क्यूबा और नीदरलैंड्स बाढ़ से निपटने में भारत के लिए मिसाल क्यों- दुनिया जहान
भारत के कई राज्यों में मॉनसून की बारिश के बाद बाढ़ चुनौती बन गई. देश के लिए ये आपदा नई नहीं है.
क़रीब पाँच साल पहले मॉनसून के दौरान बिहार में महानंदा नदी उफ़ान पर थी. कुंती देवी और उनके परिवार के लिए बाढ़ विनाशकारी साबित हुई. पानी कुंती देवी के पति को बहा ले गया.
साल 2017 में भारत, बांग्लादेश और नेपाल में बाढ़ से मरने वालों की संख्या 12 सौ से ज़्यादा थी.
पाँच साल बाद यानी इस साल भी बाढ़ भारत के कई राज्यों में तबाही की वजह बनी.
अकेले असम में 27 से ज़्यादा ज़िलों के दो हज़ार से ज़्यादा गांव बाढ़ से प्रभावित हुए. सरकारी आंकड़ों में सौ से ज़्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है.
बांग्लादेश के पूर्वोत्तर हिस्से में बाढ़ की वजह से क़रीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए.
ये मुश्किल सिर्फ़ दक्षिण एशिया में नहीं दिखती. पिछले साल चक्रवाती तूफ़ान 'आइडा' अमेरिका के लिए परेशानी बन गया. तूफ़ान के असर से 40 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई.
दुनिया भर के वैज्ञानिक आगाह कर रहे हैं कि आने वाले सालों में 'कुदरत के कोप' की घटनाएं बढ़ सकती हैं. लेकिन क्या इसकी वजह से होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है और मौतों को रोका जा सकता है?
इसका जवाब पाने के लिए बीबीसी ने चार एक्सपर्ट से बात की.
जोख़िम लेने की आदत
पत्रकार अमांडा रिप्ली बताती हैं, "मैं टाइम मैगज़ीन के लिए आपदाओं पर एक सिरीज़ कर रही थी. इनमें 9/11 हमला, कैटरीना चक्रवाती तूफ़ान और दूसरे हादसे शामिल थे. मैंने पाया कि अलग-अलग तरह के हादसों में बचे लोग काफ़ी हद तक एक सी कहानियां सुना रहे थे."
अमांडा ने जो कहानियां सुनीं, उनमें सिर्फ़ त्रासदी और नुक़सान की बात ही नहीं थी. उन्हें ये भी पता चला कि आपदा के वक़्त लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होती है और ये किस तरह उन्हें ख़तरे में डाल सकती है.
अमांडा बताती हैं कि विकसित देशों में बाढ़ के दौरान सबसे ज़्यादा मौतें डूबने से होती हैं. ऐसे ज़्यादातर मामलों में देखा गया है कि लोग बाढ़ के पानी को पार करने की कोशिश कर रहे थे या फिर पानी के बीच ड्राइविंग कर रहे थे.
अमांडा कहती हैं कि आमतौर पर दिमाग़ पानी से जुड़े ख़तरे का सही अंदाज़ा नहीं लगा पाता है. लोग बहते पानी की ताक़त का आकलन नहीं कर पाते और कई बार वो अपनी क्षमता को बढ़ा चढ़ाकर देखते लेते हैं. दरअसल, कई लोगों के लिए बारिश के बीच ड्राइविंग कोई अनोखी बात नहीं है. वो इससे डरते नहीं और कई बार मुश्किल में फंस जाते हैं.
अमांडा बताती हैं, "15 सेंटीमीटर यानी टखने की ऊंचाई जितना बहता पानी आपको नीचे गिरा देने के लिए काफी है. 15 सेंटीमीटर पानी एक कार को थाम सकता है. 30 सेंटीमीटर पानी हो तो आपकी कार के तैरने की स्थिति बन सकती है. 60 सेंटीमीटर पानी हो तो आप बह सकते हैं. हम शायद सोचते भी नहीं है कि इतना सा पानी हमारी जान ले सकता है."
हम स्थिति का सही आकलन क्यों नहीं कर पाते, अमांडा इसका भी जवाब देती हैं.
वो कहती हैं, "कैंसर या आतंकवाद जैसी जिन स्थितियों को लेकर लगता है कि हम उन पर काबू नहीं कर सकते तो उनके लिए हमारे मन में डर होता है लेकिन कोई ऐसी बात जिससे हम ख़ुद को वाकिफ मानते हैं या मानते हैं कि हम उस पर काबू कर सकते हैं, जैसे कि बारिश तो हमें डर नहीं लगता और हम ख़तरे को अलग तरह से देखते हैं."
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अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में हुई रिसर्च से जानकारी मिली कि लोगों का एक ख़ास समूह ख़तरे को कम करके देखने का आदी होता है.
अमांडा बताती हैं कि बाढ़ के दौरान पुरुषों की मौत की आशंका दोगुने से ज़्यादा होती है.
इसकी एक वजह ये है कि ख़तरे वाली जगहों पर काम करने वालों में महिलाओं के मुक़ाबले पुरुषों की संख्या ज़्यादा होती है. एक बड़ी वजह पुरुषों के जोखिम लेने की आदत भी है. हालांकि इस मामले में सभी पुरुष एक से नहीं होते हैं. वो बताती हैं कि "गोरे पुरुषों में से क़रीब 30 फ़ीसदी को पानी में गाड़ी चलाने को लेकर बेहद कम जोखिम नज़र आता है."
बुज़ुर्ग सामने मौजूद ख़तरे को लेकर ज़्यादा सतर्क रहते हैं. लेकिन ख़राब मौसम के दौरान घर छोड़कर जाने जैसे फ़ैसलों के समय वो ख़ुद को मुश्किल में डाल सकते हैं.
अमांडा बताती हैं, "मैंने कैटरीना तूफ़ान में मारे गए एक बुज़ुर्ग के परिवार से बात की. वो घर छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए. वो अपनी बेटी की कार में बच्चों और कुत्तों के साथ 20 घंटे नहीं बिताना चाहते थे. तमाम दूसरे बुजुर्गों की तरह उन्हें भी अपना घर छोड़कर जाने में डर लग रहा था."
मुश्किल स्थिति में कई बार लोगों के फ़ैसले ही उनकी मौत की वजह बन जाते हैं.
अब सवाल है कि इस तरह की मौतों पर कैसे रोक लगाई जाए?
अमांडा कहती हैं कि सरकारें लोगों को ख़तरे के बारे में पहले से जानकारी दे सकती हैं. चेतावनी साफ़, सटीक और विस्तार से दी जानी चाहिए और इसे बार बार दोहराया जाना चाहिए.
ज़िंदगी बचाने की कोशिश के बीच सवाल ये भी है कि क्या हम बाढ़ पर रोक लगा सकते हैं?
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बाढ़ रोकने के उपाय
जल संसाधन प्रबंधन के विशेषज्ञ कीस बोन्स नीदरलैंड्स के इंस्टिट्यूट 'डेल्टारेस' के लिए काम करते हैं.
वो कहते हैं, "नीदरलैंड्स से बाहर के लोगों के लिए शायद ये हैरान करने वाली बात हो सकती है कि हम हर दिन बाढ़ के बारे में नहीं सोचते. हम समुद्र तल के नीचे रहने के इस कदर आदी हैं कि ये बात हमारे अंदर समा गई है."
बाढ़ को लेकर बेफ़िक्र दिखने वाले कीस बोन्स ये बताना नहीं भूलते कि नीदरलैंड्स की जीडीपी का 50 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा समुद्री तल के नीचे से हासिल होता है. ऐसे में अगर नीदरलैंड्स के पश्चिमी हिस्से में बाढ़ आई तो यहां की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी.
वो बताते हैं कि नीदरलैंड्स के लोग सदियों से बाढ़ पर रोक लगाने की दिशा में काम कर रहे हैं. इसकी शुरुआत पवन चक्की और भाप इंजन के जरिए पानी निकालने से हुई.
साल 1953 में हुई बड़ी तबाही के बाद नीदरलैंड्स के लोगों ने बाढ़ से निपटने के प्रयास तेज़ कर दिए. तब बाढ़ से 18 सौ से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी.
कीस बोन्स बताते हैं, " नीदरलैंड्स के लोगों के लिए ये फ़ैसले की घड़ी थी. उसके बाद नीदरलैंड्स ने वो योजना तैयार करने का फ़ैसला किया जिसे हम डेल्टा प्लान कहते हैं."
इसमें बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजना बनाई गईं. समुद्र का पानी रोकने के लिए बांध और अवरोध बनाए गए. इस पर करीब छह अरब डॉलर खर्च आया. इसे पूरा होने में लगभग 40 साल लगे.
लेकिन समुद्र का स्तर बढ़ते रहने और जलवायु परिवर्तन की वजह से ये लगता है कि बाढ़ से सुरक्षा पाने का काम कभी पूरा नहीं होगा. इसके लिए एक नया डेल्टा क़ानून बनाया गया.
कीस बताते हैं कि बाढ़ सुरक्षा के लिए हर साल एक अरब यूरो रखे जाते हैं.
नीदरलैंड्स में ज़्यादातर रकम बड़े प्रोजेक्ट तैयार करने पर ख़र्च होती है. इनमें से एक है 'रॉटर्डम हार्बर फ्लड बैरियर'.
वो बताते हैं, "ये तूफ़ान रोकने वाला बैरियर है. इसमें दो दरवाज़े हैं. हर दरवाज़ा एफिल टावर जितना ऊंचा है. इसका कंट्रोल पूरी तरह कंप्यूटर के जिम्मे है. इसे बंद करने के लिए बाढ़ के जोखिम का आकलन किया जाता है. पानी का स्तर क्या है, तूफ़ान किस स्तर का है. बारिश का क्या स्तर है वगैरह वगैरह. ये बहुत हाईटेक सिस्टम है."
नीदरलैंड्स मौसम के पूर्वानुमान के मामले में भी बहुत तरक्की कर चुका है.
कीस बोन्स बताते हैं, "नीदरलैंड्स में हम बाढ़ को लेकर 10 से 20 सेंटीमीटर तक का सटीक पूर्वानुमान लगाना चाहते हैं. अगर आप बाढ़ को रोक नहीं सकते तो भी लोगों के पास ऊंची जगहों पर जाने का मौका होता है. जिससे वो अपना कीमती सामान सुरक्षित कर सकें. बच्चों को सुरक्षित जगह ले जा सकें और सही जगह पर आपातकालीन अस्पताल बना सकें."
इन उपायों के जरिए नीदरलैंड्स को ग़जब की सुरक्षा हासिल हुई है. कीस बोन्स बताते हैं कि उन्हें ये याद नहीं है कि उनके देश में बाढ़ से आखिरी मौत कब हुई थी.
कीस बोन्स भारत सरकार को भी सलाह दे चुके हैं. वो बताते हैं कि साल 2017 में उन्होंने बाढ़ आने के एक हफ़्ते पहले ही बांग्लादेश सरकार को भी आगाह कर दिया था.
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तबाही और सबक
बांग्लादेश के पूर्वोत्तर हिस्से में इस साल (2022 में) बाढ़ बड़ी तबाही की वजह बन गई. छोटे बच्चों समेत कई लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. 40 लाख से ज़्यादा लोग बेघर हैं. बांग्लादेश लगभग हर साल बाढ़ की समस्या से जूझता है.
ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी से जुड़े मौसम और बाढ़ के विशेषज्ञ डॉक्टर अशरफ़ दीवान बताते हैं, " मैं जब हाईस्कूल में था, ये 1988 की बात है, तब बांग्लादेश भीषण बाढ़ की चपेट में था. देश का करीब 61 फ़ीसदी हिस्सा तीन महीने तक पानी में डूबा रहा."
बांग्लादेश का बड़ा हिस्सा दुनिया के सबसे बड़े डेल्टा क्षेत्र में आता है. ये सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है लेकिन बाढ़ यहां की स्थाई समस्या है.
डॉक्टर अशरफ़ बताते हैं कि बांग्लादेश में हर पांच या दस साल में बाढ़ से बड़ी तबाही होती है और सरकार अपने कुल बजट का 20 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा पानी के प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं पर ख़र्च करती है.
डॉक्टर अशरफ़ बताते हैं कि कई बार ये निर्माण 'सुरक्षा का झूठा अहसास' कराते हैं. बांध और दूसरे निर्माण के करीब की जगह को सुरक्षित मानते हुए लोग वहां बसने लगते हैं और वहां मौजूद ख़तरों से वाकिफ नहीं होते हैं.
वो कहते हैं कि यहां नीदरलैंड्स जैसे अमीर देशों के उपाय आजमाना मुश्किल है. बांग्लादेश में सस्ते उपायों की ज़रूरत है. इसमें बाढ़ के ख़तरे वाले क्षेत्र की सटीक पहचान करना और लोगों को वहां से निकालने की योजना बनाना शामिल है.
डॉक्टर अशरफ़ दीवान कहते हैं, "आपको बाढ़ की स्थिति के लिए ज़्यादा शेल्टर यानी आश्रय स्थल बनाने होंगे. अगर आप लोगों को बता सकें कि देखिए ये फ्लड शेल्टर आपके घर के पास है. जब बाढ़ की स्थिति बने तो आप यहां जा सकते हैं."
डॉक्टर अशरफ़ कहते हैं कि दुनिया भर में बाढ़ के दौरान मरने वालों की संख्या घट रही है. बेहतर तकनीक की वजह से मौसम का सटीक पूर्वानुमान मिल जाता है. लेकिन फिर भी लोग बाढ़ में घिरेंगे ही. बाढ़ के बाद की स्थितियों के लिए भी योजना बनाना ज़रूरी है.
डॉक्टर अशरफ़ दीवान कहते हैं, " मॉनसून के दौरान कई लोग टायफाइड की चपेट में आ जाते हैं. इसकी वजह दूषित पानी होता है. मानसून के मौसम में कई लोग दस्त और हैजा की दिक्कत भी झेलते हैं. मुझे लगता है कि लोगों को जानकारी देकर इन बीमारियों और दूसरी दिक्कतों का असर कम किया जा सकता है."
डॉक्टर दीवान कहते हैं कि सरकारों को भविष्य के लिहाज से समाधान सुझाना चाहिए. जो योजना बने उनमें स्थानीय लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए. लेकिन क्या ऐसा हो रहा है?
इस सवाल पर डॉक्टर अशरफ़ कहते हैं, "फ़िलहाल हम ऐसा करते नहीं दिखते. बाढ़ के दौरान आपको देश में खूब शोर सुनाई देगा लेकिन जैसे ही बाढ़ का पानी उतर जाता है, हम सब भूल जाते हैं. हम ऐसा कुछ नहीं करते जिससे भविष्य में हम लोगों और संपत्ति को बचा सकें."
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क्यूबा से सीखें
प्राकृतिक आपदाओं के वक़्त प्रबंधन को लेकर क्यूबा दुनिया के लिए मिसाल बना हुआ है.
वॉशिंगटन के थिंक टैंक 'सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल पॉलिसी' के 'क्यूबा प्रोग्राम' की सलाहकार एलिज़ाबेथ न्यूहाउस बताती हैं, "1950 के दशक में जब मैं वहां रहती थी तब वहां बहुत से तूफ़ान आते थे और बड़ी तबाही होती थी."
एलिज़ाबेथ अब अमेरिका में रहती हैं लेकिन वो क्यूबा में बड़ी हुई हैं और उन्होंने देखा है कि तूफ़ान क्या कर सकते हैं.
वो बताती हैं कि क्यूबा में उन्होंने कई तूफ़ान देखे और उनका अनुभव बहुत डरावना था.
कई बार बदलाव की शुरुआत किसी बड़े हादसे के बाद होती है. क्यूबा के मामले में ये हादसा 1964 का चक्रवाती तूफ़ान 'फ्लोरा' था.
एलिज़ाबेथ बताती हैं, " फ्लोरा तूफ़ान की वजह से सात हज़ार लोगों की मौत हुई. इसके बाद उन्होंने सिविल डिफेंस सिस्टम अपनाया. इसके प्रमुख देश के राष्ट्रपति होते हैं. ये बहुत प्रभावी है. इसमें तूफ़ान से निपटने की तैयारी के हर पहलू को शामिल किया गया."
इसके बाद कॉम्प्रिहेन्सिव इमर्जेंसी सिस्टम लागू हुआ. एलिज़ाबेथ बताती हैं कि ये दुनिया के सबसे उम्दा सिस्टम में से एक है. वो बताती हैं कि क्यूबा में तूफ़ान और बाढ़ से बहुत कम लोगों की मौत होती है और इसकी वजह है तैयारी. स्कूलों में बच्चों को छोटी उम्र से सिखाया जाता है कि वो ख़ुद को कैसे तैयार करें.
हर साल ड्रिल यानी तैयारी की परख होती है और फिर जब तूफ़ान आता है तब सरकार के बड़े अधिकारियों से लेकर स्थानीय स्वयं सेवकों तक हर कोई योजना के मुताबिक मिलकर काम करता है.
एलिज़ाबेथ बताती हैं कि करीब 120 घंटे पहले सिविल डिफेंस के लोग तैयारी शुरू कर देते हैं. करीब 36 घंटे पहले वो तेज़ी से हरकत में आ जाते हैं.
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सबसे जबरदस्त चक्रवाती तूफ़ानों में से एक 'इरमा' के दौरान क्यूबा ने दुनिया को दिखाया कि ऐसे मौकों पर क्या करना चाहिए.
एलिज़ाबेथ बताती हैं, " तूफ़ान टकराने के 24 घंटे पहले उन्होंने लोगों को निकालना शुरू कर दिया. ज़्यादातर लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के घर चले गए. बाकी लोग बचाव केंद्रों में गए. उनके साथ पालतू जानवर भी थे. उनके घर के सामान को अगर कोई नुक़सान होता तो सरकार उसकी भरपाई करती. इसलिए उन्हें सामान की चिंता नहीं थी. ऐसे में उन्हें सुरक्षित जगह जाने में कोई मुश्किल नहीं हुई."
एलिज़ाबेथ बताती हैं कि बुजुर्ग, बीमार, गर्भवती महिलाएं और तमाम दूसरे ऐसे लोग जो ख़ुद से सुरक्षित जगहों पर नहीं जा सकते हैं, उन्हें स्वयं सेवक या अधिकारी मदद मुहैया कराते हैं. कोई रुकना भी चाहे तो भी ख़तरे वाली जगह ठहरने नहीं दिया जाता.
एलिज़ाबेथ बताती हैं, "लोगों की ज़िंदगी बचाने का उनका (क्यूबा का) रिकॉर्ड बेहतरीन है. मसलन तूफ़ान आने की स्थिति में क्यूबा में प्रति एक लाख लोगों में से दो की मौत होती है. अमेरिका में ये संख्या 15 के करीब है. क्यूबा में सबकुछ ढर्रे पर रहता है और इसके लिए प्रैक्टिस की जाती है."
अमेरिका और दूसरे देशों ने भी इसका संज्ञान लिया. उन्होंने आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों को ये समझने के क्यूबा भेजा कि आखिर इस छोटे से देश ने प्राकृतिक आपदा के वक्त मौत का आंकड़ा घटाने में कामयाबी कैसे हासिल की.
लौटते हैं उसी सवाल पर कि बाढ़ से होने वाली मौतों को कैसे रोका जाए?
जैसा हमारे विशेषज्ञों ने बताया कि मौसम के सटीक पूर्वानुमान के जरिए बड़ा अंतर आ सकता है.
अमीर देशों में निर्माण के जरिए प्राकृतिक आपदा का मुक़ाबला संभव है. लेकिन बाढ़ की समस्या, संसाधनों की कमी और जलवायु परिवर्तन की दिक्कत से जूझने वाले विकासशील देशों के लिए क्यूबा का तरीका कारगर हो सकता है.
और जैसा हमारी चौथी एक्सपर्ट एलिज़ाबेथ कहती हैं कि योजना बनाओ. लोगों को सिखाओ. क्यूबा का ये मंत्र जीवन बचाने में काम आएगा.
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