दुनियाभर के कारोबारी भारत में निवेश के लिए लालायित क्यों हैं? अर्थव्यवस्था की दुनिया में मोदी सरकार का चमत्कार
भारत ने पिछले महीने जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है, वहीं दुनिया में भारत ही एकमात्र देश है, जो सबसे ज्यादा आबादी वाला बाजार होने के साथ साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम करने का विकल्प देता है।

Business in India: जब मोबाइल फोन कंपनी एपल के सीईओ टिम कुक ने पिछले महीने की शुरुआत में भारत में एप्पल का पहला स्टोर खोला, तो उनका नायक की तरह स्वागत किया गया।
एपल सीईओ का तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया गया, उन्हें एक विंटेज मैकिंटोश भेंट किया गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित देश के अधिकारियों ने उनका भव्य स्वागत किया।
टिम कुक की भारत यात्रा, भारत में व्यापार को लेकर इंटरनेशनल कम्युनिटी की बढ़ती रुचि का नया उदाहरण है, कि दुनिया भर की कंपनियां और सरकारें, भारत के साथ व्यापार करने को लालायित दिख रही हैं। टिम कुक की ऐतिहासिक यात्रा के कुछ ही दिनों बाद, ट्रेंडी ब्रिटिश सैंडविच चेन, प्रेट ए मंगर ने भारत की बढ़ती मध्यम वर्ग पर दांव लगाते हुए, वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में अपना पहला आउटलेट स्थापित किया।
संयुक्त राष्ट्र की गणना के मुताबिक, भारत इस हफ्ते के अंत में दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है और उसने चीन को पीछे छोड़ दिया है, जो भारत के लिए एक मील का पत्थर है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक प्रिय देश के रूप में, अपनी बढ़ती छवि को और मजबूत करेगा।
लिहाजा, अब दुनियाभर की नजर इस बात को लेकर है, कि भारत की जनसंख्या और भारत की अर्थव्यवस्था, चीन को विस्थापित करने के लिए तैयार है?

भारत में निवेश को लेकर बनता माहौल
1.4 अरब की आबादी वाले भारत में निवेश का मामला बिल्कुल साफ है, और केवल हाल के भू-राजनीतिक बदलावों से इसे बल मिला है। जैसा कि पश्चिमी नेता समान मूल्यों को साझा करने वाले देशों के साथ आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, उस स्थिति में भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, इस लाभ को उठाने के लिए खड़ा है।
सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर, पार्थ सेन ने कहा, कि हाल तक, कई देशों और कंपनियों ने "अपने सभी अंडे चीन की टोकरी में डाल दिए थे। लेकिन, जैसा कि पश्चिम और बीजिंग के बीच तनाव बढ़ रहा है, तो निवेशक विविधता की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं, और भारत इसमें सही बैठता है।"
भारत की एक बड़ी जनसंख्या युवा है, जिसे "जनसांख्यिकीय लाभांश" माना जाता है, लिहाजा ये संभावित आर्थिक विकास और एक प्रमुख आर्थिक अवसर का प्रतिनिधित्व करता है। भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार, और किफायती श्रम का पूल भी वैश्विक ब्रांडों और व्यापारिक भागीदारों के लिए ध्यान आकर्षित कर रहा है।

भारत में कारोबार बना आरामदायक
औद्योगिक क्षेत्र को बढ़ावा देने और निर्यात बढ़ाने के लिए, भारत सरकार ने मुक्त व्यापार सौदों (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर करने के लिए तेजी से कदम बढ़ाया है, और ये एक ऐसा कदम है, जिसका दुनिया भर में गर्मजोशी से स्वागत किया गया है।
साल 2021 से, भारत ने ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात और मॉरीशस के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट समझौते किए हैं। इसके अलावा, भारत अब यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा और इजरायल के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत कर रहा है।
वहीं रूस, जिसका पश्चिम के साथ व्यापार पिछले साल यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से करीब करीब पूरी तरह से गिर गया है, उसने भी भारत के साथ संबंध बढ़ाने के लिए तेजी से कदम आगे बढ़ाया है। हालांकि, इस कदम को जोखिम भरा माना जाता है, क्योंकि कैपिटल इकोनॉमिक्स के डिप्टी चीफ इमर्जिंग मार्केट्स इकोनॉमिस्ट शिलान शाह के अनुसार, मॉस्को को के साथ व्यापारिक भागीदारी, वाशिंगटन की आंखों में खटक सकता है, लिहाजा यहां पर भारत को संतुलन रहने की आवश्यकता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत ने हाल के महीनों में अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं, विशेष रूप से डिफेंस और टेक्नोलॉजी में, क्योंकि वे एक तेजी से आक्रामक हो रहे चीन के उदय का मुकाबला करना चाहते हैं।
इसी साल जनवरी में, व्हाइट हाउस ने भारत के साथ एक साझेदारी शुरू की है, जिसके बारे में वाशिंगटन को उम्मीद है, कि इससे दोनों देशों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सैन्य उपकरण और सेमीकंडक्टर को लेकर, चीन के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस सौदे को "हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्थानों" को मजबूत करने के रूप में बताया, हालांकि हालिया समय में विपक्षी नेताओं और मीडिया पर भारत सरकार की हालिया कार्रवाई ने कमजोर किया है।
इसी साल फरवरी में, एयर इंडिया ने अमेरिका की अब तक की तीसरी सबसे बड़ी बिक्री में बोइंग (बीए) से 200 से ज्यादा विमान खरीदने के लिए समझौता किया है और राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इसकी "अमेरिका-भारत आर्थिक साझेदारी की ताकत" कहकर सराहना की। उन्होंने यहां तक कहा, कि भारत के साथ हुए इस समझौते से अमेरिका में रोजगार के मौके बनेंगे। जिसे भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति के तौर पर देखा गया है।
क्या ये भारत का आर्थिक चमत्कार है?
जियो-पॉलिटिक्स से इतर, भारत की आर्थिक और जनसांख्यिकी उपलब्धि, भारत में व्यावसायिक रूचि को बढ़ा रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) को उम्मीद है, कि दक्षिण एशियाई देश भारत, इस साल सभी प्रमुख उभरती और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर प्रदर्शन करेगा। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 5.9% की वृद्धि होगी। तुलनात्मक रूप से, जर्मन और यूके की अर्थव्यवस्थाएं स्थिर हो जाएंगी, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका केवल 1.6% की दर से वृद्धि करेगा।
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च के विश्लेषण के अनुसार, यदि भारत अपनी गति को बनाए रख सकता है, तो भारत 2026 में जर्मनी को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में पीछे छोड़ देगा और 2032 में जापान को पीछे छोड़ते हुए, भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा।
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की कामकाजी उम्र की आबादी 90 करोड़ से ज्यादा है। और कैपिटल इकोनॉमिक्स के अनुसार, अगले कुछ वर्षों में इसका कार्यबल चीन से बड़ा हो सकता है।
लिहाजा, बाइडेन प्रशासन ने भारत की अपेक्षित वृद्धि को भारी उत्साह के साथ गले लगा लिया है। और दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री डोनाल्ड लू ने पिछले सप्ताह भारतीय समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, कि "हम भारत के आर्थिक चमत्कार का हिस्सा बनना चाहते हैं।"

भारत का बढ़ता मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर
अर्थशास्त्रियों का कहना है, कि रोज़गार की समस्या का समाधान करने का एक ही हल है, ज्यादा से ज्यादा कारखानों का निर्माण किया जाए।
कैपिटल इकोनॉमिक्स के सहायक अर्थशास्त्री थमाशी डी सिल्वा ने सीएनएन से कहा, कि "जनसांख्यिकीय क्षमता और अनलॉकिंग की कुंजी इस विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी और श्रम प्रधान विनिर्माण क्षेत्र का विकास करेगी।"
साल 2021 तक, मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर, भारत की अर्थव्यवस्था या रोजगार में 15% से भी कम की हिस्सेदारी रखता था, लेकिन अब इसमें विस्तार हो रहा है। हालांकि, भारत को तेजी से इस सेक्टर को बढ़ाना होगा।
Apple (AAPL) ने चीन में सप्लाई चेन में भारी दिक्कतों को झेलने के बाद भारत में उत्पादन में काफी विस्तार किया है। पिछले हफ्ते अपनी यात्रा के दौरान टिम कुक ने पूरे भारत में और निवेश करने का अपना प्लान बताया है।
अप्रैल महीने में ही, फॉक्सकॉन के प्रमुख ने भी भारत का दौरा किया था और पीएम मोदी से मुलाकात की थी। ये ताइवान की इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता कंपनी है, जो एपल को आपूर्ति करती है। ये पिछले साल के अंत में भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाले निर्माताओं में से एक थी, जो अब भारत में और विस्तार करना चाह रही है।

भारत के सामने क्या हैं समस्याएं?
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के एक प्रमुख अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन ने कहा, कि भारत को इससे लाभ होगा, क्योंकि कंपनियां चीन से दूर अपनी सप्लाई चेन में विविधता ला रही हैं, लेकिन "कई बाधाएं" इस बदलाव को बाधित करेंगी।
उन्होंने कड़े श्रम कानूनों, उच्च आयात शुल्क और रसद चुनौतियों का हवाला दिया। हालांकि, हाल के वर्षों में भारत का तकनीकी निर्यात लगातार बढ़ा है, लेकिन ताइवान और वियतनाम जैसे स्थानों को वरीयता दी जा रही है, लिहाजा भारत को इन देशों का मुकाबला करने के लिए एक फेवरेट विकल्प बनना होगा।
विश्व बैंक के अनुसार, बुनियादी ढांचे में सुधार के बावजूद, भारत की लॉजिस्टिक लागत अभी भी चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, मलेशिया और थाईलैंड की तुलना में ज्यादा है।
वहीं,कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के बसु ने कहा, कि अब सरकार के लिए जरूरी है, कि वह मैन्युफैक्चरिंग जॉब्स बनाकर अतिरिक्त श्रम को अवशोषित करने की योजना बनाए।
यानि, अगर भारत अपनी चुनौतियों को दूर करता है, तो अपनी असीमित संसाधनों के साथ भारत अर्थव्यवस्था विस्तार में चमत्कार कर सकता है।
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