China New Law: भारत में बात होती रही, चीन ने लागू कर दिया UCC जैसा कानून, फायदे-नुकसान समझें
China UCC Law: कॉल्ड वॉर के बाद से दुनिया में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा चीन अब अपने ही देश के अंदर रहने वाले अलग-अलग समुदायों की पहचान को एक जैसा बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा चुका है। 1 जुलाई 2026 से चीन में 'Ethnic Unity and Progress Promotion Law' लागू हो गया है। आसान भाषा में कहें तो यह भारत के UCC जैसा है, जिसकी चर्चा भारत में लंबे अरसे से हो रही है। क्या है ये कानून, कैसे करेगा काम, इससे चीन को क्या फायदा होगा और नुकसान किसे होगा, जानेंगे सब डिटेल में।
खतरे में तिब्बती, उइगर और मंगोलियाई समुदाय
चीनी सरकार का कहना है कि इससे राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति मजबूत होगी। लेकिन मानवाधिकार संगठन इसे सांस्कृतिक पहचान खत्म करने और सरकारी कंट्रोल बढ़ाने वाला कानून बता रहे हैं। उनका कहना है कि इसका सबसे ज्यादा असर तिब्बती, उइगर और मंगोलियाई समुदायों पर पड़ेगा। इस कानून का मकसद पूरे देश में 'एक देश, एक भाषा और एक पहचान' की नीति लागू करना है।

1984 के पुराने कानून की जगह आया नया नियम
चीन में पहले 1984 का 'क्षेत्रीय जातीय स्वायत्तता कानून' लागू था। इस कानून के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को बचाने का अधिकार मिला हुआ था। लेकिन नए कानून के लागू होने के बाद उस व्यवस्था की अहमियत लगभग खत्म हो गई है। अब बीजिंग पूरे देश में एक जैसी राष्ट्रीय पहचान लागू करना चाहता है और स्थानीय समुदायों की अलग पहचान को सीमित किया जा रहा है।
अब स्कूलों में सिर्फ मंडारिन भाषा
नए कानून का सबसे बड़ा असर शिक्षा व्यवस्था पर दिखाई देगा। अब प्री-स्कूल यानी शुरुआती शिक्षा से ही स्टैंडर्ड मंडारिन (चीनी भाषा) को अनिवार्य बना दिया गया है। इसका मतलब है कि तिब्बती, उइगर और मंगोलियाई जैसी स्थानीय भाषाएं धीरे-धीरे स्कूलों और सार्वजनिक जीवन से बाहर हो सकती हैं। सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर भी अब चीनी भाषा और चीनी अक्षरों को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
'शी जिनपिंग थॉट' पढ़ाना भी होगा जरूरी
सिर्फ भाषा ही नहीं, बल्कि शिक्षा के जरिए सरकार अपनी विचारधारा भी मजबूत करना चाहती है। नए कानून के अनुसार अब स्कूलों, परिवारों और सामाजिक संगठनों को 'चीनी राष्ट्रीय पहचान' को बढ़ावा देना होगा। इसके साथ ही बच्चों को 'शी जिनपिंग थॉट' और कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा पढ़ाना भी अनिवार्य कर दिया गया है। सरकार चाहती है कि नई पीढ़ी एक ही राष्ट्रीय सोच के साथ आगे बढ़े।
अंतर-जातीय शादी को मिलेगा बढ़ावा
यह कानून सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है। सरकार अब अलग-अलग जातीय समुदायों के बीच Inter-ethnic Marriage यानी अंतर-जातीय विवाह को भी बढ़ावा देगी। सरकार का मानना है कि इससे अलग-अलग समुदायों के बीच दूरी कम होगी। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इससे छोटी जातीय और सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।
संस्कृति बचाने की मांग पर हो सकती है कार्रवाई
नए कानून में यह भी प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान बचाने की मांग करता है और सरकार उसे राष्ट्रीय एकता के खिलाफ मानती है, तो उसके खिलाफ देशद्रोह (Subversion) या अलगाववाद (Separatism) जैसे आरोप लगाए जा सकते हैं। सरकारी और निजी कंपनियों, मीडिया संस्थानों और अन्य संगठनों को भी चीनी राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा देना अनिवार्य होगा।
पुराने और नए कानून में क्या बदला?

धारा 63 क्यों बनी सबसे बड़ा विवाद?
इस कानून की सबसे ज्यादा चर्चा धारा 63 (Article 63) को लेकर हो रही है। इसके तहत अगर कोई चीनी नागरिक या चीनी मूल का व्यक्ति विदेश में रहकर ऐसी गतिविधि करता है जिसे बीजिंग राष्ट्रीय एकता के खिलाफ मानता है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल विदेशों में रह रहे तिब्बती, उइगर और मंगोलियाई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ किया जा सकता है।
दुनियाभर में क्यों हो रही आलोचना?
अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। उनका कहना है कि इससे चीन में सांस्कृतिक विविधता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकार कमजोर होंगे। आलोचकों के मुताबिक, यह कानून चीन के संविधान में सभी समुदायों को समान अधिकार देने के दावे के भी उलट दिखाई देता है।
कहां होगा इसका असर?
1 जुलाई 2026 से लागू हुआ 'जातीय एकता और प्रगति संवर्धन कानून' चीन की 'एक देश, एक पहचान' नीति को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार इसे राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, जबकि मानवाधिकार संगठन इसे सांस्कृतिक विविधता पर हमला और अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान को कमजोर करने की कोशिश मान रहे हैं। आने वाले समय में यह कानून चीन की घरेलू राजनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी बहस का विषय बना रह सकता है।
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