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जॉर्ज बुश ने पश्चिमी देशों के अफगानिस्तान छोड़ने को बताया गलती

वाशिंगटन, जुलाई 14। जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय प्रसारक डॉयचे वेले ने जब बुश से पूछा की अफगानिस्तान से पश्चिमी ताकतों का निकलना क्या एक गलती है, तो उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि हां ये एक गलती है, क्योंकि मुझे लगता है कि इसके परिणाम अविश्वसनीय रूप से खराब होंगे." अफगानिस्तान में युद्ध बुश के ही कार्यकाल में अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 के हमलों के बाद शुरू हुआ था.

Provided by Deutsche Welle

अमेरिका ने तालिबान के नेता मुल्ला उमर के सामने अंतिम शर्त रखी थी कि या तो वो अल-कायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को सौंप दे और आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट कर दे या हमले के लिए तैयार हो जाए. उमर ने शर्त मानने से मना कर दिया था और अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों के एक गठबंधन ने अक्टूबर में आक्रमण कर दिया था.

'मैर्केल समझ गई थीं'

इस साल की शुरुआत में नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफगानिस्तान से अमेरिका और नाटो की सेनाओं के निकलने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. अब यह प्रक्रिया पूरी होने ही वाली है. तालिबान के लड़ाके एक एक कर के देश के कई जिलों पर कब्जा जमाते जा रहे हैं और उन्होंने देश के इलाके के एक बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया है.

बुश ने कहा कि मैर्केल समझ गई थीं कि सेनाओं के तैनाती से अफगानिस्तान में युवा लड़कियों और महिलाओं की मदद की जा सकती है

डॉयचे वेले ने बुश का यह साक्षात्कार जल्द सत्ता छोड़ कर जाने वाली जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल के आखिरी अमेरिका दौरे के मौके पर किया. बुश ने प्रसारक को बताया कि मैर्केल ने अफगानिस्तान में सेनाओं की तैनाती का आंशिक रूप से समर्थन किया था "क्योंकि वो समझ गई थीं कि इससे अफगानिस्तान में युवा लड़कियों और महिलाओं के लिए काफी तरक्की हासिल की जा सकती थी."

मासूमों की बलि

बुश ने कहा, "तालिबान की क्रूरता की वजह से वो समाज कैसे बदल गया, यह अविश्वसनीय है...और अब अचानक...दुखद रूप से...मुझे डर है कि अफगान महिलाओं और लड़कियों का अकथनीय अनिष्ट होगा." 1990 के बाद के दशकों में तालिबान के शासन के दौरान महिलाओं को मोटे तौर पर उनके घरों के अंदर तक ही सीमित कर दिया गया था और लड़कियां शिक्षा हासिल नहीं कर सकती थीं.

अमेरिका और यूरोप के विरोध के बावजूद तालिबान ने इस्लामिक शरिया कानून एक अपने चरम प्रारूप को लागू किया. हालांकि लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई. बुश ने कहा, "मैं दुखी हूं...लौरा (बुश) और मैंने अफगान महिलाओं के साथ काफी वक्त बिताया था और अब वो डरी हुई हैं. और मैं उन सब अनुवादकों और अमेरिकी और नाटो सैनिकों की मदद करने वाले उन सभी लोगों के बारे में सोचता हूं, तो मुझे लगता है कि वो सब वहीं छूट जाएंगे और इन अति क्रूर लोगों के हाथों बलि चढ़ा दिए जाएंगे. और इससे मेरा दिल टूट जाता है."

सीके/एए (एपी)

Source: DW

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