डिंडौरी जिले में हाथियों से मचा हाहाकार, दहशत में जीने मजबूर कई लोगों के घर तबाह
डिंडौरी जिले के रुसामाल गांव के लोगों के लिए इन दिनों न तो दिन में, और न ही रात को चैन हैं। आँख लगते ही लोगों में घवराहट बनी रहती है कि कही हाथियों का झुण्ड न आए।
जबलपुर, 29 मई: डिंडौरी जिले में इन दिनों हाथियों का तांडव मचा हैं। जोहिला नदी के रास्ते तीन हाथियों के झुण्ड ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया हैं। रात के वक्त हाथियों का यह झुण्ड कई घरों को क्षतिग्रस्त कर चुकें है और ग्रामीण अपनी जान बचाकर यहाँ-वहां भागने मजबूर हैं। वन विभाग को भी मामले की खबर की गई, जिसके बाद वन अमला सर्च ऑपरेशन चला रहा है। लेकिन हाथी पकड़ में ही नहीं आ रहें। बेहद फुर्तीले किस्म इन हाथियों की बसाहट क्षेत्रों में चहलकदमी प्रशासन के लिए भी सिर दर्द बन गई है।

अनुपपुर जिले से जोहिला नदी पार कर आया झुण्ड
डिंडौरी जिले के रुसामाल गांव के लोगों के लिए इन दिनों न तो दिन में, और न ही रात को चैन हैं। आँख लगते ही लोगों में घवराहट बनी रहती है कि कही हाथियों का झुण्ड न आए। बीते एक हफ़्ते में चार मकानों की दीवारों को हाथियों ने गिरा दिया। ग्रामीणों के मुताबिक तीन हाथी देखे गए हैं, जो अनूपपुर जिले से जोहिला नदी को पार करते हुए विचरण कर रहे हैं। बीती रात जागेश्वर परस्ते के घर को क्षतिग्रस्त कर दिया। हाथियों के बल के आगे ग्रामीणों के सारे संसाधन बौने साबित हो रहे हैं। एक सप्ताह में लगभग आधा दर्जन मकानों को हाथियों का यह झुण्ड नुकसान पहुंचा चुका हैं। दिन के वक्त भी भय बना हुआ है। रुसामाल के अलावा मड़ियारास, पड़रिया कला गांव में सबसे ज्यादा दहशत हैं, तीनों हाथियों की इन्ही गांवों चहलकदमी मची हैं।

वन विभाग का अमला भी पस्त
चश्मदीदों का कहना है कि तीनों हाथी बेहद फुर्तीले किस्म हैं। उन्हें ग्रामीणों ने भी अपने स्तर पर क्षेत्र से खदेड़ने की कोशिश की, पर कुछ घंटों बाद लौटकर उन्ही इलाकों की तरफ रुख कर लेते है। हाथियों के आतंक की सूचना के आधार पर वन विभाग ने एक विशेष टीम तैनात की हैं। दल-बल के साथ वन अमला जंगलों के उस बेल्ट में भी लगातार सर्च ऑपरेशन चला रहा है जहाँ हाथियों को आसानी से कैप्चर किया जा सकें। लेकिन जिन संभावित जगहों पर वन विभाग पहुँचता है, हाथियों की यह टोली उसके विपरीत दिशा में चली जाती हैं। इस बात का भी ख्याल रखा जा रहा है कि ज्यादा जोर जबरदस्ती से कोई हाथी अपना मानसिक संतुलन न खो बैठे। ऐसे में ग्रामीणों के साथ वन अमले के लिए भी दूसरी तरह की परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती है।

आखिर ऐसे इलाकों में क्यों आते है हाथी?
ऐसा माना जाता है कि हाथियों का झुण्ड हर साल लगभग साढ़े तीन सौ से पांच सौ किलोमीटर पलायन करते हैं। बसाहट क्षेत्रों और हाथियों के जीवन की सुरक्षा के लिहाज से हाथी गलियारे का निर्माण भी किया गया है। लेकिन इन गलियारों का परिक्षेत्र कहाँ कितना है, इसके प्रति आम जनमानस भी अनजान है। वन्य प्राणी विशेषज्ञ बताते है कि बदलते दौर में प्राकृतिक रूप से जंगलों का रूप भी बदल रहा हैं। जिसकी वजहें ढेरों है और बहस का बड़ा मुद्दा है। हाल फिलहाल हाथियों के विचरण में कही न कही रुकावटें है, जिसकी वजह से इनके झुण्ड गावों और शहरी क्षेत्रों की तरफ रुख कर लेते हैं। यही वह कड़ी है जहाँ से संघर्ष की शुरुआत होती है। दूसरी तरफ मप्र के बालाघाट, डिंडौरी, मंडला जैसे जिले अक्सर नक्सली गतिविधियों की हलचल से प्रभावित रहे हैं। दूसरे राज्यों की तरह नक्सली वारदातें यहाँ भले नहीं हो रही, लेकिन कई मील अन्दर जंगलों पर उनका कब्ज़ा आज भी है। जिन जंगलों में हाथियों और अन्य जानवरों की की चिंघाड़ सुनाई देती थी, उन क्षेत्रों में यदि लैंड माइंस बिछे रहने के साथ मोर्टार,बंदूकें गरजेगी और ट्रेनिंग कैंप चलेंगे तो हाथी या अन्य दूसरे जानवर अपना सुरक्षित ठिकाना तो तलाश करेंगे ही।

हाथियों से मुक्ति दिलाने की उठ रही मांग
हाथियों के उत्पात से प्रभावित जिले के तीन-चार गांव के लोगों ने मांग उठाई है कि उन्हें जल्द से जल्द हाथियों से मुक्ति दिलाई जाए। कई घर में बुजुर्ग और बच्चे भी हैं, जिनका अचानक एक जगह से दूसरी सुरक्षित जगह भागना संभव नहीं। आलम यह है कि लोगों को रतजगा करना पड़ रहा हैं। हाथियों को पकड़ने के लिए भेजे गए वन अमले में और एक्सपर्ट कर्मचारियों को शामिल कराने की मांग है। गांव वालों का एक प्रतिनिधिमंडल डिंडौरी जिला कलेक्टर से भी मिलने भी पहुंचा था, जहाँ उन्हें भरोसा दिया गया है कि जल्द से जल्द हाथियों को पकड़ा जायेंगा। सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस भी इलाके की चौकसी में तैनात करने के निर्देश दिए हैं।
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