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अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की जल्दी में क्यों है?

2001 के 11 सितंबर को हुए हमलों के ठीक 15वें दिन यानी 26 सितंबर, 2001 को अमेरिकी गुप्तचर संस्था, सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी ने तालिबान-विरोधी वॉरलॉर्ड्स के साथ मिलकर मुल्ला उमर हुक़ूमत को गिराने की गुप्त कार्रवाई की शुरुआत कर दी थी. हालांकि ऑपरेशन एंड्योरिंग फ़्रीडम की शुरुआत औपचारिक तौर पर अक्टूबर में हुई.

सीआईए की टीम में जिसे 'जॉब्रेकर' के नाम से जाना गया, तालिबान-विरोधी-अमेरिकी मुहिम में अहमद शाह मसूद की नार्दर्न अलायंस, उज़्बेक नेता अब्दुल रशीद दोस्तम और पश्तून नेता हामिद करज़ई को शामिल किया गया था.

मुहिम का मुख्य लक्ष्य था: अफ़ग़ानिस्तान में कम से कम अमेरिकी फ़ौजों की बहाली और उस स्थिति से बचना जैसी दो दशक पहले सोवियत रूस के साथ वहां पैदा हुई थी जब पूर्व कम्युनिस्ट हुक़ूमत वहां एक लंबी लड़ाई में फ़ंसकर रह गई थी.

Why America speedly withdraw troops from Afghanistan?

तालिबान के साथ करना पड़ा समझौता

दो दशक बाद साल 2021 में अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सबसे लंबी लड़ाई लड़कर वापस लौट रहा है. विडंबना ये है कि उसे उसी तालिबान के साथ समझौता करना पड़ा है जिसकी हुक़ूमत गिराने के लिए उसने युद्ध की शुरुआत की थी.

इस बीच तालिबान का देश के 400 के क़रीब ज़िलों में से एक तिहाई पर क़ब्ज़ा हो चुका है. अमेरिकी-नेटो सेना के मज़बूत इलाक़े हेलमंद की राजधानी लश्कर गाह पर वर्चस्व के लिए तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान सेना के बीच जंग जारी है. देश के दूसरे सबसे बड़े शहर कंधार पर भी तालिबान के राकेट बरस रहे हैं. तीसरे बड़े शहर हेरात में अफ़ग़ान सैनिकों और तालिबान लड़ाकों के बीच शह-मात का खेल जारी है.

हालांकि अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने सरकारी फ़ौज की मदद के लिए कई जगहों पर तालिबान लड़ाकों पर बमबारी की है, जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफ़ेसर एके पाशा इसे 'विश्व के नेता के तौर पर अमेरिका की अपनी साख बचाये रखने से ज़्यादा कुछ नहीं' मानते हैं.

वर्तमान स्थिति के लिए अमेरिका ज़िम्मेदार?

प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, अमेरिका की तरफ़ से इस तरह के हमले जारी नहीं रहेंगे क्योंकि वो इस युद्ध में और अधिक वक़्त और पैसा लगाने से किसी भी तरह बचेगा. पाशा इसके लिए 'कट इट्स लॉसेस' मुहावरे का इस्तेमाल करते हैं.

राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने तालिबान की मज़बूत होती पकड़ के लिए अमेरिका को ज़िम्मेदार ठहराया है और कहा है कि उन्होंने पहले ही बाइडन प्रशासन को आगाह किया था कि जल्दी में लिए गए इस फ़ैसले के गंभीर नतीजे सामने आएंगे.

सोमवार को संसद में बोलते हुए उन्होंने कहा, 'वर्तमान स्थिति का कारण है कि ये फ़ैसला जल्दी में लिया जाना'.

Why America speedly withdraw troops from Afghanistan?

वैश्विक सुरक्षा के लिए ख़तरा

हेलमंद में सरकारी फ़ौज का नेतृत्व कर रहे जनरल समी सादात ने बीबीसी से कहा है कि तालिबान को दूसरे इस्लामी चरमपंथी समूहों से मदद मिल रही है इसलिए तालिबान की जीत वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा बनकर उभर सकती है.

जनरल समी सादात ने कहा, 'इससे छोटे-छोटे उग्रवादी समूहों को यूरोप और अमेरिका के शहरों में अपनी गतिविधि बढ़ाने के लिए उम्मीदें बढ़ेंगी जिसका विश्व की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा. ये लड़ाई अफ़ग़ानिस्तान की नहीं है, ये लड़ाई स्वतंत्रता और अधिनायकवाद के बीच की है'.

अफ़ग़ानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई के तीन लक्ष्य थे - पहला, तालिबान की सरकार को सत्ता से बेदख़ल करना जो पहले दो माह में ही पूरा हो गया जब 13 नवंबर, 2001, को विदेशी फ़ौजों की मदद से नार्दर्न अलायंस की टैंक्स काबुल में घुसीं और तालिबान पहले राजधानी काबुल और फिर देश के दूसरे मुख्य शहरों से भाग खड़े हुए.

ऑपरेशन का दूसरा हिस्सा था तालिबान को पूरी तरह हराना और देश की संस्थाओं का पुर्ननिर्माण. बराक ओबामा प्रशासन के समय शुरू हुए तीसरे हिस्से में शामिल था आम जनता की तालिबान से हिफ़ाज़त और लड़ाकों को धीरे-धीरे समाज की मुख्यधारा में लाना.

बाद के लक्ष्यों को पूरा करना ज़रा मुश्किल साबित हुआ.

वॉशिंगटन पोस्ट के संवाददाता ग्रिफ़ विट ने लिखा है कि साल 2001 से 2009 के बीच अमेरिकी संसद ने अफ़ग़ानिस्तान में मानवधिकार की सुरक्षा और पुनर्निमाण के नाम पर महज़ 38 अरब डॉलर दिए जिसमें आधे से अधिक अफ़ग़ान सुरक्षाबलों के प्रशिक्षण और हथियार और दूसरे उपकरणों की ख़रीद में चले गए.

इस बात को लेकर भी भ्रांति रही कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और विकास के दूसरे कामों पर ख़र्च की ज़िम्मेदारी किसकी होगी? सेना की या नागरिक सरकार की?

एके पाशा कहते हैं कि अमेरिका तालिबान पर पूरी तरह लगाम लगाने में नाक़ाम रहा जिसके नतीजे में उसे मध्य-पूर्व के क़तर और मध्य-एशिया के चंद मुल्कों से समझौता करना पड़ा.

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की मौजूदगी में बनी सरकारों में फैले भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन, विदेशी फ़ौजों पर लगे मासूम अफ़ग़ान नागरिकों को निशाना बनाने और उनके साथ क़ैद में बेहद बुरा व्यवहार करने के आरोप - इन वजहों से नागरिकों में दो हज़ार के दशक के मध्य से ही मायूसी का माहौल तैयार होने लगा था.

इसी बीच तालिबान ने फिर से ज़ोर पकड़ना शुरू कर दिया. युद्धनीति में भी बदलाव इसकी बड़ी वजह थी. विदेशी फ़ौजों से सीधे लड़ने की बजाय आत्मघाती हमलों से आम नागिरकों और यहां तक की अमेरिकी और विदेशी फ़ौजों को भी वो निशाना बनाने लगे.

इसी क्रम में भारतीय दूतावास पर साल 2008 में हुए हमले में 50 लोगों की मौत हो गई थी.

वहीं, अमेरिका को पाकिस्तान से भी मदद मिलनी कम हो गई. प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि बीते चंद सालों में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान से आर्थिक मामलों में जिस तरह की दूरी बनाई, उसकी वजह से पाकिस्तान की चीन पर निर्भरता बढ़ी. उसके बाद प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की हुक़ूमत ने अमेरिका को हवाई अड्डे मुहैया कराने से इंकार कर दिया.

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