभरी। हालांकि उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सामने कई चुनौतियां हैं। उन्हें एक तरफ ओली समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ युवाओं की बेरोजगारी और भारत-चीन संतुलन जैसे बड़े मुद्दे भी मौजूद हैं। नेपाल की स्थिति यह दिखाती है कि केवल नया चेहरा लाने से समस्याएं खत्म नहीं होतीं, बल्कि संरचनात्मक और आर्थिक सुधार भी जरूरी होते हैं।
म्यांमार: सिविल वॉर और बेबसी
म्यांमार इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद शुरू हुआ गृहयुद्ध अभी भी जारी है। सेना प्रमुख मिन आंग हलिंग का राष्ट्रपति बनना भी विवादों में घिरा हुआ है। सैन्य भर्ती कानून के डर से बड़ी संख्या में युवा देश छोड़ रहे हैं। कई क्षेत्रों में सरकार का कंट्रोल भी कमजोर पड़ चुका है। एक्सपर्ट्स की मानें तो म्यांमार धीरे-धीरे एक "विफल राष्ट्र" (Failed State) की दिशा में बढ़ रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इससे शरणार्थी संकट बढ़ सकता है और उत्तर-पूर्वी राज्यों में सक्रिय विद्रोही संगठनों को भी फायदा मिल सकता है।
अफगानिस्तान: बंदूक की ताकत पर टिका शासन
अफगानिस्तान फिलहाल तालिबान के कंट्रोल में है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से लगभग पूरी तरह अलग-थलग पड़ा हुआ है। कंधार और काबुल के बीच वैचारिक मतभेद मौजूद हैं। महिलाओं के अधिकारों और मानवाधिकारों पर लगे प्रतिबंधों ने देश को पूरी दुनिया के सामने कटघरे में दिया है। हालांकि किसी भी देश ने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन सैन्य कंट्रोल पूरी तरह उनके हाथ में है। अफगानिस्तान में अभी तक कोई स्थायी संविधान भी नहीं है, जिससे भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। भारत के लिए यहां सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद के खतरे को सीमित रखना और जरूरतमंद लोगों तक मानवीय सहायता पहुंचाना है।
श्रीलंका: आर्थिक संकट से धीरे-धीरे वापसी
2022 के बड़े आर्थिक संकट के बाद श्रीलंका अब धीरे-धीरे सुधार की राह पर लौट रहा है। राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके और प्रधानमंत्री हरिनी अमरसूर्या के नेतृत्व वाली सरकार ने लोगों में नई उम्मीद जगाई है। हालांकि भ्रष्टाचार विरोधी वादों के बावजूद सरकार को IMF की कड़ी शर्तें लागू करनी पड़ रही हैं। यह स्थिति दिखाती है कि आर्थिक वास्तविकताएं राजनीतिक नारों से कहीं ज्यादा मुश्किल होती हैं। भारत ने संकट के दौरान श्रीलंका को आर्थिक सहायता देकर उसे पूरी तरह ढहने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
दक्षिण कोरिया: मजबूत लोकतंत्र भी संकट से अछूते नहीं
दक्षिण कोरिया जैसे विकसित लोकतंत्र में भी राजनीतिक संकट देखने को मिला। राष्ट्रपति यूं सुक येओल द्वारा मार्शल लॉ लगाने की कोशिश और उसके बाद महाभियोग तथा आजीवन कारावास की सजा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। इस घटना ने दिखाया कि लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हों तो वे किसी भी अधिनायकवादी (Totalitarian) कदम को रोक सकती हैं। अब दक्षिण कोरिया राजनीतिक विश्वास बहाल करने की प्रक्रिया से गुजर रहा है।
कनाडा: आर्थिक मुद्दों ने बदला राजनीतिक नेतृत्व
कनाडा में जस्टिन ट्रूडो के सत्ता से बाहर होने और मार्क कार्नी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के पीछे आर्थिक कारण बड़ी भूमिका में रहे। महंगाई, आवास संकट और जीवनयापन की बढ़ती लागत ने जनता के बीच असंतोष बढ़ाया। मार्क कार्नी को शुरू में खंडित संसद मिली और अप्रैल 2026 में जाकर उन्हें सीमित बहुमत हासिल हुआ। यह स्थिति बताती है कि राजनीतिक गतिरोध केवल विकासशील देशों की समस्या नहीं है।
अमेरिका: ट्रंप की वापसी और नई अनिश्चितताएं
डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका के भीतर सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। वहीं टैरिफ नीतियों और नाटो जैसे गठबंधनों को लेकर भी नई चर्चाएं शुरू हुई हैं। ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति ने कई देशों को अपनी रणनीतियों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है। भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है। व्यापारिक मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन चीन को लेकर रणनीतिक सहयोग मजबूत हो सकता है।
ब्रिटेन: लगातार बदलती सरकारों की कीमत
ब्रिटेन में कीर स्टारमर के नेतृत्व में लेबर पार्टी की सत्ता में वापसी ने कंजर्वेटिव शासन के लंबे दौर का अंत किया। डेविड कैमरन से लेकर ऋषि सुनक तक कई प्रधानमंत्रियों के बदलने से देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता प्रभावित हुई। अब स्टारमर सरकार के सामने ब्रेक्जिट के बाद पैदा हुई समस्याओं को सुलझाने की चुनौती है। यह उदाहरण दिखाता है कि लगातार नेतृत्व परिवर्तन किसी देश की वैश्विक छवि और नीति निर्माण को कमजोर कर सकता है।
भारत कैसे बना स्थिरता की मिसाल?
इन सभी वैश्विक घटनाओं के बीच भारत की स्थिरता को संयोग नहीं माना जा रहा।
1. आर्थिक मजबूती और संस्थागत क्षमता
कोविड-19 महामारी और वैश्विक संघर्षों के दौरान भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का प्रभावी उपयोग किया। जनधन, आधार और मोबाइल (JAM) मॉडल के जरिए सरकारी लाभ सीधे लोगों तक पहुंचे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। इससे घरेलू बाजार भी मजबूत हुआ।
2. रणनीतिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट
भारत ने किसी एक वैश्विक गुट के साथ खुद को पूरी तरह नहीं जोड़ा। एक तरफ भारत QUAD में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ काम करता है, तो दूसरी तरफ रूस से ऊर्जा सहयोग बनाए रखता है और BRICS जैसे मंचों पर विकासशील देशों की आवाज भी उठाता है। इस नीति ने भारत को रणनीतिक लचीलापन दिया है।
3. मजबूत कूटनीतिक साख
भारत की विदेश नीति में निरंतरता ने वैश्विक स्तर पर भरोसा पैदा किया है। दुनिया के नेताओं को यह भरोसा रहता है कि भारत की नीतियां अचानक नहीं बदलेंगी। इसी वजह से भारत ने पिछले सालों में 30 से अधिक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समझौते किए हैं। आज भारत पश्चिमी देशों और ग्लोबल साउथ के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभा रहा है।
यही कारण है कि कई विश्लेषक मानते हैं कि आने वाले दशकों में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी सैन्य या आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिरता होगी।
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